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आइएसआइएस और औंधी सुरंगें..

By   /  November 21, 2015  /  No Comments

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आइएसआइएस दुनिया को ‘इसलामी ख़िलाफ़त’ बनाना चाहता है. लेकिन वह ख़ुद दुनिया के ज़्यादातर मुसलमानों के ख़िलाफ़ है! क्योंकि वह उन्हें मुसलमान मानने को ही तैयार नहीं! और दुनिया के ज़्यादातर मुसलमान आइएसआइएस को ही इसलाम के ख़िलाफ़ मानते हैं! आइएसआइएस के क़त्लेआम को, तमाम हैवानी अत्याचारों को, यज़ीदी महिलाओं को यौन-दासियाँ बनाने को और इसलाम की उसकी मनगढ़न्त व्याख्याओं को दुनिया के ज़्यादातर मुसलमान ‘ग़ैर-इसलामी’ मानते हैं!

-कमर वहीद नक़वी॥
ख़िलाफ़त और ख़िलाफ़! लोग अकसर इन्हें एक ही समझ लेते हैं! यही कि ख़िलाफ़ से ख़िलाफ़त बना होगा शायद! लेकिन ऐसा नहीं! दोनों के अर्थ अलग-अलग हैं! समझने की भूल होती है!

और यह समझने की भूल कहीं भी हो सकती है! मसलन, आइएसआइएस (ISIS) दुनिया को ‘इसलामी ख़िलाफ़त’ (Islamic Caliphate) बनाना चाहता है. लेकिन वह ख़ुद दुनिया के ज़्यादातर मुसलमानों के ख़िलाफ़ है! क्योंकि वह उन्हें मुसलमान मानने को ही तैयार नहीं! और दुनिया के ज़्यादातर मुसलमान आइएसआइएस (ISIS) को ही इसलाम के ख़िलाफ़ मानते हैं! आइएसआइएस (ISIS) के क़त्लेआम को, तमाम हैवानी अत्याचारों को, यज़ीदी महिलाओं को यौन-दासियाँ बनाने को और इसलाम की उसकी मनगढ़न्त व्याख्याओं को दुनिया के ज़्यादातर मुसलमान ‘ग़ैर-इसलामी’ मानते हैं! लेकिन कम ही लोग हैं, जो इस अन्तर को समझते हैं कि पूरी दुनिया के मुसलमान आइएसआइएस (ISIS) की ‘इसलामी ख़िलाफ़त’ (Islamic Caliphate) के ख़िलाफ़ हैं!image

Why vast majority of Muslims consider s ISIS an Anti-Islamic Force?
मुसलमानों का विरोधी आइएसआइएस!

आइएसआइएस (ISIS), बोको हराम (Boko Haram), तालिबान (Taliban), अल-क़ायदा (Al-Qaida), यह कुछ छवियाँ हैं जो हाल के कुछ बरसों में मुसलमानों के नाम पर बनीं! और इन सारी छवियों का स्रोत एक ख़ास क़िस्म का पुरातनपंथी शुद्धतावादी और नितान्त असहिष्णु इसलाम है, जो हर आधुनिक विचार का, हर आधुनिक ज्ञान का विरोधी है! यहाँ तक कि उसकी नज़र में दाढ़ी काटना, क़मीज़-पतलून पहनना और वोट देना भी ग़ैर-इसलामी है! उसके लिए समय डेढ़ हज़ार साल पहले थम चुका है. वे दुनिया को वापस वहीं पहुँचाना चाहते हैं! सनक की भी इन्तेहा है!
यक़ीनन यह ‘आइएसआइएस मार्का इसलाम’ (ISIS’ version of Islam) पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है और मुसलमानों के लिए भी! रूसी विमान को मार गिराने और पेरिस जैसी कुछ घटनाओं को छोड़ दें, तो मुसलमानों के इन ‘मसीहाओं’ ने अभी तक तो मुसलमानों को ही निशाना बनाया है, मुसलिम औरतों को ही अपनी हैवानियत का निशाना बनाया है. क्योंकि उनकी नज़र में वे सब ‘इसलाम के गुनाहगार’ थे! इसीलिए मुसलमानों के तमाम तबक़े और सम्प्रदाय इस तथाकथित ‘इसलामी ख़िलाफ़त’ (Islamic Caliphate) के ख़िलाफ़ हैं!

इसलाम का प्रतिनिधि नहीं आइएसआइएस!
पेरिस जैसी शैतानी हिंसा के बाद दुनिया का आगबबूला होना लाज़िमी है. कौन नहीं होगा, जो ऐसी किसी वारदात से क्षोभ से भर नहीं उठेगा. लेकिन यह क्षोभ अगर आइएसआइएस (ISIS) जैसे मुसलिम विरोधी संगठन को ही इसलाम का पर्यायवाची घोषित कर दे तो यह किसकी मदद करता है? पेरिस हमले के बाद यूरोप में और अपने देश में भी कुछ ऐसी ही दक्षिणी हवा चली! चलायी गयी!

यह ठीक है कि आइएसआइएस (ISIS) के लोग मुसलमान हैं और वह जो कर रहे हैं, क़ुरान और इसलाम के नाम पर कर रहे हैं. ठीक है कि दुनिया के कुछ मुसलिम देश और उनकी सेनाएँ, उनके तस्कर आइएसआइएस (ISIS) की मदद कर रहे हैं, लेकिन यह सत्य का एक पहलू है. सत्य का दूसरा पहलू इससे कहीं अति विराट है और वह यह है कि दुनिया के मुसलमानों का बहुत-बहुत बड़ा हिस्सा हर दिन आइएसआइएस (ISIS) की क्रूरताओं की ख़बरें पढ़ कर बेहद चिन्तित होता है. कम से कम उनसे तो ज़्यादा ही चिन्तित होता है जो आइएसआइएस (ISIS) और मुसलमानों को एक समझते हैं! या सोच-समझ कर उन्हें एक दिखाने वाले चश्मे बाँटते फिर रहे हैं!

दुनिया के लिए बहुत बड़ा ख़तरा
आइएसआइएस (ISIS) यक़ीनन आज की दुनिया के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है. वह महज़ एक आतंकवादी संगठन नहीं है, जिसके लक्ष्य सीमित हों, जिसका अभियान किसी एक देश या कुछ देशों के ख़िलाफ़ हो, जो किसी या कुछ भौगोलिक क्षेत्रों के दायरे में अपना कार्यक्षेत्र देखता हो. बल्कि आइएसआइएस (ISIS) पूरी दुनिया को ‘इसलामी ख़िलाफ़त’, एक इसलामी राज्य और एक ‘इसलामी ध्वज’ के अन्तर्गत देखना चाहता है! आज की दुनिया में इससे ज़्यादा ख़तरनाक मंसूबा और क्या हो सकता है? दुनिया की किसी परमाणु शक्ति ने आज तक सपने में भी ऐसा सोचने का दुस्साहस नहीं किया! फिर आइएसआइएस (ISIS) ऐसा क्यों सोच रहा है और इतने दिनों से लगातार अपने वर्चस्व वाले इलाक़ों का विस्तार कैसे करता जा रहा है?

धर्म का हथियार
ज़ाहिर है कि उसके पास बाक़ी संसाधनों और हथियारों के साथ धर्म का भी एक हथियार है, जिससे उसे कुछ ज़्यादा ही उम्मीदें हैं. इन उम्मीदों की वजह है. मुसलमान आमतौर पर धर्म के शिकंजों में कहीं ज़्यादा कसे हुए हैं. शिक्षा में पिछड़े, आर्थिक बदहाली के शिकार, मध्ययुगीन सांस्कृतिक रूढ़ियों में जकड़े, आधुनिकता से जाने या अनजाने कटे या ख़ुद को काटे हुए और सदियों के इतिहास से लेकर अब तक आर्थिक-राजनीतिक मोर्चे पर पश्चिम से पिटते रहने के अरब के सतत पराजय- बोध से ग्रस्त उनका अपना अलग ही संसार है! दुनिया की मुसलिम राजनीति बरसों से इन्हीं धुरियों पर घूम रही है, इसलिए आइएसआइएस (ISIS) भी यहीं से शक्ति के स्रोत पाना चाहे, तो आश्चर्य कैसा?

ISIS की ख़तरनाक योजना!
फ़िलहाल आइएसआइएस (ISIS) का सोचना है कि वह पहले सारे ‘शुद्धतावादी मुसलमानों’ को अपनी ‘ख़िलाफ़त’ में लाये, फिर इसलाम के दूसरे सम्प्रदायों को अपनी छाप वाले इसलाम को अपनाने पर मजबूर करे और फिर दुनिया के दूसरे हिस्सों और धर्मों पर धावा बोले और लोकतंत्र को सदा सर्वदा के लिए दुनिया से मिटा दे!

साज़िश बड़ी ख़तरनाक है और योजना शायद कई बरसों या सदियों की है. इसलिए आइएसआइएस (ISIS) और उस जैसे विचारोंवाले दूसरे संगठनों का पूरी तरह जड़ से सफ़ाया किया जाना ज़रूरी है. जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी! यह काम ज़्यादा कठिन नहीं है बशर्ते कि एकजुट हो कर आइएसआइएस (ISIS) और उसके मददगारों पर हमला बोला जाये.

लेकिन आइएसआइएस (ISIS) को सारे मुसलमानों या इसलाम की पहचान से जोड़ देना पूरी लड़ाई को कहीं और मोड़ देगा! आप क्या चाहते हैं? आइएसआइएस (ISIS) को ‘खल्लास’ करना, या बरसों पहले पेश की गयी ‘सभ्यताओं के युद्ध’ की थ्योरी को साकार करना, जिसे दुनिया जाने कबके रद्दी की टोकरी में फेंक चुकी है! दुनिया भर में भी और भारत में भी मुसलमानों के तमाम बड़े उलेमा आइएसआइएस (ISIS) के ख़िलाफ़ खुल कर आ चुके हैं. हाँ, उन्हें कुछ और मुखर होना चाहिए और लड़ाई की धार को और तेज़ करना चाहिए. साथ ही मुसलिम समाज में आधुनिकता की रोशनियाँ आने देने के लिए कुछ खिड़कियाँ भी खोलनी चाहिए, ताकि ‘जिहाद’ की ऐसी औंधी सुरंगों के झाँसों में उन्हें फँसाया न जा सके.

http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

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  • Published: 2 years ago on November 21, 2015
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  • Last Modified: November 21, 2015 @ 10:12 am
  • Filed Under: दुनियां

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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