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अब ताप में हाथ मत तापिए..

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चिन्ता की बात है. देश तप रहा है! चारों तरफ़ ताप बढ़ रहा है! क्षोभ, विक्षोभ, रोष, आवेश से अख़बार रंगे पड़े हैं, टीवी चिंघाड़ रहे हैं, सोशल मीडिया पर जो कुछ ‘अनसोशल’ होना सम्भव था, सब हो रहा है! लोग सरकार को देख रहे हैं! सरकार किसी और को देख रही है! कुत्ते संवाद के नये नायक हैं!

-क़मर वहीद नक़वी॥

इस बार अक्तूबर कुछ ज़्यादा ही गरम है. हर तरह से! ताप चढ़ा है. मौसम को भी और देश को भी. दोनों ही लक्षण अच्छे नहीं हैं! वैसे भी मेडिकल साइन्स कहती है कि बुख़ार अपने आपमें कोई बीमारी नहीं! वह तो बीमारी का लक्षण है! बीमारी शरीर में कहीं अन्दर होती है, बुख़ार बाहर दिखता है! अक्तूबर तप रहा है, बीमारी कहाँ है? सबको पता है, पर्यावरण बीमार हो रहा है! किसका दोष? तेरा कि मेरा? किसका कचरा? तेरा कि मेरा? लड़ो! लड़ते रहो! विकास की दौड़ में तुम न रुको, तो मैं क्यों रुकूँ? देखा जायेगा! लेकिन कौन देखेगा? मौसम की आँखें कहाँ होती हैं? वह कुपित होता है तो कब देखता है कि वह किसको मार रहा है?image

We all must Act Fast to curb Growing Intolerance in India

कोप आया नहीं कि विवेक गया!

मौसम की छोड़िए, वैसे भी कोप और विवेक एक गली में कभी नहीं समाते. कोप आया नहीं कि विवेक गया नहीं! मरीज़ का ताप भी बढ़ जाये तो सबसे पहले वह होश ही खोता है!

चिन्ता की बात है. देश तप रहा है! चारों तरफ़ ताप बढ़ रहा है! क्षोभ, विक्षोभ, रोष, आवेश से अख़बार रंगे पड़े हैं, टीवी चिंघाड़ रहे हैं, सोशल मीडिया पर जो कुछ ‘अनसोशल’ होना सम्भव था, सब हो रहा है! लोग सरकार को देख रहे हैं! सरकार किसी और को देख रही है! कुत्ते संवाद के नये नायक हैं!

क्यों इतना ज़हर?

लोग तप रहे हैं. तपाये जा रहे हैं! किसी से दो मिनट बात कीजिए. हिन्दू हैं, मुसलमान हैं, सिख हैं, ईसाई हैं, इस राज्य के हैं, उस राज्य के हैं, यह भाषा बोलते हैं या वह भाषा बोलते हैं, जिसे भी कुरेदिये, थोड़ी देर में भीतर से ज्वालामुखी फूट पड़ता है! हैरानी होती है. इतना ज़हर भर चुका है, भरा जा चुका है लोगों के भीतर!

पढ़े-लिखे लोग हैं. समझदार हैं. अच्छी नौकरियों में हैं. अच्छे बिज़नेस में हैं. भरपूर कमाई है. लेकिन फिर भी ग़ुस्से से खौल रहे हैं! तरह-तरह के ग़ुस्से हैं. तरह-तरह की नफ़रतें हैं. तरह-तरह की कहानियाँ हैं. तरह-तरह की मनगढ़न्त धारणाएँ हैं. इतिहास के झूठे-सच्चे पुलिंदे हैं. इसके ख़िलाफ़, उसके ख़िलाफ़. जिसे देखो किसी न किसी के ख़िलाफ़ दिखता है! हर किसी के पास अपने-अपने निशाने हैं, अपने-अपने ‘टारगेट’ हैं, जिसे बस उड़ा देना है! यह हो क्या रहा है देश में?

चिनगारियाँ भड़काने का बेलगाम सिलसिला!

अजब माहौल है. पिछले दस-बारह दिनों से कोई पंजाब को फिर से दहकाने के षड्यंत्र में लगा है! उधर, महाराष्ट्र में शिव सेना अपनी विशिष्ट ‘लोकतांत्रिक’ स्याही से बीजेपी के लिए पाकिस्तान नीति का नया भाष्य लिखने में लगी है! शिव सेना ने बता दिया कि महाराष्ट्र का ‘बिग बाॅस’ कौन था, है, और रहेगा, सरकार चाहे जिसकी रहे! बीजेपी को अब पता चल रहा है कि सरकार में रहने की मजबूरी क्या होती है? वरना, इसके पहले पाकिस्तान पर कब उसकी भाषा शिव सेना से अलग थी! उधर, गुजरात में पटेल ग़ुस्से में हैं. आरक्षण-विरोध से पूरे देश को तपाने की तैयारी है. और गुजरात सरकार को देखिए. पटेल न भड़कते हों तो भड़क जायें, इसलिए हार्दिक पटेल पर देशद्रोह की धाराएँ जड़ दीं. क्यों? ऐसा क्या किया हार्दिक पटेल ने?

यहाँ आरक्षण का मुद्दा, वहाँ हरियाणा में एक दलित परिवार के दो मासूम बच्चों को ज़िन्दा भून दिये जाने की दिल दहला देने वाली घटना! दादरी में गोमांस की अफ़वाह फैला कर भीड़ का उन्मादी हमला! जम्मू-कश्मीर के एक विधायक का ‘बीफ़ पार्टी’ देकर हिन्दुओं को मुँह चिढ़ाने की घिनौनी कोशिश, फिर विधानसभा में उसकी पिटाई और दिल्ली में स्याही का तमाशा, एक मुख्यमंत्री से लेकर केन्द्र के कई मंत्रियों तक, कुछ सांसदों से लेकर साध्वियों तक, ओवैसियों से लेकर आज़म ख़ानों तक, चिनगारियाँ भड़काने, खिल्लियाँ उड़ाने और जले पर नमक छिड़कने वाले बयानों का बेलगाम सिलसिला!

जो टोके, वह छवि बिगाड़े!

और कोई रोके-टोके, विरोध जताये, बताये कि देश का माहौल बिगड़ रहा है, सुधारने के लिए कुछ करो, बात सुनो, नहीं सुनते और कुछ नहीं करते इसलिए कुछ लेखक पुरस्कार लौटा दें तो उन्हें देश-विरोधी घोषित कर दो कि वह दुनिया में भारत की छवि ख़राब कर रहे हैं! अद्भुत! तमाम ‘धर्म रक्षा’ सेनाएँ बारूद सुलगाती रहें, इस-उस अफ़वाह के नाम पर लोगों की जान लेती रहें, ‘परिवार’ के अख़बार घोर साम्प्रदायिक मिसाइलें दाग़ते रहें, उनसे भारत की छवि नहीं ख़राब होती! छवि तब ख़राब होती है, जब कोई इसके विरोध में बोले!

क्या कर सकती है सरकार?

और फिर पूछा जाता है कि सरकार क्या करे इसमें? सरकार यानी केन्द्र सरकार! क्या मासूमियत है? भोली सरकार को, उसके मुखिया को, सरकार चलानेवाली पार्टी को पता ही नहीं कि वह क्या कर सकती है? या उसे कुछ करना चाहिए! सरकार चेतावनियाँ जारी कर सकती थी. कभी नहीं की. सरकार अपने मंत्रियों और सांसदों पर चाबुक लगा सकती थी. बड़े दिनों तक कन्नी काटे बैठी रही, फिर आख़िर तीन-चार लोगों का समझावन-बुझावन हुआ भी, लेकिन कोई समझा ही नहीं! मनमोहन सिंह से किस मामले में कम मजबूर सरकार है यह? उनकी सरकार में रोज़ मंत्रियों के भ्रष्टाचार के क़िस्से आते थे, मोदी सरकार के मंत्री रोज़ बेहूदे बयानों के गोले दाग़ते रहते हैं, वह सरकार भी कुछ नहीं कर पायी, यह सरकार भी कुछ नहीं कर पायी! अच्छा चलो, सरकार अपने मंत्रियों को नहीं रोक पायी. कम से कम दो-चार सद्भावना रैलियाँ तो हो सकती थीं. सैंकड़ों चुनावी रैलियाँ हो सकती हैं, तो देश के चार कोनों में चार सद्भावना रैलियाँ क्यों नहीं? राजपथ पर योग हो सकता है, तो राजघाट पर सद्भावना उपवास क्यों नहीं? सबको सन्देश जाता कि नहीं जाता कि सरकार क्या चाहती है?

सवाल यही है कि क्या सरकार कोई ऐसा सन्देश देना भी चाहती है! सरकार को भी और लोगों को भी अब सोचना चाहिए कि देश का ताप कैसे घटे? बस कीजिए तेरा दोष, मेरा दोष! अब ताप में हाथ मत तापिए, बल्कि ताप घटाइए! मौसम की तरह समय की आँखें भी नहीं होतीं!

राग देश

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