/मनमोहन सिंह – पिंजड़े से बाहर आईये..

मनमोहन सिंह – पिंजड़े से बाहर आईये..

-वीर विनोद छाबड़ा॥
जन्मदिन मुबारक। दस साल तक प्रधानमंत्री रहे हैं सरदार मनमोहन सिंह जी। आपसे पहले नरसिम्हा राव जी मौनी बाबा कहलाते रहे। लेकिन आप तो उनसे भी बड़े साबित हुए। आप पर बेशुमार हमले हुए। आप खामोश रहे। कोई मजबूरी रही होगी। लेकिन अब पद पर नहीं हैं तो भी ख़ामोशी अख्तियार किये हैं। मेरे ख्याल से ये आप ठीक नहीं कर रहे।
हो सकता है कि आपकी तरबीयत ऐसी रही हो जिसमें सच्चे को खामोश रहना सिखाया गया हो और आखिरी फैसला रब पर छोड़ना बेहतर बताया गया हो।Congress-backs-10071
आपके दस साल में बड़े-बड़े घोटाले हुए, मगर ये भी तो सच है कि तमाम ज़बरदस्त कामयाबियों भी हासिल हुई हैं। आपकी बोई हुई फसलें अभी तक दूसरे काट रहे हैं। मगर आपकी नाकामियों की चर्चा ज्यादा है।
आप एक अच्छे प्रशासक नहीं रहे। मंत्री ठीक आपकी नाक के नीचे घोटाले करते रहे। और आप खामोश रहे। क्यों? कोई मज़बूरी या आपको पता नहीं चला?
अच्छे राजनीतिज्ञ नही बन पाये। पार्टी के नेता मनमानी करते रहे। आप अपनी मर्ज़ी से किसी को गेट आउट तक नहीं कह पाये।
माना जाता है कि आपकी डोर किसी और के हाथ में थी, जिसका आप भी बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने ने ही आपको पीएम बनाया था। आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा। लेकिन आत्म-सम्मान नाम की कोई चीज़ भी होती है। तमाम नत्थू-खैरे आपको गरिया कर चले गए। अब भी आये दिन ऐसा ही हो रहा है। लेकिन आप फिर भी खामोश रहे, और आज भी हैं।
माना कि आप जेंटलमैन हो। स्टेट्समैन हो। सारी दुनिया आपकी आर्थिक नीतियों का सम्मान करती है।
भले ही आप अपनों की नज़र में घर की मुर्गी। चुप्पी आपका स्वभाव हो। हर ऐरे-गैरे की पोस्ट पर कमेंट करना आपकी शान के विरुद्ध रहा हो।
मगर आप ये क्यों भूल जाते हैं कि आप ही ने तो वर्तमान आर्थिक नीति की नीव रखी थी। जो लोग पानी पी पी कर कोसते थे, आज वही इसकी पूजा कर रहे हैं। इसी के दम पर दुनिया के नेता बनने की हुंकार भर रहे हैं। आपके प्रोडक्शन को अपना कह के बेच रहे हैं। आप न होते तो सुई तक हम अमरीका से इम्पोर्ट कर रहे होते। दूसरों के रहमो-करम पर जीते होते।
मीडिया भी सब कुछ जानते हुए दूसरे की शान में कसीदे पढता रहा। उनकी हर बात पर वारी-वारी हो जाता रहा। आपके लिए बिछी १०० फुट की रेड कारपेट के मुकाबले उनके लिए बिछी तीन फुटी कारपेट में उन्हें बहुत बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि दिखती रही।
हम आपकी ख़ामोशी के नज़ारे एक मुद्दत से देख रहे हैं। बर्दाश्त कर रहे हैं। आपकी सिधाई, भद्रता और स्टेट्समैनशिप का लोग मखौल उड़ा रहे थे, हम तब भी कुछ नहीं बोले थे।
सिंह साहब अब तो आप मुंह खोलिए। जेंटलमैन के मुहं में भी वाहेगुरु ने ज़बान दी हुई है। बताइये दुनिया को कि चुप रहने की क्या मज़बूरियां थीं।
ठीक है, आप किसी को दोष न देकर अपनी जेंटलमैन की छवि पर कायम रहिये।
लेकिन याद रखें रखिये आपके समर्थन में कोई भी नहीं बोलेगा। अपनी उपलब्धियों के बारे में तो आपको खुद ही बताना होगा। दिखानी होगी अपने दौर की सुनहरी तस्वीरें।
आपकी ही पार्टी की थीं न इंदिरा गांधी। चुनाव हारने के बाद शेरनी की पलटवार करके गद्दी पर वापस बैठी थी। यह ठीक है कि आप इंदिरा नहीं हो। लेकिन इतना तो बता दो कि आप पिंजड़े में बंद नहीं हो।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.