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कहीं देर न हो जाय..

By   /  October 18, 2015  /  3 Comments

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-बसंत कुमार।।

भाजपा एक राजनीतिक दल के हिसाब से २१०४ का आम चुनाव नहीं जीती थी बल्कि नरेंद्र मोदी की यह जीत भाजपा के लिए एक शानदार तोहफा था.

ज्यादातर मतदाताओं ने मोदी के गुजरात के विकास मॉडल में यकीन किया था. मोदी में उनको एक आशा की किरण नज़र आई थी. यह एक सकारात्मक जनादेश था. दुर्भाग्य की बात है कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लगा कि यह जीत उनके एजेंडे को लागू करने के लिए भाजपा को लोगों ने दी है. ‘परिवार’ को यह भी लगा कि यह ‘मुज़फ्फर नगर’ दंगा ही था जिसने एक निश्चित हिस्से के मतों को धृवीकरण करने में मदद की और मुख्यतः वही इस जीत के लिए जिम्मेदार है. उनका विश्वास यकीं में तब तब्दील हो गया जब भाजपा को विश्वास से कहीं अधिक सफलता झारखण्ड, हरियाणा, महाराष्ट्र की विधानसभा चुनाव में मिली. जम्मू और कश्मीर में अलगाववादी समर्थक पीडीपी के सहभागिता में सत्तासीन होने ने उनको एक दृढ़ विश्वास दिला दिया कि यह देश वही चाहता हैं, जिसका सपना परिवार ने श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के समय संजोये बैठा है.download
भाजपा ने इस खुशफहमी को पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान इस्तेमाल करने की दुःसाहस कर दिखाया, पर चारों खानो चित होने पर भी कोई सीख नहीं ले सकी. साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, साध्वी निरंजन ज्योति और साध्वी प्राची जैसे नेताओं का लोगों के बीच में साम्प्रदायिकता का जहर फैलाना, अरुण जेटली, विजेंद्र गुप्ता सरीखे जैसे नेताओं को ‘बलात्कार’ जैसे घिनौने कारनामों को ‘एक छोटी सी घटना’ का रूप देना, लोगों को किसी ख़ास पशु के मांस खाने की बात/अफवाह पर धमकी देना, दुसरे मंत्रियों का ‘दादरी’ जैसी दर्दनाक घटनाओं पर निर्लज्ज टिप्पणी करना, मुख़्तार अब्बास नक़वी और किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री का किसी ख़ास समुदाय को गोमांस खाने के नाम पर पाकिस्तान भेजने की बार बार धमकी को दोहराना, भारत सरकार के मंत्रियों का राष्ट्रीय स्वयं सेवक को सालाना रिपोर्ट कार्ड पेश करना अब उन मतदाताओं विचलित करने लगा है जिन्होंने मोदीजी को एक सकारात्मक वोट दिया था.
इन सारी बातों पर चुप रहना लोगों को अच्छा नहीं लगा, बल्कि उनकी सुधरती हुई छवि पर एक सवालिया निशान लगा दिया है. क्या यह वही नरेंद्र मोदी है जो अपने आप को विकास पुरुष के रूप में पेश करते थे जो एक साल पहले भाईचारे की बात करते थे?
प्रधानमंत्री का विदेश दौरों के दौरान किसी ख़ास बिज़नेस घराने की कारोबार को बढ़ावा देना भी देशवासियों को हैरान ही नहीं करता है बल्कि एक आम आदमी प्रधानमंत्री से यह भी उम्मीद रखता है कि सरकार इस देश की रीढ़ की हड्डी किसानों के हित का भी ख्याल रखे. किस मजबूरी में पहुँच के एक किसान आत्महत्या करता है और उसपर भाजपा के मंत्री और नेताओं के “किसान नपुंसकता के लिए आत्महत्या कर रहा है” जैसे अनाप शनाप बयान और ऊपर से प्रधान मंत्री की चुप्पी आहत किसान समाज को और अधिक पीड़ा पहुंचा रही है.
जबकि सरकार विभिन्न दालों का न्यूनतम समर्थन मूल्य ५० रु से कम रखती है और आज ग्राहक उसी दाल को बाजार से आस्मां छूता हुआ भाव २०० रु से ज्यादा रेट में खरीदने को मजबूर हो रहा है. एक आम आदमी मंत्रियों के ‘आपूर्ति और मांग’ सिद्धांत को समझ नहीं पाटा है और न समझना चाहता है. जब देश में देश में पिछले वित्तीय वर्ष में दाल तिलहनों के उत्पादन में कोई ख़ास गिरावट नहीं आई है. अगर बाजार ही मूल्य तय करेगा तो सरकार की उत्तरदायित्व क्या रह जाता है? एक आम आदमी कहाँ जायेगा?

यह मत भूलिए की इसी देश की जनता ने आप के हाथ में सत्ता का बागडोर इसीलिए लिए सौंपी है कि उसकी जिंदगी में बदलाव आये, रोजमर्रा जिंदगी की हालत में कोई सुधार हो, उसके बच्चों के अच्छी शिक्षा मिले, रोजगार मिले. उसने आप को इसीलिए नहीं जिताया कि आप उसके लिए यह तय करें कि उसके लिए क्या खाना अच्छा है, उसे किसे पूजा करना चाहिए या नहीं, उसे इबादत करना चाहिए या नहीं, उसे कहाँ रहना चाहिए या आप यह तय करें कि मजहब कौन सा बेहतर है. धर्म निरपेक्षता की जड़ इतनी कमजोर नहीं है जैसा आप सोचते हैं. अगर देश की जनता को पिछले ६०-साल वाला राज पसंद नहीं आया तो उनको वही पुरानी दवाई आपसे भी नहीं चाहिए. लोगों की धैर्य और चुप्पी को हामी समझने की गलती न करें. आज जनता ने यह कहना शुरू कर दिया है कि हमें वह ‘बुरे दिन’ वापस कर दो जब हमें आलू, प्याज, दालें आज के भाव से कहीं कम भाव में मिल जाया करते थे, नहीं चाहिए आप के ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा (प्याज, दाल) वाले ‘अच्छे दिन’. जनता कहीं उसे हक़ीक़त में न बदल दे।

आप के ‘अच्छे दिन’ वाले नारे में लोगों ने भरोसा किया था, न कि इस ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा (प्याज, दाल) वाले ‘अच्छे दिन’! समय आ गया है अपनी मानसिकता और सोच बदलो, अब बात नहीं चाहिए, धरातल में काम दिखना चाहिए नहीं तो लोग अब ६० साल इंतज़ार नहीं करेंगे उखाड़ फेंकने में! कहीं देर न हो जाय !

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  • Published: 2 years ago on October 18, 2015
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  • Last Modified: October 18, 2015 @ 3:09 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. यदि मोदी सरकार ने अब भी कोई समझदारी नहीं दिखाई व कोई रचनात्मक कार्य न किया तो साल भर में वह अपना आभामंडल धूमिल कर लेगी , न जाने मोदी अपने विदेश दौरों से क्या सिद्ध करना चाहते हैं , शायद वे यहभूल रहे हैं कि देश में कुछ करने वाले नेता ही अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि बनाये रख सकते हैं , अब मोदी को कुछ करके ही दिखाना होगा वरना बढ़ते मूल्य , उजड़ती संस्कृति व बिखरता सामाजिक ताना बाना उनके व्यक्तित्व को भी तार तार कर देगा ,राजनीतिक परिवर्तन सदैव ज्यादा इन्तजार नहीं किया करते , और विशेषकर तब तो बिलकुल भी नहीं जब जनता ने बहुत बड़ी उम्मीदों के साथ चुना हो व चुने जाने वाले नेताओं ने जनता को रंगीन सपने दिखाए हो , और मोदी ने वे दिखाए भी हैं, बेचे भी हैं

  2. यदि मोदी सरकार ने अब भी कोई समझदारी नहीं दिखाई व कोई रचनात्मक कार्य न किया तो साल भर में वह अपना आभामंडल धूमिल कर लेगी , न जाने मोदी अपने विदेश दौरों से क्या सिद्ध करना चाहते हैं , शायद वे यहभूल रहे हैं कि देश में कुछ करने वाले नेता ही अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि बनाये रख सकते हैं , अब मोदी को कुछ करके ही दिखाना होगा वरना बढ़ते मूल्य , उजड़ती संस्कृति व बिखरता सामाजिक ताना बाना उनके व्यक्तित्व को भी तार तार कर देगा ,राजनीतिक परिवर्तन सदैव ज्यादा इन्तजार नहीं किया करते , और विशेषकर तब तो बिलकुल भी नहीं जब जनता ने बहुत बड़ी उम्मीदों के साथ चुना हो व चुने जाने वाले नेताओं ने जनता को रंगीन सपने दिखाए हो

  3. Naseem Khan says:

    2104 ky hai chunav ka huva

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