/इस ट्रेलर से डर लगता है..

इस ट्रेलर से डर लगता है..

हम जिस दौर में जी रहे हैं उसमें सबकुछ संभव है.. जिस भय का पहला कदम समक्ष आ जाए और हम फिर भी शुतुरमुर्ग बने रहें तो उसे समय कभी माफ़ नहीं करता। कॉर्पोरेट जगत की आंगन तक आ धमकने की हरकत को बयां करती एक रिपोर्ट..

-सतीश मिश्रा॥

इस ट्रेलर से डर लगता है.. यह ऐसा ट्रेलर है जिसे देखकर सिहरन हो रही है। अगर ये ट्रेलर सफल रहा तो समझ लीजिये फीचर फ़िल्म का बनना और उसका भारत में हमेशा सुपर डुपर हिट होना तय है। क्या आपने उस परिदृश्य और मानसिक हालात की कल्पना की है जब आप मोदी, सोनिया, पवार, मुलायम, बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी और एसपी के बदले विप्रो, फ्लिपकार्ट, रिलायंस, अडानी पावर, टाटा, बिड़ला पार्टी और कॉर्पोरेट समूहों प्रायोजित कैंडिडेट को वोट देने के लिए घंटों चिलचिलाती धूप में खड़े रहेंगे।Ernakulam_junction_railway_station

ये बात हवाई नहीं बल्कि सत्य है जिसका ट्रायल रन केरल के एर्नाकुलम जिले की एक ग्राम पंचायत के चुनाव में हो रहा है। यह कोई मामूली पंचायत इलेक्शन नहीं है, यह एक ऐसा ट्रायल बॉल फेंका जा रहा है जिसकी सफलता के बाद भारत से लोकतंत्र नाम की चिड़िया का कोई नामलेवा भी नहीं बचेगा। 5 नवंबर को किजाककांबलम नामक पंचायत के लिए वोट डाले जाएंगे जहां अन्ना-किटेक्स केरल की सबसे बड़ी गारमेंट कंपनी लगी है। गांव में कारखाना चला रही कंपनी का दावा है कि राजनीतिक दल गांव के विकास में बाधा डाल रहे हैं।

2020 तक उसे देश की आदर्श पंचायत बनाने का दावा करनेवाली कंपनी ने 19 वार्डों में अपने उम्मीदवार उतारे हैं। ग्राम पंचायत का कहना है कि कंपनी ने बार-बार शिकायत करने के बावजूद गंदगी, प्रदूषण, भूगर्भ जलदोहन की रोक के लिए कोई कदम नहीं उठाए। इसके अलावा वह न्यूनतम वेतन का उल्लंघन व श्रमकानून की खुलेआम अनदेखी कर रही है जिसके मद्देनजर ग्राम पंचायत ने उसे NOC देने से इनकार कर दिया और इसकी शिकायत विभिन्न सरकारी विभागों में की है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि राजनीति एक दलदल है और कोई पार्टी दावा नहीं कर सकती कि उसकी पार्टी में भ्रष्ट, दागी और बागी नहीं हैं लेकिन यह भी तो मानना पड़ेगा कि होता तो है सब कुछ डेमोक्रेसी के दायरे में। कॉर्पोरेट के आने के बाद डेमोक्रेसी कितनी बचेगी इसी पर सब की निगाहें हैं। क्या कारखाने का मजदूर अपने मालिक के आदेश के खिलाफ बोल सकेगा या वोट देगा? मतदान के दिन विरोध करने के बावजूद वह ये नहीं भूलेगा कि शेष 364 दिन उसे उसी कंपनी में जाना है।

माना कि कॉरपोरेट समूह इस समय भी तो पार्टियों की विचारधारा तय करने से लेकर प्रत्याशी चुनने में दखलंदाजी कर ही रहे हैं। कई जनता के प्रतिनिधि तो वास्तव में कॉरपोरेट समूह के फ्रंटमैन होते हैं। हर प्रबुद्ध को इनकी प्रतिबद्धता का अंदाजा है लेकिन अगर यही खुलेआम पर हो जाए तो बचेगा क्या? लोकतंत्र के बदन का ये आखिरी वस्त्र भी निकल गया तब?

अगर कंपनियां पार्टी के नाम में अपने नाम भी जोड़ लें अथवा पार्टी किसी कंपनी के स्वामित्व वाली हो, तब की कल्पना कीजिये? अगर मान लो टाटा नगर या मोदी नगर में चुनाव हो रहे हों और अपने 90% कर्मचारियों को देखते हुए वहां टाटा या मोदी कंपनियां अपने कैंडिडेट खड़ा कर दें, तो कौन कर्मचारी अपनी नौकरी दांव पर लगाकर बीजेपी और कांग्रेस को वोट देने की सोचेगा भी? एर्नाकुलम की पंचायत का यह चुनाव लोकतंत्र को नई परिभाषा देगा।

अब तो वह तबका भी वोट करेगा जो अब तक मतदान के दिन परिवार सहित छुट्टी मनाने शहर से बाहर चला जाता था और इसे निचले तबके के लोगों का काम मानकर वोट की लाइन में खड़ा होना अपनी तौहीन समझता था। राजनीति में घालमेल का यह सिलसिला दो-ढ़ाई दशक पहले यूपी-बिहार से शुरू हुआ जब नेताओं ने बाहुबलियों के प्रभुत्ववाले क्षेत्र के वोट पाने के लिए उनकी मदद दी। बाद में जब बाहुबलियों ने देखा कि अगर उनके प्रयासों से ही नेता विधायक-सांसद बन जा रहे हैं तो वे खुद क्यों न प्रयास करें और बस यहीं से सारी समस्या शुरू हुई।

लुब्बे-लुबाब यह है कि…

अतीक अहमद, शहाबुद्दीन, आनंद मोहन, डीपी यादव, हरिशंकर तिवारी, वीरेंद्र प्रताप साही, राजा भैया, धनंजय सिंह, मुख्तार अंसारी, पप्पू यादव, सूरजभान सिंह, तस्लीमुद्दीन(केंद्रीय गृहराज्य मंत्री) और महाराष्ट्र में अरुण गवली नाम वे हैं जो आरोपों के बीच विधानसभा-संसद तक ही नहीं पहुंचे बल्कि मंत्री तक बने। अब जनचेतना की बदौलत ढ़ाई दशक बाद लोगों ने बाहुबलियों को उनकी जमीन दिखाना शुरू कर दिया है फिर भी यक्ष प्रश्न यही है कि क्या कंपनियां उन्हीं बाहुबलियों का जगह नहीं लेने जा रही हैं?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.