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अगर हम लेखकों के विरोध को नहीं समझ रहे हैं तो यह हमारी गलती है..

By   /  October 21, 2015  /  1 Comment

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-प्रियदर्शन॥

जिन्हें सरकार और उसके लोग बेहद मामूली, अनजान से लेखक बता रहे हैं, उनका विरोध इसलिए महत्वपूर्ण है कि हमारी बहुत सारी विफलताओं से प्रतिरोध का जो स्वर मर गया था, वह अचानक सांस लेने लगा है.

बायें से) अशोक वाजपेयी, काशीनाथ सिंह और उदय प्रकाश अपना साहित्य अकादमी सम्मान वापस करने का ऐलान कर चुके हैं

(बायें से) अशोक वाजपेयी, काशीनाथ सिंह और उदय प्रकाश अपना साहित्य अकादमी सम्मान वापस करने का ऐलान कर चुके हैं

चिनगारी जैसे शोले में बदलती जा रही है. लेखकों का विरोध बड़ा होता जा रहा है. कल तक जो लोग हिचक रहे थे या सम्मान वापस न करने के पक्ष में थे, वे भी साहित्य अकादेमी सम्मान लौटा रहे हैं. इस सूची में काशीनाथ सिंह से लेकर मुनव्वर राना तक जुड़ चुके हैं और केदारनाथ सिंह भी देर-सबेर शायद यही घोषणा कर दें कि उन्होंने 29 बरस पहले मिला साहित्य अकादेमी सम्मान लौटा दिया है. इस विरोध में अब तक हिंदी, उर्दू, पंजाबी, कन्नड़, बांग्ला, राजस्थानी, तमिल, मलयालम, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, तेलुगू, कश्मीरी सहित कई भाषाओं के लेखक शामिल हो चुके हैं. विरोध की आंच इतनी तीखी है कि दो सौ रुपये किलो से ऊपर बिक रही दाल का सवाल छोड़कर वित्तमंत्री अरुण जेटली लेखकों को कठघरे में खड़ा करने में जुटे हैं.

अगर लेखकों को सिर्फ फायदा हासिल करने के लिए कोई पक्ष चुनना है तो वे कांग्रेस और वामपंथ के कमज़ोर हो चुके किलों से ये लड़ाई क्यों लड रहे हैं – वे नरेंद्र मोदी के साथ क्यों नहीं हो लेते?

लेखकों के इस विरोध को मूलतः चार आरोपों के साथ गलत ठहराया जा रहा है. पहला आरोप तो यही है कि लेखक सिर्फ शोहरत हासिल करने के लिए सम्मान वापस कर रहे हैं. दूसरा आरोप यह है कि इस विरोध के पीछे कांग्रेस और वामपंथ है. तीसरा आरोप यह है कि लेखकों के विरोध का कोई तर्क नहीं दिख रहा – कलबुर्गी की हत्या हो या दादरी का मामला- इसके लिए साहित्य अकादेमी कहीं से ज़िम्मेदार नहीं है. आख़िरी तर्क ऊपर के सभी आरोपों की पुष्टि के लिए है- कि आख़िर इन लेखकों ने पहले कभी ये सम्मान क्यों नहीं वापस किए, जब परिमाण में इससे बड़ी और भयावह घटनाएं हुईं.

लेकिन ये तर्क इतने खोखले हैं कि अपना प्रतितर्क ख़ुद बनाते हैं. अगर सम्मान लौटाने से शोहरत मिलती है तो इन लेखकों ने यह पुण्य पहले क्यों नहीं कमाना चाहा? कृष्णा सोबती ने इसके लिए 35 साल और अशोक वाजपेयी ने 21 साल इंतजार क्यों किया? इसी तरह अगर कांग्रेस और वामपंथ इतने ताकतवर होते कि लेखकों को इस विरोध के लिए अपने दम पर खड़ा कर देते तो उन्होंने भी पहले यह काम क्यों नहीं किया? अटल सरकार के दौर में यह साज़िश क्यों नहीं हुई? और अगर लेखकों को सिर्फ फायदा हासिल करने के लिए कोई राजनीतिक पक्ष चुनना है तो वे कांग्रेस और वामपंथ के कमज़ोर हो चुके किलों से ये लड़ाई क्यों लड रहे हैं – वे नरेंद्र मोदी के साथ क्यों नहीं हो लेते जिनके पास सारी सत्ता है? सच तो यह है कि पुरस्कार वापसी की पहल में उन लेखक संगठनों की कोई भूमिका नहीं थी जिन्हें यह काम कुछ ज़्यादा तेज़ी से करना चाहिए था. बेशक, बाद में प्रलेस, जलेस और जसम ने एक रुख अख़्तियार किया और लेखकों को जोड़ने की कोशिश की, लेकिन यह पूरा विरोध स्वत: स्फूर्त रहा.

एक राजनीतिक आरी जैसे हिंदुस्तान का सीना चाक करने में लगी हुई है. वह मंदिर-मस्जिद के नाम पर, गाय और सुअर के बहाने, इतिहास के गलत हवाले देते हुए, जैसे हज़ार साल की पूरी परंपरा पर कुठाराघात कर रही है.

यह स्वतःस्फूर्तता ही इस आरोप का जवाब है कि इस विरोध के पीछे कोई एक तर्क नहीं है. यह एक आणविक धमाके जैसा है जिसमें एक कण से पैदा हुआ चेन रिऐक्शन एक बड़े विस्फोट में बदल जाता है. लेखकों के भीतर यह विस्फोट अपनी-अपनी वजहों से हुआ है. इन सबको जोड़ कर देखें तो यह समझ में आता है कि अभी माहौल में जितनी घुटन है उतनी पहले कभी नहीं थी. बेशक, इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का सबसे स्याह पन्ना थी, लेकिन उसमें जो हो रहा था वह सबके साथ था और ऐसा था कि एक व्यक्ति के जाते ही खत्म हो सकता था. उस इमरजेंसी की सबसे ज़्यादा चोट इंदिरा गांधी ने ही खाई, लोकतंत्र ने उन्हें पराजित किया. इसी तरह 1984 की हिंसा हमारे सार्वजनिक जीवन के सबसे शर्मनाक अध्यायों में है, मगर राजीव गांधी के एक नासमझ जुमले के अलावा उसे राज्य या सत्ता का समर्थन हासिल नहीं था.

लेकिन अब जो हो रहा है, वह ज़्यादा ख़तरनाक है. एक राजनीतिक आरी जैसे हिंदुस्तान का सीना चाक करने में लगी हुई है. वह मंदिर-मस्जिद के नाम पर, गाय और सुअर के बहाने, तुष्टीकरण का टंटा खड़ा करके, इतिहास के गलत हवाले देते हुए, जैसे हज़ार साल की पूरी परंपरा पर कुठाराघात कर रही है. और जो लोग इसका विरोध करना चाहते हैं, उनके सिर पर एक अदृश्य तलवार सी टंगी हुई है. उन्हें या तो खामोश रहना है, या साथ रहना है, नहीं तो धर्मद्रोही, देशद्रोही, विकास-विरोधी कुछ भी करार दिए जा सकते हैं.

दरअसल यही क्षोभ है जो इन लेखकों के भीतर बड़ा हो रहा है. लेखक इसी दुनिया के लोग होते हैं और उनमें समाज के सारे गुण-दुर्गुण भी होते हैं. वे प्रलोभन के शिकार हो जाते हैं, वे कमज़ोर पड़ जाते हैं, कायरता दिखाते हैं, वे पुरस्कारों के लिए जोड़तोड़ करते हैं, वे सत्ता के साथ चलने में भलाई भी देखते हैं, लेकिन इस सारी दुनियादारी के बीच उन्हें भी गुस्सा आता है, छटपटाहट होती है जोकि होनी भी चाहिए क्योंकि वे समाज के सबसे संवेदनशील लोगों में होने के चलते ही तो लेखक हो सकते हैं. इसकी अभिव्यक्ति के उनके तरीके उनके पास मौजूद माध्यम के मुताबिक होते हैं. वह सम्मान लौटाने का बहुत छोटा सा – चाहें तो इसे सुविधाजनक भी कह लें – कदम भी हो सकता है.

जो लोग अब इस प्रतिरोध को अपना समर्थन दे रहे हैं, उनके लिए यह पुलकित होने से ज़्यादा सतर्क होने का समय है. उनके सामने जो चुनौती खड़ी है, वह बहुत बड़ी है

जिन्हें सरकार और उनके कारकून, बेहद मामूली, अनजान से लेखक बता रहे हैं, उनके इस विरोध पर उनके पांव कांप रहे हैं तो इसलिए कि हमारी बहुत सारी सामाजिक और राजनीतिक विफलताओं से प्रतिरोध का जो स्वर मर गया था, वह अचानक सांस लेने लगा है, वह आंख खोलकर अपने चारों ओर देखने लगा है. वह पुरस्कार का सोना छोड़ रहा है और विरोध का लोहा उठा रहा है. यही चीज़ सरकार और उसके कारकूनों को डरा रही है.

हो सकता है, आने वाले दिनों में यह आवाज़ मद्धिम पड़ जाए. इंसानों की तरह आंदोलन भी थकते हैं, ख़त्म हो जाते हैं. और प्रतिरोध का यह पौधा तो एक बिल्कुल ऊसर ज़मीन पर रोपने की कोशिश की जा रही है जो बड़ा हो गया तो पूरी पारिस्थितिकी पर असर डाल सकता है. इसलिए जो लोग अब इस प्रतिरोध को अपना समर्थन दे रहे हैं, उनके लिए यह पुलकित होने से ज़्यादा सतर्क होने का समय है. उनके सामने जो चुनौती खड़ी है, वह बहुत बड़ी है – बिल्कुल दैत्याकार.

हो सकता है, देर-सबेर यह प्रतिरोध हार जाए. लेकिन हार भी जाए तो क्या? इतिहास में यह तो दर्ज होगा कि जब लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सत्ता आढ़े-तिरछे जा रही थी तब लेखकों ने इसका अपने ढंग से विरोध किया था. मगर इतिहास में दर्ज होने के लिए नहीं, वर्तमान को पटरी पर लाने के लिए भी ज़रूरी है कि ये आवाज़ें जिंदा रहें, सम्मान लेने से ज्यादा लौटाना सम्मानजनक लगे और सत्ता के कंगूरे झुक-झुक कर पहचानने की कोशिश करें कि आखिर यह सड़क पर चलता लेखक कौन है, कहां से आ रहा है और वह उनके दिए पुरस्कार लौटा क्यों रहा है. वह विकास के उस झांसे में क्यो नहीं आता जिस पर एक पूरा खाता-पीता अघाया मध्यवर्ग रीझा हुआ है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. बहुत अच्छा और ऊर्जा देने वाला आलेख है । साधु ।

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