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ये तुम्हारे गले में किसकी आवाज़ है हार्दिक..

By   /  August 27, 2015  /  1 Comment

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 गुजरात में अराजकता का नया चेहरा उभर कर सामने आया है जिसकी भाषा तोगड़िया सी है और कार्यशैली केजरीवाल जैसी है.. जो बंदूक और रिवोल्वर से प्यार करता है और जिसके समर्थक ओडी तथा मर्सिडीज गाड़ियों में बैठकर आरक्षण मांगने आते है.. कानून उनके लिए कुछ भी नहीं है.. अगर उन्हें मनमानी करने से रोका जाता है तो वे दंगा फसाद करने से भी परहेज नहीं करते है..

 

-भंवर मेघवंशी॥

मोदी का बहुप्रचारित विकसित गुजरात आज पटेल आरक्षण की आग में धूं धूं कर जल रहा है और अराजक आवारा भीड़ के हवाले है. प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री सुरक्षित स्थानों से शांति की रटी रटाई अपीलें दोहरा रहे है ,अनियंत्रित भीड़ सरकारी सम्पतियों को निशाना बना रही है ,कहीं बसें जलाई जा रही है ,तो कहीं पटरियां उखाड़ने की कोशिशें की गयी है ,पुलिस और दंगाई आंख मिचौली खेलते दिखाई पड़ रहे है .hardik-patel_650x400_61440423479

क्या अहमदाबाद में 25 अगस्त को हुयी पाटीदार अमानत आन्दोलन समिति की महाक्रान्ति रैली अप्रत्याशित थी ? राज्य शासन के ख़ुफ़िया विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी या अंदाज़ा लगाने में वे विफल रहे कि 6 जुलाई से निरंतर गुजरात के अलग अलग हिस्सों में हो रही रैलियां एक दिन बड़ा आन्दोलन बनेगी. जबकि 17 अगस्त को सूरत की रैली में ही लाखों लोग शिरकत कर चुके थे ,उसके बावजूद भी हालात को यहाँ तक पंहुचने देने के पीछे कोई साज़िश रही या इसे महज़ राजनीतिक ,प्रशासनिक और ख़ुफ़िया विफलता माना जाये .

एक 22 वर्षीय नौजवान हार्दिक पटेल ,जिसे आप पार्टी का समर्थक बताया जा रहा है और जिसके कारोबारी पिता भरतभाई पटेल भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता है ,जिसकी विश्व हिन्दू परिषद् नेता डॉ प्रवीण भाई तोगड़िया के साथ गर्वीले अंदाज़ की फोटुएं सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है ,इसके पीछे क्या सिर्फ पटेल समुदाय ही है या और भी कुछ ढंकी छिपी ताकतें भी काम कर रही है ? क्या इसे गुजरात में मोदी की कठपुतली मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल के विरुद्ध चल रही सत्ताच्युत करने की साज़िश का अंग माना जा सकता है या यह पूरा प्रकरण ही गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक चल रहे भाजपाई आन्तरिक कलह का नतीजा है ? इस पर अभी ज्यादा कुछ भी नहीं कहा जा सकता है ,सिर्फ अटकलें लगायी जा सकती है .

प्रथम द्रष्टया हार्दिक पटेल एक विरोधाभासी व्यक्तित्व का युवा दिखाई पड़ता है ,जिसका एक साफ राजनितिक एजेंडा दिखता है .वह आरक्षण विरोधी लोगों की तरह तर्क देते हुए अपने समुदाय के लिए आरक्षण मांगता दिखाई देता है ,मसलन उसका यह कहना कि –‘ या तो सबको दो अथवा आरक्षण खत्म करो ‘(अक्सर आरक्षण विरोधी यही तर्क इस्तेमाल करते है) .हार्दिक पटेल का मानना है कि –‘ पटेल समुदाय के युवा 90 प्रतिशत अंक होने के बावजूद भी डॉक्टर की पढाई में दाखिला नहीं ले पाते है ,जबकि आरक्षण के बूते 40 फीसदी नम्बर वाले भी दाखिला और नौकरी पा जाते है ‘. हार्दिक के इन विचारों में नया कुछ भी नहीं है ,योग्यता तंत्र की बहस के ज़रिये आरक्षण व्यवस्था पर हमला बोलने वाले लोग सदैव यही भाषा इस्तेमाल करते रहे है.दिल्ली में सत्तारूढ़ दोनों सरकारों की विचारधारा कमोबेश आरक्षण पर हार्दिक पटेल जैसी ही है .

हार्दिक पटेल के अन्य बयानों को भी देखा जाना जरुरी है ,उसका यह कहना कि –‘ एक आतंकी के लिए आधी रात को कोर्ट खुल सकती है तो गुजरात के युवाओं के लिए क्यों नहीं ? ‘ यह भी कि-‘ आतंकियों को बिरयानी और हमें लाठियां मिल रही है ‘. यह प्रवीण तोगड़िया के पुराने भाषणों की नक़ल करने जैसा है .आज तो हार्दिक खुले आम कह रहे है कि –‘अगर सड़क पर उतर कर आन्दोलन कर रहे युवाओं की मांग को पूरा नहीं किया गया तो इनमें से कुछ नक्सली और कुछ आतंकी बन सकते है. ‘

खैर ,यह भारतीय लोकतंत्र को संख्या बल से धमकाने का बहुलता वाले समुदायों का पुराना शगल है ,बहरहाल हार्दिक पटेल के बयान अरविन्द केजरीवाल और तोगड़िया का अजीब सा सम्मिश्रण उपस्थित करते है ,इनसे अराजकता और साम्प्रदायिकता दोनों की मिलीजुली गंध आती है ,जिसे अगर जातिवाद का साथ मिला दिया जाये ,तो वह समस्त लोकतान्त्रिक ढांचों को ध्वस्त करने का मंसूबा पालने वाली आत्मघाती राजनीती के विष वृक्ष को पल्लवित और पुष्पित कर सकती है .इन खतरों को नज़र अन्दाज नहीं किया जा सकता है .

हार्दिक पटेल की पटेलों को नौकरियों और प्रवेश में 27 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने की मांग पर विचार किया जाये तो वह बहुत ही कमजोर है ,भले ही संख्या बल की दृष्टि से यह आज बहुत मजबूत लग रही है ,मगर तार्किक रूप से इस मांग की परिणिति शून्य होने वाली है .कोई भी सरकार गुजराती पटेलों को उनके द्वारा मांगे जा रहे आरक्षण से नहीं नवाज सकती है .संवैधानिक बाध्यताएं अपनी जगह है .क़ानूनी पचड़ों की अभी हम बात नहीं भी करें तो भी किसी भी सरकार के लिए यह कर पाना असम्भव ही लगता है .

यह बहस का विषय हो सकता है कि क्या राजनीतिक ,सामाजिक ,शैक्षणिक और धार्मिक तथा आर्थिक रूप से सक्षम पटेल समुदाय को आरक्षण की जरुरत है या यह उन्हें राजनीतिक रूप से संगठित करने का एक माध्यम भर है ? वैसे देखा जाये तो पटेल समुदाय गुजरात का सबसे वर्चस्वशाली समाज है ,आबादी के लिहाज़ से अकेले गुजरात की पूरी आबादी का 20 फीसदी है .जमीन पर स्वामित्व को देखें तो अव्वल नम्बर पर है ,कृषि भूमि की सर्वाधिक जोत पर उनका कब्जा है .व्यापार में देखें तो विश्व के हीरा कारोबार के एक तिहाई पर गुजराती पटेल ही काबिज़ है .रियल एस्टेट में उनकी प्रचुर उपस्थिति है ,निजी शिक्षा के संस्थानों पर मालिकाना हक़ में भी उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता है ,गुजरात में सरकारी और गैरसरकारी नौकरियों के 40 प्रतिशत हिस्से पर उनका आधिपत्य है .राजनीतिक भागीदारी पर नज़र दौडाएं तो आज़ादी के बाद से ही दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों में पटेल अच्छी स्थिति में रहे है .देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से लेकर आनंदीबेन पटेल तक पटेल समाज कभी भी राजनितिक रूप से उपेक्षित समुदाय नहीं रहा है .आज भी गुजरात में 40 विधायक और सात मंत्री है और मुख्यमंत्री स्वयं पटेल समुदाय से आती है .कई विश्वविद्यालयों में वाईस चांसलर पटेल है .अहमदाबाद से लेकर अमेरिका तक पटेलों की मौजूदगी आश्चर्यचकित करती है .बावजूद इसके भी इतना संपन्न ,शिक्षित और सक्षम समुदाय अपने लिए आरक्षण मांग रहा है और उसके लिए हिंसक आन्दोलन कर रहा है तो यह देशवासियों की समझ से परे का मामला है .

वैसे देखा जाये तो गुजरात का यह पटेल विद्रोह सिर्फ आरक्षण की मांग का आन्दोलन मात्र नहीं हो कर उससे आगे आकार लेती एक नयी राजनीति का आगाज भी है .इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के बहुप्रचारित दावे की विफलता के रूप में भी देखा जा सकता है कि जब अपने इतना विकास कर दिया फिर भी लोग आरक्षण के ज़रिये अपना विकास चाहते है तब तो अपना गुजरात माडल असफल साबित हुआ .कुछ लोग इसे मोदी और तोगड़िया के मध्य कई बर्षों से चल रहे शीत युद्ध के विस्फोट के रूप में भी देख रहे है .कुछ हद तक यह परिघटना अन्ना केजरीवाल द्वारा प्रारम्भ की गयी अराजक राजनीति के बढ़ते खतरों की तरफ भी सोचने को मजबूर कर रही है .पाटीदार अनामत आन्दोलन समिति की आरक्षण की मांग और हार्दिक पटेल का अचानक उभार प्रवासी गुजरातियों के द्वारा गुजरात की राजनीती में लगाये निवेश किये जाने वाले विदेशी धन के प्रभाव का भी संकेत दे रही है . यह सोशल मीडिया पर सक्रिय युवा पीढ़ी की राजनितिक अभिलाषाओं में हो रही वृद्धि की तरफ भी हमारा ध्यान आकर्षित करती है .

इस आन्दोलन का जीवन कितना होगा ,यह तात्कालिक या दीर्घकालिक होगा या चुनावी राजनीति तक ही इसकी अल्पजीवितता होगी ,अभी कुछ भी कह पाना कठिन है .अभी तो यह आवश्यक है कि यह बहुसंख्यक भीड़ का हिंसक आन्दोलन बनने के बजाय एक लोकतान्त्रिक आन्दोलन बने और संवाद के ज़रिये समस्या का सर्वमान्य एवं विधिसम्मत हल निकल कर आये ताकि वास्तविक गरीब ,वाकई पिछड़े और आरक्षण के असली हक़दार दलित और आदिवासी लोग आरक्षण के खिलाफ बन रहे माहौल से प्रभावित ना हो .हार्दिक पटेल के इस आन्दोलन के निहितार्थों को समझ पाने में अक्षम रही हमारी व्यवस्था को और अधिक ज़िम्मेदार एवं चाक चौबंद होने की भी जरुरत है ,वरना अराजकता का यह गुजराती व्याकरण हमारे लोकतंत्र और पूरी व्यवस्था को ही नेस्तनाबूद कर देगा .अंततः कहीं ऐसा ना हो कि हम वापस कबीलाई और सामंती अथवा फौजी शासनों की ठोकरों तले कराहने को मजबूर हो जाये .इस दिशा में सबको सोचना होगा .

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  • Published: 5 years ago on August 27, 2015
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  • Last Modified: August 27, 2015 @ 8:21 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Rahul Kumar says:

    Bahut door tak jayegi ye chingari aur kanha kanha aag lagegi ya lagaya jayega ye log hi bata sakte hain.

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