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स्मार्ट सिटीज़ के लिए मज़दूरों की बस्तियों की क़ुरबानी..

By   /  September 12, 2015  /  No Comments

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दिल्ली जैसे शहर में जहाँ एक तरफ़ मेट्रो रेल की रफ्तार से भी तेज़ भागती ज़िन्दगी है, जहाँ चमचमाती गाड़ियों की रेलमपेल के साथ-साथ बड़े-बड़े आलीशान मकान और कोठियाँ हैं, वहीं दूसरी तरफ़ वज़ीरपुर, आज़ादपुर, खजूरी, झिलमिल जैसी अनेक बस्तियाँ हैं। इन बस्तियों और झुग्गियों में रहने वालों की ज़िन्दगी का सबसे कड़वा सच है कि कभी भी बुलडोज़र से अपने घरों के ज़मींदोज हो जाने का ख़तरा। झुग्गियों में रहने वालों के सिर पर यह तलवार हमेशा लटकी रहती है कि कब कोई अधिकारी किसी सरकारी महक़मे से आकर उनके सिर से छत छीनकर उन्हें सड़क पर पटक दे।

14-14 घण्टे काम करने के बाद भी आम मेहनतकश आबादी दो जून की रोटी भी बड़ी मुश्किलों के साथ जुटा पाती है, उसके ऊपर महँगाई के इस दौर में दिल्ली जैसे बेहद ख़र्चीले शहर में गुज़र-बसर करना अपने आपमें एक बहुत बड़ी चुनौती है। ऐसे में पक्के मकान का किराया उठा पाना आम मज़दूर आबादी के लिए नामुमकिन है, जिसके चलते एक बहुत बड़ी आबादी को झुग्गियों में रहने पर मज़बूर होना पड़ता है। गाँव से एक बेहतर जीवन की आशा लेकर शहर में रहने आये लोगों के लिए दिल्ली शहर एक भीड़ से कम ख़तरनाक नहीं है। झुग्गियों में जीवन अपने आपमें एक चुनौती है, दमघोंटू छोटे कमरे जहाँ रोशनी भी ठीक से नहीं पहुँचती, गन्दी नालियों का पानी जो बारिश के समय झुग्गियों में आ जाता है, कूड़े के ढेर, फ़ैक्टरियों का कचरा और शौचालय की कमी इन सब मुसीबतों के बाद भी ये झुग्गियाँ इनमें रहनेवालों के लिए आराम करने और सिर छुपाने का एकमात्र साधन है।

दिल्ली शहर की चकाचौंध का इन्तज़ाम इन्हीं झुग्गियों में रहने वाली आबादी की मेहनत से होता है। मगर कभी सड़क निर्माण करने या फिर दिल्ली को विश्व स्तरीय शहर बनाने के नाम पर या फिर सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण करने के नाम पर झुग्गियों को मिट्टी में मिला दिया जाता है। केवल दिल्ली में ही 1600 से भी ज़्यादा ऐसी बस्तियाँ हैं जहाँ लोग झुग्गियों में रहते हैं। इनमें से 685 ऐसी अनियमित कॉलोनियाँ हैं जिन्हें शीला दीक्षित सरकार ने नियमित करने की घोषणा की थी। 2011 की जनगणना के मुताबिक़ दिल्ली शहर की 15 प्रतिशत से भी ज़्यादा आबादी इन कॉलोनियों में रहती है।

हाल ही में वज़ीरपुर और आज़ादपुर में झुग्गियों के टूटने की घटनाओं ने एक बार फिर झुग्गिवासियों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है। इस साल हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और आम आदमी पार्टी दोनों ने ही झुग्गियों के बदले पक्के मकान देने का वादा किया था। झुग्गीवालों का हमदर्द बनने की कसमें खाने वाली इन पार्टियों ने सत्ता दिलवाने के एवज में झुग्गीवालों से पक्के मकान का वादा तो किया मगर आम आदमी पार्टी की सरकार बन जाने के बावजूद भी दिल्ली में झुग्गियों पर हो रहे हमले थमे नहीं हैं। केजरीवाल साहब ने चुनाव से पहले वादा किया था कि पक्के मकानों का इन्तज़ाम होने तक दिल्ली में कही भी झुग्गियाँ नहीं तोड़ी जायेंगी। मगर सरकार बनने के बाद शहादरा, खजूरी और वज़ीरपुर में लगातार झुग्गियों को तोड़ा जा रहा है। झुग्गियों को तोड़ने के बाद झुग्गीवासियों के पुनर्स्थापन और पुनर्वासन की ज़िम्मेदारी सरकार की बनती है। अगर किसी भी कारणवश झुग्गियों को तोड़ा जाता है तो सरकार को झुग्गीवासियों को बसाने का काम करना चाहिए और अपनी इस ज़िम्मेदारी से वह भाग नहीं सकती। मगर दिल्ली के पूर्ण राज्य न होने के चलते और झुग्गियों के पुनर्स्थापन और पुनर्वासन के लिए बनाये गये क़ानूनों में पारदर्शिता की कमी के चलते सरकार अपनी इस ज़िम्मेदारी से पलड़ा झाड़ने में कामयाब हो जाती है।

1960 के बाद से अब तक तीन बड़ी लहरों में झुग्गी-झोपड़ी क्लस्टर (झुग्गी-झोपड़ी क्लस्टर ऐसी बड़ी कॉलोनियों को कहते हैं जहाँ एक साथ बड़ी तादाद में झुग्गियाँ मौजूद हों) को तोड़ा गया है जिनमें से सबसे ज़्यादा ताज़ा घटना है 2010 के कॉमन वेल्थ खेलों के समय 217 झुग्गी-झोपड़ी कलस्टरों का तोड़ा जाना। बर्बादी की इस पूरी कार्यवाही में 50,000 से भी ज़्यादा झुग्गियाँ तोड़ी गयी थीं। अभी तक उन लोगों के पुनर्वासन का काम पूरा नहीं हुआ है। 2011 के दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के द्वितीय अधिनियम (विशेष प्रावधान) के तहत दिसम्बर 2014 तक कोई भी झुग्गी-झोपड़ी क्लस्टर नहीं तोड़ा जा सकता था क्योंकि पहले से टूटे कलस्टरों के झुग्गीवासियों के पुनर्वासन का काम पूरे हुए बिना आगे की कार्यवाही करना सम्भव नहीं है, मगर इसके बावजूद दक्षिणी दिल्ली में सोनिया गांधी कैम्प के झुग्गी कलस्टर में 2013 में 40 झुग्गियाँ तोड़ी गयीं और ‘रास्ते के अधिकार’ (राइट ऑफ़ वे) की दुहाई देते हुए पीडब्ल्यूडी ने झुग्गीवालों को पुनर्वासित करने की ज़िम्मेदारी से हाथ झटक लिये। हालाँकि क़ानूनी तौर पर यह कार्यवाही ग़लत थी, इसके बावजूद आज भी झुग्गीवालों को न्याय नहीं मिला।

झुग्गियों से जुड़ी यह समस्या बेहद पेचीदा है। दिल्ली में 63 प्रतिशत ज़मीन जिस पर झुग्गियाँ खड़ी हैं, डीडीए और रेलवे की है जोकि केन्द्र सरकार के अन्तर्गत आती है और बाक़ी बची ज़मीन पीडब्ल्यूडी, एमसीडी, डीयूएसआईबी (दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेण्ट बोर्ड) के अन्तर्गत आती है। ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकार क़ानून की लचरता का फ़ायदा उठाते हुए झुग्गीवासियों को बेघर करने के बाद उनके प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेती है। 2010 में म्यूनिसिपैलिटी के स्लम और झुग्गी-झोपड़ी विभाग को हटाकर डीयूएसआईबी का निर्माण किया गया था, जोकि दिल्ली की सरकार के अन्तर्गत आता है और इस एजेंसी को झुग्गी-झोपड़ी क्लस्टर के पुनर्स्थापन और पुनर्वासन के काम में मुख्य ज़िम्मेदारी हासिल है। चाहे केन्द्र सरकार उस ज़मीन की मालिक हो जिस पर झुग्गियाँ खड़ी हो या राज्य सरकार, झुग्गियों को तोड़ने से पहले उस इलाक़े का सर्वेक्षण करके यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि कितने लोगों को पुनर्वासित करने का इन्तज़ाम करना है इसके लिए राज्य सरकार के महक़मों जैसे पीडब्ल्यूडी और एमसीडी को डीयूएसआईबी को इसकी जानकारी मुहैया करना ज़रूरी है कि वह फ़लाँ इलाक़े में झुग्गियों तोड़ने वाले है और राज्य सरकार के अन्तर्गत आने वाले महक़मे जैसे डीडीए या रेलवे चाहे तो यह काम ख़ुद कर सकते हैं या फिर डीयूएसआईबी को सौंप सकते हैं। कोई सख़्त क़ानून न होने के कारण अकसर ऐसा देखा गया है कि कभी रेलवे या डीडीए झुग्गियों को तोड़ देता है और केन्द्र सरकार के इन विभागों से सूचना न मिलने की सूरत में राज्य सरकार का डीयूएसआईबी विभाग झुग्गीवासियों की पुनर्स्थापना में ख़ुद को अक्षम बताकर बच निकलता है।

वर्ष 2013 में पीडब्ल्यूडी ने सोनिया गांधी कैम्प में झुग्गियों को तोड़ते हुए यह दलील दी कि क्योंकि झुग्गीवालों ने सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण कर आम जनता से रास्ते का अधिकार छीना है, इसलिए उनकी झुग्गियाँ तोड़ी जा रही हैं और डीयूएसआईबी को सूचना न दिये जाने के कारण झुग्गीवालों को कहीं और पुनर्वासित भी नहीं किया गया। जबकि 2010 के हाईकोर्ट फ़ैसले के अनुसार राइट ऑफ़ वे (रास्ते के अधिकार) के नाम पर सरकार किसी भी झुग्गीवाले को पुनर्वासन के अधिकार से वंचित नहीं रख सकती। 2010 में ही कोर्ट ने दिल्ली की एक केन्द्रीय सड़क पर रह रही गदर लोहिया समुदाय के झुग्गीवासियों को पुनर्वासन के हक़दार होते हुए एमसीडी को यह आदेश दिया था कि उनकी झुग्गियों को हटाने से पहले एमसीडी उनके पुनर्वासन की योजना बनाये। जर्मन दार्शनिक वाल्टर बेंजामिन ने क़ानून द्वारा की जाने वाली हिंसा के दो रूप बताये हैं – पहला वो जो क़ानून बनाने की प्रक्रिया में की जाती है और दूसरा वह जो उस क़ानून को अमल में लाने में की जाती है। एक तरफ़ 1957 के स्लम एक्ट से लेकर 1960 के बाद लाये गये अधिनियमों में कोई पारदर्शिता नहीं है, दूसरी तरफ़ कोर्ट के अनगिनत परस्पर विरोधी फ़ैसलों की रोशनी में झुग्गीवासी आयेदिन इस व्यवस्था के हाथों की जाने वाली हिंसा का शिकार बनते हैं।

2011 में डीयूएसआईबी ने दिल्ली को 2015 तक झुग्गी मुक्त शहर बनाने की योजना की घोषणा की थी जिसके तहत झुग्गी-झोपड़ी कलस्टरों की पुनर्स्थापना की जायेंगी। यह घोषणा राजीव आवास योजना के तहत वित्तीय सहायता पाने के लिए की गयी थी, मगर सिर्फ़ घोषणाएँ कर देने से समस्याओं का समाधान नहीं हो जाता। पहले से निर्धारित 685 अनियमित झुग्गी कॉलोनियों को नियमित करने का काम अभी तक ठीक से शुरू भी नहीं किया गया है, ऐसे में दिल्ली को झुग्गी मुक्त शहर बनाने का मतलब है केवल झुग्गियों को तोड़ना और लोगों को बेघर करना। इस व्यवस्था में झुग्गी में रहने वाले लोगों को एक नागरिक के तौर पर नहीं, बल्कि सरकारी सम्पति पर अतिक्रमण करने वाले अपराधियों की नज़र से देखा जाता है।

आम जनता में भी यही अवधारणा प्रचलित है कि झुग्गीवालों की ज़िम्मेदारी सरकार की नहीं है जबकि सच इसके बिलकुल उलट है। झुग्गियों में रहने वाले लोगों को छत मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी राज्य की होती है, अप्रत्यक्ष कर के रूप में सरकार हर साल खरबों रुपया आम मेहनतकश जनता से वसूलती है, इस पैसे से रोज़गार के नये अवसर और झुग्गीवालों को मकान देने की बजाय सरकार अदानी-अम्बानी को सब्सिडी देने में ख़र्च कर देती है। केवल एक ख़ास समय के लिए झुग्गीवासियों को नागरिकों की तरह देखा जाता है और वो समय होता है ठीक चुनाव से पहले। चुनाव से पहले सभी चुनावबाज़ पार्टियाँ ठीक वैसे ही झुग्गियों में मँडराना शुरू कर देती है जैसे गुड़ पर मक्खि‍याँ। चुनाव के समय तमाम नेता-मन्त्री झुग्गियों की जगह मकान देने का वादा करके झुग्गीवासियों को लुभाने का भरसक प्रयास करते हैं। और जीत जाने के बाद अपने वादों को भूलकर अपने आलीशान मकानों में चैन की नींद सोते हैं।

दिल्ली के वज़ीरपुर औद्योगिक क्षेत्र में ही पिछले 6 महीनों में 3 बार झुग्गियों पर बुलडोज़र चला दिये गये हैं कभी रेलवे द्वारा, कभी डीडीए तो कभी एमसीडी द्वारा। झुग्गियाँ तोड़ देने के बाद किसी भी सरकारी विभाग ने झुग्गीवालों की मदद के लिए कोई कार्रवाई नहीं की है। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है कि केजरीवाल सरकार झुग्गीवासियों से किये अपने वादे के बाबत क्या कर रही है? क्या केजरीवाल सरकार को नहीं पता कि दिल्ली में झुग्गियों की समस्या कितनी बड़ी है और इस समस्या को सुलझाने के लिए सबसे पहले मौजूदा क़ानूनों में तब्दीली करने की ज़रूरत है। दिल्ली के व्यापारियों की समस्या सुलझाने के लिए तो केजरीवाल सरकार तुरन्त हरकत में आ गयी, तो फिर जब झुग्गियों में रहने वाले लोगों को बेघर किया जा रहा है तब यह आम आदमी कहाँ है? दिल्ली की मज़दूर मेहनतकश आबादी दिल्ली की चमक-धमक को बनाये रखने के लिए दिन-रात अपना ख़ून-पसीना एक करती है, उसके बावजूद उसे केवल दो जून की रोटी और सिर पर कच्ची छत नसीब होती है जिसे भी उससे कभी भी छीन लिया जा सकता है। यही है असली सच्चाई दिल्ली की चकाचौंध को ज़िन्दा रखने वाली मेहनतकश आबादी की ज़िन्दगी की।

लेखक समाजवादी चिंतक और विचारक हैं

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  • Published: 2 years ago on September 12, 2015
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  • Last Modified: September 12, 2015 @ 4:09 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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