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आरक्षण के ख़िलाफ़ हवाई घोड़े..

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क्या हार्दिक पटेल की बात में कोई दम है? क्या आरक्षण ख़त्म कर देना चाहिए या फिर आर्थिक आधार पर देना चाहिए? शहरी मध्य वर्ग का बड़ा तबक़ा हार्दिक पटेल की हाँँ में हाँ मिलाता दिख रहा है? लेकिन आरक्षण के ख़िलाफ़ सारे तर्क काग़ज़ी क्यों हैं? सारी बातें हवा-हवाई क्यों हैं? पढ़िए और समझिए, हवाई घोड़ों का छलावा!

-क़मर वहीद नक़वी॥

क्या यह महज़ संयोग ही है कि हार्दिक पटेल ने आरक्षण का मुद्दा तभी उठाया, जब जातिगत जनगणना के पूरे आँकड़े मोदी सरकार दबाये बैठी है? सवाल पर सोचिए ज़रा! जातिगत जनगणना के शहरी आँकड़े तो अभी बिलकुल गुप्त ही रखे गये हैं, और आरक्षण का बड़ा ताल्लुक़ शहरी आबादी से ही है. लेकिन केवल ग्रामीण आँकड़ों का भी जो ज़रा-सा टुकड़ा सरकार ने ज़ाहिर किया है, उसमें भी ओबीसी के आँकड़े उसने पूरी तरह क्यों छिपा लिये? यह नहीं बताया कि कितने ओबीसी हैं? क्यों? ओबीसी के आँकड़े बिहार चुनाव में मुद्दा बन जाते? बनते तो क्यों? ओबीसी के आँकड़ों में ऐसा क्या है, जिसे सरकार अभी सामने नहीं आने देना चाहती! इसलिए क्या यह वाक़ई संयोग है कि ठीक इसी समय गुजरात से ओबीसी आरक्षण को चुनौती दी जाती है?Caste based Reservation- Raag Desh 050915

Do we need Caste based Reservation?

क्या हैं जातिगत आरक्षण के ख़िलाफ़ तर्क?

होने को यह संयोग हो भी सकता है और नहीं भी! लेकिन जितना पैसा, जितना संसाधन, जितनी तैयारी इस पटेल आन्दोलन के पीछे दिखी, उसे महज़ संयोग कैसे मान लिया जाये? क्या यह ओबीसी समुदाय में सिर-फुटव्वल कराने की किसी सोची-समझी योजना का हिस्सा है? वरना गुजरात के पटेलों के मुद्दे को देश भर में ले जाने का क्या मतलब? देर-सबेर सच सामने आयेगा ही, लेकिन फ़िलहाल हार्दिक पटेल कम से कम अपने पहले लक्ष्य में सफल हुए हैं. शहरी मध्य वर्ग का बड़ा तबक़ा उनसे सुर में सुर मिला रहा है. आम आदमी से लेकर ‘विशेषज्ञों’ और राजनेताओं तक मौजूदा आरक्षण को ख़ारिज करने के तर्क पर तर्क दिये जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि 65 साल से आरक्षण पा रही जातियाँ पहले के मुक़ाबले काफ़ी सक्षम और सशक्त हो चुकी हैं. ओबीसी भी पच्चीस साल तक आरक्षण पा चुके? अब कितने और दिन आरक्षण चाहिए? और आरक्षण अगर अब हो तो केवल आर्थिक आधार पर ही हो. जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) तो बिलकुल होना ही नहीं चाहिए. जातिगत आरक्षण का तो ‘वोट बैंक’ के लिए बहुत दुरुपयोग हुआ. इससे जातियों में विद्वेष और दूरियाँ ही बढ़ी हैं, समाज में खाइयाँ और चौड़ी हो गयी हैं, इसलिए इसे बन्द कीजिए और बस आर्थिक आधार पर आरक्षण दीजिए. जातिगत आरक्षण के ख़िलाफ़ मूल रूप से यही कुछ तर्क हैं.

धारणाएँ नहीं, आँकड़ों पर बात कीजिए

मज़े की बात है कि तर्क तो ख़ूब हैं, लेकिन सारे हवा-हवाई! लोग हवाई घोड़े तो उड़ा रहे हैं, लेकिन अभी तक अपने पक्ष में अब तक एक भी आँकड़ा नहीं दे पाये! यानी जो कुछ कहा जा रहा है, वह केवल कुछ बनी-बनायी धारणाओं के निष्कर्ष हैं! सही विश्लेषण धारणाओं पर नहीं, आँकड़ों और तथ्यों पर होता है. तो ज़रा कुछ आँकड़ों और तथ्यों पर आइए. 2011 की जातिगत जनगणना के घोषित आँकड़ों को ही लीजिए. इसके मुताबिक़ देश के ग्रामीण इलाक़ों में अनुसूचित जाति के 18.46% और अनुसूचित जनजाति के 10.97% घर हैं, यानी दोनों को जोड़ दें, तो कुल 29.43% घर इनके हुए. बाक़ी बच गये सत्तर प्रतिशत में ओबीसी कितने हैं, यह सरकार ने नहीं बताया. लेकिन इसी अवधि में हुए नेशनल सैम्पल सर्वे (एनएसएस 68वाँ दौर) के आँकड़ों से हम संकेत पकड़ सकते हैं, हालाँकि आँकड़ों में थोड़ा फ़र्क़ हैं, फिर भी अन्दाज़ लगाने के लिए वह काफ़ी हैं. उसके मुताबिक़ गाँवों में क़रीब 32% अनुसूचित जाति-जनजाति घर हैं, 44% ओबीसी और बाक़ी बच गये 24% से कुछ कम ‘अन्य’ हैं. एनएसएस के मुताबिक़ गाँव-शहर मिला कर पूरे देश में 27.5% अनुसूचित जाति-जनजाति, 44% ओबीसी और 28.5% ‘अन्य’ हैं. तो बन्धु आरक्षण के बावजूद इन 28.5% के लिए 50.5% अवसर तो उपलब्ध हैं! तो ये 28.5% अगड़े पिछड़ों का हक़ मार रहे हैं या पिछड़े इनका हक़ मार रहे हैं? याद रखिए कि इस ‘अन्य’ में अगड़ी जातियों के अलावा मुसलमान और दूसरे सभी धर्मों के लोग भी शामिल हैं. अगर मुसलमानों को ‘अन्य’ से अलग कर दें तो अगड़ों का प्रतिशत और भी कम हो जायेगा!

कितने पिछड़े हैं पिछड़े?

अब ज़रा देखिए कि इनमें कौन कितना पिछड़ा है? स्नातक या उससे ऊपर शिक्षा पानेवालों में अनुसूचित जाति के लोग सिर्फ़ 3%, अनु. जनजाति के 3.7%, ओबीसी के 6.2% और अन्य के 15% हैं. इस ‘अन्य’ में मुसलमान भी हैं, जो शिक्षा में बहुत पिछड़े हैं. उन्हें ‘अन्य’ से अलग करके देखें तो अगड़ों में स्नातक या उससे ऊपर शिक्षित लोगों का प्रतिशत कुछ और बढ़ जायेगा! तो क्या यह आँकड़े आँखे खोलने के लिए काफ़ी नहीं हैं कि 65 साल आरक्षण के बावजूद पिछड़ा तबक़ा पढ़ाई-लिखाई में अगड़ों से कहीं पीछे है और उसे बराबरी करने में बरसों लगेंगे. पढ़ाई में इतना पीछे हैं तो नौकरियों में कितना पीछे होंगे, इसका अन्दाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है.

सरकारों की चतुराई

और एनएसएस (68वाँ दौर) के मुताबिक़ शहरों में अनु. जाति का प्रति व्यक्ति मासिक ख़र्च 2028 रुपये, अनु. जनजाति का 2193 रुपये, ओबीसी का 2275 रुपये और अन्य का 3242 रुपये था. यहाँ भी ‘अन्य’ में से मुसलमानों (जो आर्थिक रूप से बहुत पिछड़े हैं) को अलग कर के देखें तो अगड़ों का प्रति व्यक्ति ख़र्च कहीं ज़्यादा आयेगा! सरकारों ने चतुराई से अगड़ों को कहीं अलग करके नहीं रखा ताकि पूरी सच्चाई सामने न आ सके! अब इन आँकड़ों के बाद भी क्या पिछड़ी जातियों के पिछड़ेपन पर कोई सन्देह रह जाता है? तो फिर यह बात किस आधार पर कही जा रही है कि ये जातियाँ अब सक्षम हो चुकी हैं और बराबरी पर आ चुकी हैं!

इस रोचक प्रयोग ने खोली पोल

और आर्थिक आरक्षण से क़तई बात नहीं बनेगी? क्यों? 2007 में दो शोधार्थियों सुखदेव थोराट और पाॅल ऐटवेल ने एक रोचक प्रयोग किया. अंग्रेज़ी दैनिकों में छपे बड़ी कम्पनियों की नौकरियों के विज्ञापन के जवाब में हर पद के लिए उन्होंने तीन बायो-डाटा भेजे. शिक्षा-योग्यता सब समान रखते हुए तीन अलग-अलग नाम से, एक सवर्ण हिन्दू, एक दलित हिन्दू और एक मुसलिम नाम से. सवर्ण हिन्दू के मुक़ाबले बाक़ी दोनों वर्गों के बायो-डाटा पर इंटरव्यू के लिए बहुत कम बुलावे आये (Economic & Political Weekly, October 13, 2007). योग्यता समान रहते हुए भी बाक़ी दोनों वर्ग के उम्मीदवार इंटरव्यू के लिए बुलाये जाने लायक़ भी क्यों नहीं समझे गये? यह एक अध्ययन आर्थिक आरक्षण के समूचे तर्क की चिन्दी-चिन्दी उड़ा देता है!

छलावा है आर्थिक आरक्षण की बात

साफ़ है कि इन पिछड़े वर्गों के विरुद्ध एक अदृश्य पूर्वग्रह काम करता है. इसलिए आर्थिक आधार पर सहारा देकर इन्हें पढ़ा-लिखा भी दिया तो नौकरी कहाँ मिलेगी? देश में कुल छह प्रतिशत नौकरियाँ सरकारी क्षेत्र में हैं और जातिगत आरक्षण न हो तो पिछड़े वर्गों को यहाँ भी नौकरियाँ मिल पायेंगी, इसकी क्या गारंटी है? 
ज़ाहिर है कि आर्थिक आरक्षण की बात एक छलावा है और जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) के अलावा और कोई चारा नहीं है. हाँ, यह सही है कि उसमें कई समस्याएँ हैं, जिन पर चर्चा होनी चाहिए और उन्हें दूर किया जाना चाहिए. पहली समस्या तो यही है कि आरक्षित श्रेणी में भी कई जातियों का वर्चस्व हो गया है और सारी मलाई वही खा जाती हैं और बाक़ी जातियाँ पिछड़ती जाती हैं. इसलिए आरक्षण की निगरानी के लिए एक स्वायत्त तंत्र हो, जो यह आडिट करता रहे कि आरक्षण का लाभ सही तरीक़े से सभी जातियों में बँट रहा है. दूसरे आरक्षण और पिछड़े वर्गों से जुड़े मुद्दों पर सारे निर्णय केवल सक्षम स्वतंत्र आयोगों की सिफ़ारिशों पर ही हों, राजनीतिक तंत्र से नहीं, तब वोट बैंक की राजनीति से छुटकारा पाया जा सकता है. अनारक्षित वर्ग में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए पर्याप्त शैक्षणिक अनुदान देकर उनकी मदद की जा सकती है.

‘निकास-प्रावधान’ का सही सुझाव

सुप्रीम कोर्ट का यह सुझाव सही है कि कोई ‘निकास-प्रावधान’ भी होना चाहिए. समय-समय पर सर्वे और अध्ययन हों और आकलन हो कि कुछ जातियाँ आरक्षण के दायरे से बाहर जाने लायक़ हुईं या नहीं या फिर कब तक वह इस लायक़ हो पायेंगी. यह तर्क भी दिया जाता है कि नौकरी में आरक्षण का लाभ मिलने के बाद जो व्यक्ति समान सामाजिक स्तर प्राप्त कर ले, उसे आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया जाना चाहिए. शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा किया भी जा सकता है, और ओबीसी में तो क्रीमी लेयर है ही, लेकिन नौकरियों में बाक़ी वर्गों के मामले में ऐसा तब तक नहीं हो सकता, जब तक हम अपने जातीय और सामाजिक पूर्वग्रहों से मुक्त नहीं होते. थोराट और ऐटवेल के अध्ययन का यह स्पष्ट निष्कर्ष है.

राग देश
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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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