/वन क्षेत्रों में शामिल कोयला ब्लॉक को पर्यावरण मंजूरी मिलने में होगी देरी..

वन क्षेत्रों में शामिल कोयला ब्लॉक को पर्यावरण मंजूरी मिलने में होगी देरी..

नीलाम किए जाने वाले 101 कोयला ब्लॉक में से 39 पर्यावरण के लिये जरुरी। सरकार से जंगल को खनन से बचाने की अपील..

नई दिल्ली। 7 अगस्त 2015। आगामी 11 से 17 अगस्त 2015 को होने वाले कोयला नीलामी में जहां एक तरफ बड़ी-बड़ी कंपनियां बोली लगाने की तैयारी में है वहीं दूसरी तरफ ग्रीनपीस भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के विश्लेषण में यह तथ्य सामने आया है कि 101 कोयला ब्लॉक में से 39 ऐसे कोल ब्लॉक हैं जो पर्यवारण के दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील क्षेत्र में आते हैं।IndiaTve5b7e3_coal

[1] ये नीलाम किए जानेवाले कोल ब्लॉक लगभग 10,500 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं, जिसमें कानूनी अड़चनों के अलावा प्रभावित समुदायों के विरोध के साथ-साथ जरुरी पर्यावरण मंजूरी मिलने में लंबा वक्त लग सकता है।
खनन कंपनियों को अगाह करते हुए ग्रीनपीस कार्यकर्ता नंदिकेश सिवालिंगम का कहना है, “सरकार को उच्च गुणवत्ता वाले जंगलों में खनन के लिये इजाजत नहीं देनी चाहिये। इससे पर्यावरण को भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा यह प्रोजेक्ट डेवलपर्स, निवेशकों और शेयरहोल्डरों के लिये भी जोखिम भरा कदम होगा, क्योंकि इन क्षेत्रों में कानूनी चुनौतियो, संघर्षों और प्रभावित लोगों के विरोध किये जाने की आशंका है। ऐसा हमने सिंगरौली में महान कोल ब्लॉक में देखा है। सरकार को सघन वन क्षेत्रों में शामिल कोयला ब्लॉक को पारदर्शी, सलाह लेकर और अक्षत नीतियों के तहत नीलामी की सूची में डालना चाहिए”।
ये कोयला ब्लॉक आठ विभिन्न राज्यों मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल में स्थित है। इनमें 35 ब्लॉक में बाघ, तेंदूआ और हाथी जैसे जानवर रहते हैं जबकि 20 ऐसे कोल ब्लॉक हैं जो संरक्षित वन्यजीव कॉरिडोर के दस किलोमीटर के दायरे में हैं।
नंदिकेश ने कहा, “कोयला घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने हमें एक अवसर दिया है कि हम कोयला नीलामी से पहले पारदर्शी और अक्षत वन नीतियों का पालन करें, जिससे कम से कम आदिवासियों, जंगलों और वन्यजीवों को नुकसान हो। ऐसा करके हम निवेशकों और प्रोजेक्ट डेवलपर्स में भी भरोसा जता सकते हैं। लेकिन जिस हड़बड़ी में सरकार कदम उठा रही है इससे लगता है कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय अपने दुर्लभ जंगलों को खनन से बचाने में अक्षम है”।

[3] एक आरटीआई से मिले जवाब के अनुसार पिछले छह सालों में जंगलों का अक्षत क्षेत्र काफी कम हुआ है। अभी तक अक्षत क्षेत्र में शामिल 222 कोल ब्लॉक को कोयला मंत्रालय और कोयला खनन उद्योग के दबाव में घटाकर 35 कर दिया गया है। इसका मतलब है कि अक्षत क्षेत्र घटकर सिर्फ 7.86 प्रतिशत रह गया है।
ग्रीनपीस और कई दूसरे संगठनों ने वर्तमान अक्षत नीतियों में पारदर्शिता और वैज्ञानिकता की कमी बताते हुए आलोचना किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि अक्षत नीतियों को बनाने के क्रम में स्थानीय समुदाय, सिविल सोसाइटी और वन्यजीव वैज्ञानिकों को नजरअंदाज किया गया है।
ग्रीनपीस इंडिया मांग करता है कि सरकार स्वतंत्र रूप से जंगलों को अक्षत क्षेत्र के रूप में चिन्हित करे और उसे संरक्षित करने के लिये आवश्यक कदम उठाये। कोयला ब्लॉक की नीलामी से पहले सारे लंबित कानूनी मसलों, पर्यावरण और लोगों के अधिकार से जुड़े शिकायतों का निदान करे। साथ ही, ग्रीनपीस संभावित निवेशकों को इन 39 चिन्हित कोल ब्लॉक से दूर रहने को कहा है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.