/जब चाटुकारिता और प्रशासनिक आरोपी हों सिरमौर तो ऐसे में कैसे भला होगा हिन्दी का..

जब चाटुकारिता और प्रशासनिक आरोपी हों सिरमौर तो ऐसे में कैसे भला होगा हिन्दी का..

पं.एस.के.भारद्वाज॥

भोपाल। मध्य प्रदेश  की राजधानी भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन का शुभारंभ देश विदेश के हजारों हिन्दी प्रेमी शिरकत कर रहे हैं। हिन्दी भाषी देश के लिये विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी और उसके प्रचारू आभामण्डल से मध्यप्रदेश का गौरव बढऩा स्वाभाविक है। इस कार्यक्रम की सफलता के लिये प्रदेश सरकार तथा इसके अधीनस्थ कार्यरत अधिकारियों, कर्मचारियों ने रात-दिन जी तोड़ मेहनत कर कार्यक्रम की सफलता को सुनिश्चित किया। इस आयोजन को भव्यता प्रदान करने के लिये भारी मात्रा में धन राशि व्यय की गई। स्वाभाविक है कि आपाधापी में व्यय की जाने वाली राशियों में गड़बड़ी भी होती है। ऐसा एक नहीं कई आयोजनों में हो चुका है और सीएजी की रिपोर्ट में भी इसका खुलासा किया है।aamir

मातृभाषा हिन्दी के लिये तो देश की जनता इतनी कुर्बानी तो दे ही सकती है, हाँ सफेद पोश आयोजकों, ओहदेदार अधिकारियों एवं भ्रष्ट ठेकेदारों की अवश्य ऐसे सुअवसरों पर चांदी हो जाती है, तीन दिन तक चलने वाले विश्व हिन्दी सम्मेलन का ढोल भी जमकर पीटा जायेगा। प्रदेश में इस कार्यक्रम के सुचारू संचालन की जिम्मेदारी मप्र.संस्कृति विभाग ने संभाल रखी है। यह विभाग भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास है इसके प्रमुख सचिव मनोज श्रीवास्तव है। अजात् शत्रु श्रीवास्तव आयुक्त की कुर्सी पर विराजमान है। प्रमुख सचिव मनोज श्रीवास्तव स्वयं को महान साहित्यकार की श्रेणी में मानते है, गाहे बगाहे स्थानीय छुट-पुट कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति भी दर्ज कराते रहते हैं। कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से उनकी काफी निकटता है इसी निकटता का लाभ उठाते हुए समय-समय पर पत्रकारों से अपने नाम से आलेख लिखवाते हैं तथा अपनी महानता का बखान स्वयं तथा उनके कुछ चाटुकार करते फिरते हैं।

हिन्दी के इतने बड़े ज्ञाता है कि इनके विभाग को यह भी पता नहीं है कि अमीर खुसरो सही नाम है या आमिर खुसरो! मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का सिर्फ एक ही मकसद रहता है राष्ट्रीय नेताओं को साधों और अपनी कुर्सी सलामत रखो। एक तरह से उन्होंने विश्व हिन्दी सम्मेलन के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विश्वास हासिल करने का हर संभव प्रयास किया है, बहरहाल वे अपने मकसद में कितने सफल या असफल हुये यह तो वे या श्री मोदी ही जाने।

वहीं संस्कृति संचालनालय के आयुक्त अजातशत्रु श्रीवास्तव की कार्यशैली जग जाहिर है। ये पद पर रहते हुए हिन्दी साहित्य प्रकाशन और लेखन रॉयल्टी के नाम से बड़ा खेल खेल रहे है। इनके पास संग्रहालय के अधीन प्रदेश के लेखकों द्वारा लिखित पुरातत्विक साहित्य संकलन छपवाने का जिम्मा है जिसमें इन्होंने भारी घाल-मेल कर रखा है। इसमें लेखकोंं को रायल्टी दिये जाने का भी प्रावधान है पर अजात् शत्रुजी ने ऐसा परम्परागत व्यवस्था को कायम रखते हुए कारनामा कर दिखलाया कि देखने वाले दंग रह जाये। लेखक कोई, छपे किसी के नाम से और आजीवन रॉयल्टी ले कोई। ये लेखक अधिकांशत: सरकारी अधिकारी होते है और रायल्टी भी इन्हीं के खाते में जाती रही।

छपाई का काम मध्यप्रदेश माध्यम जो कि म.प्र. जनसंपर्क विभाग के अधीन चिटफंड कंपनी तर्ज पर संचालित होने वाला रखैल रूपी संस्थान है। जिसके चेयरमेन स्वयं मुख्यमंत्री है। पूरा साहित्य अजात शत्रु श्रीवास्तव के आदेश पर छापता है। कुछ सौ किताब छपती है और हजारों पुस्तकों के प्रिटिंग बिल बनाये जाते है। इस तरह साहित्यकारों और लेखकों के नाम पर जमकर कालाधन-सफेद धन का खेल वर्षो से चल रहा है।

इनके विभाग द्वारा इस संबंध में यह जानकारी मांगने पर कि प्रकाशन छपे और कहां कितने बटे,उपलब्ध प्रकाशनों की सूची आदि आदि …यह इनके विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। इसके पुख्ता प्रमाण स्वराज्य न्यूज के पास मौजूद है। तीसरी पारी की शुरूआत में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पहली कैविनेट बैठक में भष्टाचार मुक्त प्रशासन देने के लिए जीरोटारलेस की घोषणा की थी और प्रदेश की जनता को उनसे कुछ ऐसी उम्मीद भी थी। समय बीतने के साथ ही मुख्यमंत्री स्वयं अपने वायदे को भूल गये है और उनके इर्द-गिर्द पूरी भ्रष्टाचारियों की जमात जुट गई है कुछ के खिलाफ तो उच्च न्यायालय तक ने भी सख्त टिप्पणियां की है और उनके खिलाफ आपराधिक कृत्य को दृष्टिगत रखते हुए प्राथमिकी दर्ज करके कार्यवाही की अनुशंसा भी की है, परन्तु ये सबके सब मुख्यमंत्री जी के नाक के बाल बने हुए है और प्रदेश की जनता की छाती पर मूंग  दलते नजर आ रहे हैं।

हर जगह मुख्यमंत्री को गुमराह कर स्वयं के स्वार्थ सिद्धि में जुटे रहते हैं। संस्कृति महकमे के मठाधीशों को यह भी याद नहीं रहा कि हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के अहम किरदार रहे गोविंद वल्लभ पंत जो कि उत्तर प्रदेश के निवासी थे तथा आजादी प्राप्त होने के बाद उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री भी बने थे, हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित कराने के लिये लंबा संघर्ष किया था, राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद उन्हें पं. जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल में गृहमंत्री बनाया गया था, उनके संघर्ष के कारण हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा हासिल हुआ। ऐसे महान पुरूष का 10 सितम्बर जन्मदिन है, प्रदेश के सस्कृति विभाग के पुरोधाओं ने यह भी उचित नहीं समझा कि कार्यक्रम के दौरान कहीं एक जगह भी उनके नाम का उल्लेख तक कर दें। पूरे शहर में मोदी ही मोदी की तस्वीर छाई रहीं वह भी हिन्दी के नाम पर हिन्दी की सेवा में प्रण-प्राण से जुटे पुरोधा को इतने बड़े शहर में एक फोटो या बैनर तक मुहैया नहीं हो सका। दूसरी ओर म.प्र. के कई ऐसे साहित्यकार भी है जो पद्श्री अलंकरण से संम्मानित हो चुके है परन्तु उन्हें इस भव्य आयोजन से उन्हें दूर रखा गया है ।

क्या यह हिन्दी प्रेमी और साहित्यकारों का सुनियोजित अपमानित करने की चेष्टा तो नही है। इन सरकारी चाटुकारों की वजह से हिन्दी भाषा, भारतीय चिकित्सा पद्धति तथा रामराज्य की कल्पना करना बेमानी है। ये चाटुकार खाते तो हिन्दी की है पर इनकी औलादें विदेशों में अंग्रेजियत की गुलाम बनी हुई है। जितने भी आज हिन्दी के नाम पर हिन्दी-हिन्दी खेल रहे हैं इनमें से कितनों की औलादें हिन्दी माध्यम या सरकारी स्कूलों में पढ़ी है। क्या इसका जबाव है किसी के पास। ये तो येन-केन प्रकारेण से जनता के खून-पसीनों की कमाई को ठिकाने लगाने में पारंगत हैं और राजनेताओं को गुमराह करने में महारत हासिल किये हुए हैं। जिसकी वजह से ये ऊँचे ओहदों की कुर्सियों को हथियाये हुए हैं, राजनेताओं को उंगलियों पर नचा अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। ऐसा में भला ऐसे अधिकारियों के नेतृत्व में हिन्दी का कितना विकास होगा, यह सोच का विषय है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.