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सवाल हम सबसे है..

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-रवीश कुमार॥

ये सवाल आपसे इसलिए है क्योंकि खुद इसका सामना नहीं कर पा रहा । जवाब भी है पर आपके सामने सवाल रखना ही एक मात्र जवाब लगता है ।

व्यापम मामले में तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया देर से जागा लेकिन स्थानीय मीडिया तो इसकी गतिविधियों को रिपोर्ट कर ही रहे थे । भले ही उन अख़बारों के तेवर खूंखार एंकरों जैसे नहीं थे मगर स्थानीय अख़बारों में खूब कवर हुआ है । कैसे हुआ है इसका विश्लेषण होना चाहिए । कांग्रेस भी महीनों से आवाज़ उठाती रही । लेकिन तब भी यह मामला मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन सका । दिल्ली में न मध्य प्रदेश में । क्या अब मीडिया का दायित्व तभी पूरा होगा जब दिल्ली के चार एंकर नींद से जागेंगे ।
क्या स्थानीय मीडिया और उसे पढ़ने वाला समाज मर गया है । स्थामी ( स्थानीय मीडिया ) का अपने राज्य में प्रसार दिल्ली के भौगोलिक क्षेत्र और आबादी से ज्यादा है फिर उसका असर क्यों नहीं होता । क्या अब किसी घटना के लिए उसके आस पास के समाज पर भरोसा नहीं करना चाहिए । हो सकता है समाज भी उस सिस्टम का लाभार्थी हो इसलिए दिल्ली मुंबई वालों को बताये बिना भोपाल या पटना की वास्तविकता वास्तविकता नहीं मानी जाएगी या सामने नहीं आएगी । यही सवाल राजनीति से है । राष्ट्रीय प्रवक्ता भी दिल्ली के चार एंकर जैसे हो गए हैं । उनकी प्रदेश शाखाएँ क्यों मृत मानी जाती हैं ?
व्यापम मामले में राष्ट्रीय मीडिया के देर से ही जागने के बाद जो रिपोर्टिंग हो रही है उसमें नया क्या है जो स्थानीय मीडिया ने महीनों पहले नहीं लिखा है । कई अख़बार और कई चैनल देखने वाले दर्शक बता सकते हैं कि रामी ( राष्ट्रीय मीडिया ) ने व्हीसल ब्लोअर की जानकारी या सूचना से आगे क्या बताया है या बता रहा है । ये व्हीसल ब्लोअर मीडिया नहीं है । इन्होंने जान जोखिम में डालकर इसकी लड़ाई लड़ी है । मीडिया सिस्टम में ऐसे लोग क्यों नहीं हैं । क्या स्थामी और रामी ने अपना पैसा, समय और कैरियर दाँव पर लगाकर सिस्टम से लड़ने वालों का शोषण नहीं किया ?
पूरे मीडिया अहाते में इन व्हीसल ब्लोअर की स्थिति को रखकर देखना चाहिए । यह काम मीडिया कराता तो उसके अपने सम्बंधों पर क्या असर पड़ता और जब दो चार व्हीसल ब्लोअर की दी हुई सूचना पर करता तो क्या असर पड़ता ।
मैं विचारों के अंत टाइप की भविष्यवाणी नहीं करता क्योंकि उतनी दूर तक देखने की क्षमता नहीं है लेकिन विविध विचारों से भी कुछ नहीं होता है । जो व्यापक सिस्टम है वो तो सत्ता में बैठी पार्टी या कारपोरेट या नीचे के अफ़सरशाही वाले नेक्सस में नए खिलाड़ी के आ जाने के बाद भी नहीं बदलता है । हमारी सारी क़वायद नट बोल्ट के खराब होने की सूचना देने भर की है । वापस अपने सवाल पर लौटते हुए कहना चाहता हूँ कि क्या हम जो जानते हैं वो देख नहीं रहे । जैसे व्यापम ( दूसरे राज्यों के भी ) के बारे में सब जानते थे लेकिन देख नहीं रहे थे ।
व्हीसल ब्लोअर क्या यह बता रहे हैं कि मीडिया से नहीं हो सकेगा । ये मीडिया अहाते के बेगार मज़दूर हैं जिनके काम से हमारी इमारतें बनती हैं लेकिन उन्हें इसकी मज़दूरी नहीं मिलती । ये भी क्या कमाल के दीवाने लोग हैं शायद इसलिए कि सिस्टम और मीडिया से बाहर हैं ? या सिस्टम और मीडिया एक ही है । इस सवाल का जवाब भी दीजियेगा कि व्यापम मामले में रामी ने स्थामी और व्हीब्लो ( व्हीसल ब्लोअर) से आगे जाकर क्या नया बताया ?
जो लोग यह मान कर चलते हैं कि इसका जवाब तो मेरे पास होना चाहिए उन्हें फिर से मैट्रिक का इम्तहान देना चाहिए । नॉन मैट्रिक तो इस पोस्ट को पढ़े ही नहीं ।

(प्रख्यात टीवी एंकर रवीश कुमार की फेसबुक वाल से साभार)

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2 Comments

  1. mahendra gupta on

    आज मीडिया की हालत तो उस कौवे की तरह है जो मरे शिकार को नोच नोच कर खाता है ,इसलिए अधिकतम लोग अब मजबूरन सास बहु के पकाऊ सीरियल देखने को मजबूर टी वी बंद कर सुकून की नींद लेने में हिट समझते हैं लगभग सारा मीडिया बिक चूका है , चाहे वे समाचार पात्र हो या टी वी चैनल। टी वी पर चार पांच लोगों को पकड़ कर बैठा लेना व बे मतलब की झक करना , ब्रेक देकर खून पीना इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का शगल बन गया है सरे सारे के सारे नेता आपस में बिना बात सुने अपनी अपनी कहते रहते हैं व एंकर बैठा देखता रहता है आखिर इस से क्या हासिल होता है कभी भी किसी भी बहस का परिणाम निकलते हमने नहीं देखा सुना
    सब चैनल लगता है बिके हुए हैं , इसलिए मीडिया अपना सही उत्तरदायित्व नहीं निभा रहा बल्कि लोगों को दिग्भ्रमित कर रहा है

  2. आज मीडिया की हालत तो उस कौवे की तरह है जो मरे शिकार को नोच नोच कर खाता है ,इसलिए अधिकतम लोग अब मजबूरन सास बहु के पकाऊ सीरियल देखने को मजबूर टी वी बंद कर सुकून की नींद लेने में हिट समझते हैं लगभग सारा मीडिया बिक चूका है , चाहे वे समाचार पात्र हो या टी वी चैनल। टी वी पर चार पांच लोगों को पकड़ कर बैठा लेना व बे मतलब की झक करना , ब्रेक देकर खून पीना इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का शगल बन गया है सरे सारे के सारे नेता आपस में बिना बात सुने अपनी अपनी कहते रहते हैं व एंकर बैठा देखता रहता है आखिर इस से क्या हासिल होता है कभी भी किसी भी बहस का परिणाम निकलते हमने नहीं देखा सुना
    सब चैनल लगता है बिके हुए हैं , इसलिए मीडिया अपना सही उत्तरदायित्व नहीं निभा रहा बल्कि लोगों को दिग्भ्रमित कर रहा है

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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