/ये तो मोदी और शाह की हार है..

ये तो मोदी और शाह की हार है..

-ओम माथुर॥

बिहार में कौन हारा? सीधा जवाब तो यही है कि भारतीय जनता पार्टी। लेकिन क्या यही सच्चाई है? शायद नहीं। बिहार में जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने खुद को झोंक दिया और उनके सामने पार्टी गौण हो गई थी,उसे देखते हुए तो ये हार व्यक्तिगत रूप से मोदी व शाह के खाते में जानी चाहिए। एक राज्य के चुनाव में शायद ही कभी किसी प्रधानमंत्री ने इस तरह खुद को झोंका हो। भाजपा को पूरी उम्मीद थी कि मोदी का जादू बिहार में भी सिर चढ़कर बोलेगा। लेकिन दिल्ली के बाद बिहार में भाजपा को जोर का झटका जोर से ही लगा है। एक और बात,अगर बिहार जीतते,तो सारा श्रेय भी तो मोदी-शाह ले जाते। तो फिर हार की जिम्मेदारी भी उनकी क्यों ना हो।unnamed

आखिर क्या कारण रहे इस हार के? सबसे बड़ा तो खुद प्रधानमंत्री सहित भाजपा के अधिकांश नेताओं ने अपनी भाषा का संयम खो दिया। जिस तरह की अनाप-शनाप भाषा और आक्रामकता इस चुनाव में इस्तेमाल की गई,उसकी उम्मीद केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं से नहीं की जाती। प्रधानमंत्री के भाषण ठीक वैसे ही होते थे,जैसे वे लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पर प्रहार करते हुए आक्रामकता से देते थे। लेकिन तब वो विपक्षी पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे और बिहार चुनावों के समय प्रधानमंत्री। इस अंतर को मोदी भूल गए, लिहाजा उनके आक्रामक और व्यक्तिगत आक्षेप वाले भाषण उन पर ही भारी पड़े। फिर उनके मंत्री और पार्टी के नेता बेतुके बयानों की आग में निरन्तर घी डालते रहे।

सबका साथ सबका विकास की बात करने वाले मोदी खुद बिहार चुनाव में अपनी ही बात से भटक गए और उनके भाषणों से विकास का मुद्दा गायब हो गया। कभी वो बिहार में जंगल राज पार्ट टू,तो कभी नितिश कुमार के डीएनए तो कभी लालू में शैतान घुस जाने की बात करने लगे। अमित शाह ने यहां तक कह दिया कि अगर बिहार में महागठबंधन जीता,तो पाकिस्तान में पटाखे चलाए जाएंगे। हालांकि मोदी व उनके नेताओं के बयानों का जवाब महागठबंधन के नेताओं की ओर से भी आया। लेकिन नुकसान भाजपा को ज्यादा हुआ। इसके अलावा भाजपा नितिश कुमार व लालू यादव के वोट बैंक के समीकरण व जनाधार को प्रभावित नहीं कर पाई। उसने जिन जीतनराम मांझी,रामविलास पासवान व अनंत कुशवाहा पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया,वह कुल जमा छह सीटें ही जीत पाए।

प्रधानमंत्री सहित कई भाजपा नेता व मंत्रियों की भाषा कई बार अहंकारी होने का अहसास भी लोगों को कराती रही। जिसका खामियाजा भी उन्हें उठानी ही पड़ा है।
इसमें शक नहीं है कि प्रधानमंत्री बनने के करीब डेढ़ साल में मोदी ने कई काम किए हैं और कर रहे हैं। गरीबों पर केंद्रित कई बड़ी योजनाएं शुरू की गई। दावा किया गया कि उनके कारण विदेशों में भारत की छवि सुधरी है और दुनिया के देश हमें ताकत मानने लगे हैं। लेकिन मोदी विदेशों में छवि बनाने के चक्कर में देश में अपनी छवि पर बट्टा लगवा बैठे। वे शायद भूल गए कि उन्होंने जो भी काम किए,वह लोगों को जमीन पर नजर नहीं आए।

हमारे देश के लोगों की मानसिकता है कि वह सरकार बदलने के बाद तत्काल खुद को मिलने वाले लाभ की बात सोचते हैं और पिछले सरकार से उसकी तुलना करते हैं। इसलिए जब मंहगाई बढ़ गई और लोगों का दाल-रोटी खाना भी मुहाल हो गया। जब प्याज ने लोगों के आंसू निकाल दिए और जब बाकी उपभोक्ताओं वस्तुओं के दाम भी बढ़ते गए। तो लोगों को इस बात से मतलब नहीं रहा कि जनधन योजना में कितने खाते बैंकों में खुल गए या कितने लोगों ने गैस सब्सिड़ी छोड़ दी। या फिर मेक इन इंडिया में कितना निवेश हो गया या कि प्रधानमंत्री के विदेश दौरों से देश ने क्या-क्या हासिल कर लिया।
बिहार की हार भाजपा व खुद मोदी के लिए खतरे की घंटी है। पार्टी को लोकसभा चुनावों में मिली जीत के हैंगओवर से अब बाहर आकर पुनरावलोकन करने की जरूरत हैं। अगले दो सालों में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं और अगर अब भी भाजपा नहीं चेती,तो उसके लिए मुसीबतें खड़ी हो जाएगी। इस हार से पार्टी पर से मोदी-शाह के एकाधिकार पर भी लगाम लग सकती है।

लेखक दैनिक नवज्योति अजमेर के स्थानीय संपादक हैं..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.