/सियासत के भंवर में फंसा उत्तराखण्ड क्रिकेट..

सियासत के भंवर में फंसा उत्तराखण्ड क्रिकेट..

-आशीष वशिष्ठ||

उत्तराखंड मूल के क्रिकेट खिलाड़ी देश भर में धूम मचा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद यहां आज तक क्रिकेट का बुनियादी ढांचा तक खड़ा नहीं हो पाया है. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी मूल रूप से अल्मोड़ा जिले के ल्वाली गांव के हैं तो पीयूष पांडे बागेश्वर और उन्मुक्त चंद पिथौरागढ़ से ताल्लुक रखते हैं. गढ़वाल एक्सप्रेस के नाम से विख्यात यहीं के पवन सुयाल दिल्ली से और राबिन बिष्ट राजस्थान से रणजी के लिए खेलते हैं. मगर उत्तराखंड की यह क्रिकेट पौध अपने गृह राज्य से नहीं खेल सकती क्योंकि भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य दलों के नेता भी अपनी-अपनी एसोसिएशन लेकर क्रिकेट के खैरख्वाह होने का दावा कर रहे हैं. सबको अपनी दुकान चलानी है और सब बीसीसीआई  की राज्य एसोसिएशन से संबद्धता की राह में रोड़ा बने हुए हैं. नतीजतन यहां क्रिकेट एसोसिएशन की मान्यता सियासत की भेंट चढ़ गई है.logo_cauk

धोनी और उनमुक्त के अलावा भारतीय क्रिकेट में न जाने कितने खिलाड़ी और कोच भारतीय क्रिकेट को दिये हैं. पीयूष पांडे, पवन सुयाल, राबिन बिष्ट, मनीष पाण्डे, एकता बिष्ट, हेमलता काला भारतीय क्रिकेट वो चंद चमकते सितारे हैं जो उत्तराखण्ड से आते हैं. दिल्ली, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, पंजाब समेत अनेक राज्यों की टीमों में उत्तराखंड मूल के खिलाड़ी खेल रहे हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि उत्तराखंड की क्रिकेट अकादमियों को अब तक बीसीसीआई  की मान्यता नहीं मिल पाई है. राज्य में क्रिकेट की एक मान्यता प्राप्त एसोसिएशन तक नहीं है. इसलिए उत्तराखंड की टीम रणजी ट्राफी जैसी क्रिकेट सीरीज तक में भाग लेने से वंचित है. काफी समय से बीसीसीआई  के अधिकारी उत्तराखंड का दौरा कर आश्वस्त कर रहे हैं, लेकिन यह भी हवाई वायदों से ज्यादा कुछ नहीं है. असल में उत्तराखंड में क्रिकेट में सियासत भारी पड़ रही है.

वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड गठन के साथ गठित हुए अन्य राज्यों झारखण्ड को बीसीसीआई से 2004 में मान्यता मिल गई थी जबकि छत्तीसगढ़ को 2008 में मान्यता मिली. उत्तराखण्ड का मामला एसोसिएशनों के झगड़े के कारण लटका हुआ है. जब तक ये पेंच नहीं सुलझते उत्तराखण्ड की किसी क्रिकेट एसोसिएशन को बीसीसीआई से मान्यता मिलना दूर की कौड़ी है.

दरअसल उत्तराखण्ड में राज्य स्तर की कई क्रिकेट एसोसिएशन होने से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से किसी एक एसोसिएशन को मान्यता का मामला वर्ष 2008 से लटका हुआ है. बीसीसीआई को प्रदेश से मान्यता के लिए कई एसोसिएशनों ने आवेदन किया था. इस कारण किसी एसोसिएशन को मान्यता नहीं मिल पा रही थी.

बीसीसीआई  से मान्यता के सवाल पर दोनों प्रमुख एसोसिएशनों का रुख अलग है. उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए) के सचिव चंद्रकांत आर्य कहते हैं कि सन 2000 में हमने रजिस्ट्रेशन के साथ बीसीसीआई  में मान्यता के लिए आवेदन किया था जिसके बाद 2001 में रत्नाकर शेट्टी, शरद दिवाकर और शिवलाल यादव की तीन सदस्यीय एफलिएशन कमेटी ने देहरादून का दौरा भी किया था. 2004 में दोबारा दौरा हुआ, लेकिन नए राज्यों को मान्यता देने के सवाल पर बीसीसीआई  में ही आपसी मतभेद थे. साथ ही वह यह चाहती है कि हम एक दूसरे एसोसिएशन (क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड) को भी थोड़ा प्रतिनिधित्व दें.

2011 में बीसीसीआई  की गवर्निंग काउंसिल ने इस मामले को सितंबर, 2012 तक के लिए टाल दिया. आर्य को उम्मीद है कि तब तक मान्यता मिल जाएगी. लेकिन दूसरी ओर क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के सचिव पी.सी. वर्मा का कहना है कि उन्होंने मान्यता के सवाल पर सीधे शशांक मनोहर से बात की थी, लेकिन यह सब बीसीसीआई  की बहानेबाजी है. वह जब चाहेगी, तभी मान्यता मिलेगी.

राज्य की दूसरी चार एसोसिएशनों को तो बीसीसीआई  पहले ही टरका चुकी है. मान्यता के सवाल पर 2009 में मुंबई और 2010 में दिल्ली में हुई बैठकों में भी इन दोनों एसोसिएशनों को ही बुलाया गया. लेकिन उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन का मानना है कि उसका दावा ज्यादा मजबूत है. आर्य कहते हैं, ‘यूसीए इकलौती ऐसी एसोसिएशन है, जिसके पास पूरे राज्य में अपनी बॉडी है. हम बीसीसीआई  की गाइडलाइन के मुताबिक ही काम करते हैं.’ बीसीसीआई  के कहने पर यूसीए ने सीनियर लेबल क्रिकेट बंद कर अब अंडर 14, 16, 19 और 22 पर फोकस करना शुरू कर दिया है. बकौल आर्य बीसीसीआई  सबसे अधिक पत्र व्यवहार भी उनसे ही करती है. लेकिन सीएयू के सचिव वर्मा भी बीसीसीआई  के पत्र दिखाते हैं.

उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए) के सचिव दिव्य नौटियाल के अुनसार, यूसीए का गठन कंपनी एक्ट 1956 के तहत वर्ष 2000 में हुआ. यूसीए के पदाधिकारी मान्यता के लिये बीसीसीआई की मान्यता कमेटी से 29 अगस्त 2009 को मिले थे. हमने यूसीए को प्रदेश में मान्यता देने के लिये कमेटी के सामने तमाम सूबूत और कागजात पेश किये थे, बावजूद इसके अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है. बकौल नौटियाल, बीसीसीआई के रवैये से नाराज होने और घर बैठने की बजाय पिछले 15 सालों से हम प्रदेशभर में क्रिकेट प्रतियोगिताओं का आयोजन करवा रहे हैं.

28 फरवरी 2015 को उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव सचिव दिव्य नौटियाल ने बीसीसीआइ्र को पत्र लिखकर ये अवगत कराया कि अभिमन्यु क्रिकेट अकादमी के आरपी ईश्वरन, तनिष्क क्रिकेट अकादमी के त्रिवेंद्र सिंह रावत व यूनाईटेड क्रिकेट एसोसिएशन के राजेंद्र पाल और आलोक गर्ग उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीएस) के निदेशक बन गए है. उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन  के सचिव व निदेशक दिव्य नौटियाल का दावा है कि इससे बीसीसीआई को फैसला लेने में आसानी होगी.

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से मान्यता के लिए भले ही उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए), यूनाईटेड क्रिकेट एसोसिएशन, तनिष्क क्रिकेट अकादमी और अभिमन्यु क्रिकेट अकादमी ने खुद का उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन में विलय कर दिया हो लेकिन मान्यता के मामले में अभी कई पेंच है.

यूनाईटेड क्रिकेट एसोसिएशन के के त्रिवेंद्र सिंह रावत का कहना है कि अब दो अन्य एसोसिएश उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन और क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखण्ड को नई एसोएिसशन में विलय कर लेना चाहिए ताकि उत्तराखण्ड की क्रिकेट एसोसिएशन को बीसीसीआई के समक्ष उत्तराखउ की क्रिकेट एसोसिएशन की मान्यता का मामला रखा जा सके. जानकारों का कहना है कि जब तक चंद्रकांत आर्य और हीरा सिंह बिष्ट के संरक्षण वाली एसोसिएशन साथ नहीं आती मान्यता का मामला लटका रह सकता है.

देवभूमि उत्तराखण्ड की प्रतिभाओं ने यूं तो हर क्षेत्र में अपना परचम लहराया है, लेकिन इस पहाड़ी राज्य में क्रिकेट की मूलभूत सूहलियतें न होने के बावजूद भी यहां के लड़के-लड़कियों ने देश-विदेश में अपने देश-प्रदेश का नाम रोशन करने का काम किया है. इस समय राज्य के 20 से अधिक खिलाड़ी दूसरे राज्यों की टीमों से जूनियर व सीनियर क्रिकेट टीम में खेल रहे हैं. लड़के ही नहीं, उत्तराखंड की लड़कियां भी क्रिकेट में नाम कमा रही हैं. अल्मोड़ा की एकता बिष्ट राष्ट्रीय महिला क्रिकेट टीम की सदस्य हैं और इस समय ऑस्ट्रेलिया के साथ विशाखापत्तनम में श्रृंखला खेल रही हैं. अकेले पंजाब की महिला क्रिकेट टीम में उत्तराखंड की चार लड़कियां खेल रही हैं.

इन उपलब्धियों के बावजूद यहां के युवा उत्तराखंड टीम से क्यों नहीं खेल सकते? वे दूसरे राज्यों में जाकर खेलने को विवश क्यों हैं? इस राज्य में क्रिकेट की शुरुआत 1937 में देहरादून से डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन के गठन के साथ हुई. फिर यह एसोसिएशन पहले देहरादून और बाद में नैनीताल में गठित की गई. देहरादून की डिस्ट्रिक्ट लीग को इस साल 61 साल पूरे हो गए हैं, जबकि नैनीताल की क्रिकेट लीग भी लगातार आयोजित होती रही है. भारतीय टीम के कई सितारे इससे पूर्व देहरादून में आयोजित होने वाले गोल्ड कप में खेल चुके हैं. खुद भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने दो बार गोल्ड कप में झारखंड की टीम से भाग लिया है.

इस सबके बावजूद राज्य के क्रिकेट-प्रेमी खिलड़ियों ने हार नहीं मानी है. उनका संघर्ष जारी है और राज्य के युवाओं की क्रिकेट के प्रति दीवानगी साफ नजर आती है. मैदानों की तो बात ही जाने दीजिए, यहां पहाड़ों पर भी आपको अगर कोई खेल दिखाई देगा तो वह क्रिकेट ही है. राज्य के क्लबों और एसोसिएशनों से जुड़े खिलाड़ी इस समय पंजाब, राजस्थान, सिक्किम और दिल्ली जैसे राज्यों से खेल रहे हैं. यह सिर्फ बीसीसीआई  की मान्यता न मिलने के कारण है कि इन खिलाड़ियों को दूसरे राज्यों से खेलना पड़ रहा है. इस मामले में प्रदेश सरकार भी अब सक्रिया दिख रही है. राजधानी देहरादून के रायपुर में राजीव गांधी अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण तेजी से चल रहा है और हल्द्वानी में भी जल्द ही इसी तरह का क्रिकेट स्टेडियम अस्तित्व में आ जाएगा.

वर्तमान में प्रदेश में क्रिकेट को लेकर उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए) ही सबसे अधिक सक्रिय और संजीदा दिखाई देती है. उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए) के निदेशक व सचिव  दिव्य नौटियाल के अनुसार, प्रदेश में यूसीए ही एकमात्र एसोसिशन है जिससे राज्य के सभी 13 जिलों में क्रिकेट एसोसिएशन जुड़ी हैं. बकौल नौटियाल हम सीनियर, जूनियर, महिला और दृष्टि बाधित सभी कैटगरी की प्रतियोगिताओं का लगातार आयोजन कर रहे हैं.

राज्य गठन को 15 साल हो गए हैं, लेकिन क्रिकेट दूसरों के रहम करम पर चल रही है. बीसीसीआई से राज्य को यही सुविधा मिली कि उसको उत्तर प्रदेश से संबद्ध किया हुआ है. लेकिन क्रिकेटरों को कितना मौका मिल रहा है यह वे ही जानते हैं. साफ है कि जब तक राज्य की अपनी एसोसिएशन नहीं होगी तब तक राज्य की क्रिकेट में भटकाव का ही दौर रहेगा. पर इस धकमपेल से साफ जाहिर है कि उत्तराखंड के सितारे दुनिया के क्रिकेट के आकाश में चाहे जितनी चमक बिखेर रहे हों, यहां बीसीसीआई  से मान्यता की डगर अभी मुश्किल है.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.