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जिंदल, जमीन और हरीश रावत के बीच घोटाले का त्रिकोण..

By   /  December 2, 2015  /  No Comments

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कारोबारी नवीन जिंदल के भतीजे प्रतीक जिंदल को अवैध तरीके से उत्तराखंड में गांव वालों की ज़मीन देने से लोगों में फैला आक्रोश..
गांववालों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार राज्य के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नियमों की अनदेखी करके दी ज़मीन..

-अभिषेक श्रीवास्तव||

ढलते नवंबर की एक ढलती हुई शाम उस गांव में शादी थी, लेकिन उसका पंडाल हाइवे से थोड़ी ऊंचाई पर वीरान पड़ा था. सड़क किनारे अचानक झुटपुटे में सुलग आई मशालों ने उसकी चमक फीकी कर दी थी. क्‍या बाराती और क्‍या दूल्‍हा, सब के सब गांव वालों के साथ सड़क किनारे एक दूसरे पंडाल में इकट्ठा थे.harish-rawat-pratik-jindal-lead

अचानक एक बस आकर सड़क किनारे रुकती है. बस पर उत्‍तराखण्‍ड परिवर्तन पार्टी का बैनर बंधा है. उसके भीतर से जैसे ही कुछ लोग अभिवादन करते हुए बाहर निकलते हैं, रानीखेत की शांत वादियां आक्रामक नारों से दहक उठती हैं.

“जिंदल तेरी कब्र खुदेगी, नैनीसार की धरती पर”, “गली-गली में शोर है, हरीश रावत चोर है” – जुलूस की शक्‍ल में तब्‍दील होते इन नारों की अगुवाई औरतों और बच्‍चों के हाथों में है.

देखते-देखते हाइवे पर बचा-खुचा ट्रैफिक थम जाता है. जो अपने घरों से जुलूस को निहार रहे थे, वे भी मशालों की रोशनी में आ जाते हैं.

करीब सौ मीटर चलने के बाद एक सफेद मकान के आगे जुलूस थम जाता है और कुमाउंनी में एक नारा निकलता है, ”कोउछु चोर कोउछु चोर, गोकुल चोर गोकुल चोर.” यह ग्राम प्रधान गोकुल सिंह राणा का मकान है. लोग बताते हैं कि कुछ दिनों से वे गांव से बाहर ही रहते हैं. शायद रानीखेत के किसी होटल में ”जिंदल के लोगों” के साथ बैठकर अभी शराब पी रहे होंगे.

किसने लगाई आग
उत्‍तराखण्‍ड के रानीखेत-अल्‍मोड़ा मार्ग पर तकरीबन बीच में स्थित डीडा द्वारसो नाम का यह गांव हमेशा से ऐसा नहीं था. हाइवे के किनारे हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले एक ग्रामवासी बताते हैं, ”यह पटवारियों का गांव है. यहां कभी जुर्म नहीं हुआ. लोग इतना मिलजुल कर रहते हैं कि किसी को इतना भी नहीं पता कि कौन सी जमीन किसकी है. कोई कहीं भी खेती कर लेता है, आपसदारी में मकान बना लेता है. पीढ़ियों से ऐसे ही चलता आ रहा है.”nanisar2

सोमवार 23 नवंबर की रात द्वारसो के आकाश में उठी मशालों की कहानी महज दो माह पुरानी है. बीते 25 सितंबर को गांव वालों को अपने गांव से सात किलोमीटर ऊपर ग्राम सभा की ज़मीन नैनीसार पर अचानक कुछ जेसीबी मशीनें दिखाई देती हैं. उन्‍हें कुछ समझ में नहीं आता. फिर वहां कुछ बाहरी लोगों का आना-जाना शुरू हो जाता है. नैनीसार की जमीन को बाड़ों से घेर दिया जाता है और एक गेट के बाहर चेतावनी लगा दी जाती है, ”बिना आज्ञा प्रवेश वर्जित है.”

गांव के प्रधान ने अपनी तरफ से शासन को एक अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया है जिस पर गांव वालों के दस्‍तखत हैं

पीढ़ियों से चला आ रहा आपसी सद्भाव अचानक चकनाचूर हो जाता है जब उन्‍हें पता लगता है कि गांव के प्रधान ने अपनी तरफ से शासन को एक अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया है जिस पर गांव वालों के दस्‍तखत हैं. इसमें सात हेक्‍टेयर से ज्‍यादा ज़मीन कारोबारी जिंदल समूह द्वारा संचालित हिमांशु एजुकेशन सोसायटी को दिए जाने की बात है.

कौन है ये जिंदल?

दो महीने से जिंदल के खिलाफ नारे लगा रहे गांव वालों समेत इनके आंदोलन को समर्थन दे रहे उत्‍तराखण्‍ड परिवर्तन पार्टी के अध्‍यक्ष पीसी तिवारी भी इस नाम को लेकर संशय में हैं. वे कहते हैं, ”बहुत साफ़ नहीं है कि ये जिंदल कौन है. इतना पता है कि वही जिंदल परिवार होगा जो उद्योगपति है.”

गांववालों की सोच कहीं ज्‍यादा साफ़ है, ”हमें क्‍या मतलब कि जिंदल कौन है. होगा कोई! हम तो बस इतना जानते हैं कि हमारी जमीन किसी बिजनेसमैन को हम नहीं देंगे. यहां सरकारी अस्‍पताल बनता, कोई योजना लगती जिससे लोगों का भला होता, तो हमें क्‍या दिक्‍कत थी. इसमें तो हमारे बच्‍चे भी नहीं पढ़ पाएंगे? ऐसे स्‍कूल का क्‍या मतलब?”

स्‍कूल या रहस्‍य

दरअसल, सात हेक्‍टेयर की ज़मीन पर सोसायटी एक अंतरराष्‍ट्रीय बैक्‍लॉरेट स्‍कूल बनाने जा रही है. शासन को सोसायटी ने जो प्रस्‍ताव दिया है, उसमें साफ़ दर्ज है कि इस स्‍कूल में कौन पढ़ सकता है. गांव वालों के गुस्‍से का एक बड़ा कारण यह प्रस्‍ताव है, जो छात्रों की सात श्रेणियां गिनाता है- कॉरपोरेट जगत के बच्‍चे, एनआरआइ बच्‍चे, उत्‍तर-पूर्व के बच्‍चे, माओवाद प्रभावित राज्‍यों के बच्‍चे, गैर-अंग्रेज़ी भाषी देशों के बच्‍चे, भारत में रहने वाले विदेशी समुदायों के बच्‍चे और वैश्विक एनजीओ द्वारा प्रायोजित बच्‍चे.

स्‍कूल की सालाना फीस 22 लाख रुपये बताई जा रही है. स्‍कूल वास्‍तव में कारोबारी खानदान जिंदल का ही है. फर्क इतना है कि यह कांग्रेसी नेता नवीन जिंदल का नहीं, देवी सहाय जिंदल समूह का है जो नवीन जिंदल के चाचा थे. सोसायटी के उपाध्‍यक्ष प्रतीक जिंदल नवीन जिंदल के भतीजे हैं.

द्वारसो गांव की औरतों की बांहें फड़कने लगती हैं जब वे बताती हैं कि किस तरह 22 अक्‍टूबर को स्‍कूल के शिलान्‍यास समारोह में उनके साथ बदतमीज़ी की गई. सावित्री कहती हैं, ”लड़कियों ने काली चुन्‍नी पहन रखी थी. पुलिसवालों ने उसे छीन लिया. वे काले रंग का कपड़ा पहन कर नहीं आने दे रहे थे.”

गांव वालों ने शिलान्‍यास का विरोध किया, तो उन्‍हें दौड़ा कर मारा गया और कई को ले जाकर थाने में बंद कर दिया गया था

गांव वाले याद करते हैं कि प्रतीक जिंदल और मुख्‍यमंत्री हरीश रावत के पुत्र एक ही हेलिकॉप्‍टर में सवार होकर उस दिन नैनीसार आए थे. उस दिन अखबारों में इस स्‍कूल के शिलान्‍यास का जो विज्ञापन छपा था, उसमें भारतीय जनता पार्टी के स्‍थानीय सांसद अजय टम्‍टा और कांग्रेसी विधायक दोनों की तस्‍वीर थी. गांव वालों ने जब शिलान्‍यास का विरोध किया, तो उन्‍हें दौड़ा-दौड़ा कर मारा गया और कई लोगों को ले जाकर थाने में बंद कर दिया गया था.

पांचवीं में पढ़ने वाला कृष्‍णा कहता है, ”मेरी काली पैंट को पुलिसवालों ने उतरवा लिया. मैंने भी तार उखाड़ कर फेंक दी.”

उस दिन नैनीसार की घेरी गई ज़मीन पर मुख्‍यमंत्री हरीश रावत के स्‍वागत के लिए एक हैलीपैड भी बनाया गया था, हालांकि हरियाणा से लाए गए बाउंसरों से चाक-चौबंद सुरक्षा व्‍यवस्‍था के चलते इसे देखने की किसी को इजाज़त नहीं है. पत्रकारों के परिसर में घुसने पर पाबंदी लगी हुई है.

हलद्वानी के पत्रकार बताते हैं कि इस स्‍कूल के बारे में जिसने भी दिलचस्‍पी ली है, उसके फोन टैप करवाए गए हैं. स्‍थानीय अखबारों को जिंदल समूह की तरफ से उदारता से दिए जा रहे विज्ञापनों ने खबर की राह रोक रखी है. उधर, प्रशासनिक अधिकारियों के फोन दर्जनों बार बजकर बीच में बंद हो जा रहे हैं.

जिलाधिकारी आवास पर तैनात सिपाही ने कहा, ”डीएम साहब नाराज़ हैं. उन्‍होंने पत्रकारों के मिलने पर रोक लगा दी है.”

इस बारे में फोन करने पर दिल्‍ली में बैठे सोसायटी के उपाध्‍यक्ष प्रतीक जिंदल कहते हैं, ”मैं सिर्फ सुरक्षाकर्मियों के भरोसे आपको भीतर नहीं जाने दे सकता. वैसे भी हैलीपैड तो अस्‍थायी था, जो अब नहीं है. भीतर कुछ खास हुआ नहीं है अब तक, आप क्‍या देखेंगे?”

दूसरी ओर ग्राम प्रधान गोकुल सिंह राणा को इस बात का डर है कि गांव वालों का भरोसा तो उन्‍होंने खो ही दिया है. अब कम से कम प्रशासन और कंपनी के भरोसे को बनाए रखा जाए. जब उनसे स्‍कूल की साइट पर चलने को कहा जाता है, तो वे साफ मना कर देते हैं.

यही रवैया अल्‍मोड़ा के जिलाधिकारी साविन बंसल का भी है, जो दर्जनों बार सूचना भिजवाए जाने के बावजूद प्रतिक्रिया नहीं देते हैं. उनके आवास के बाहर तैनात सिपाही संदेश लेकर आता है, ”डीएम साहब बहुत नाराज़ हैं. उन्‍होंने पत्रकारों के मिलने पर रोक लगा दी है.”

दिल्‍ली से एक कांग्रेसी सांसद के ज़रिए खबर लगती है कि डीएम को मुख्यमंत्री की ओर से आदेश है कि पत्रकारों से इस बारे में बात नहीं करनी है.

कांग्रेस का जिंदल प्रेम
नवीन जिंदल खुद कांग्रेस के सांसद रहे हैं. कांग्रेस के राज में ही उनके चाचा देवी सहाय जिंदल को 1971 में पद्मश्री से नवाज़ा गया था. जिंदल परिवार के बुजुर्गों की मौत के बाद खानदानी कारोबार तो अलग-अलग कंपनियों में बंट गया, लेकिन आज भी परिवार एक ही मेज़ पर खाता है.

प्रतीक जिंदल बताते हैं, ”हम सभी एक ही परिवार के हैं. एक साथ रहते हैं. साथ खाते हैं. इसका मतलब यह तो नहीं कि हमारा बिजनेस भी एक है? ये जो अंतरराष्‍ट्रीय स्‍कूल बन रहा है, इसका नवीन जिंदल से कोई लेना-देना नहीं है, बेशक वे मेरे अंकल हैं.”

इस बात में अगर सच्‍चाई हो भी, तब भी हरीश रावत के जिंदल प्रेम को झुठलाया नहीं जा सकता. नैनीसार की जो सात हेक्‍टेयर जमीन हिमांशु एजुकेशन सोसायटी को दी गई है, उस संबंध में जिलाधिकारी कार्यालय (अल्‍मोड़ा) द्वारा उपजिलाधिकारी (रानीखेत) को 29 जुलाई 2015 को भेजे गए एक ”आवश्‍यक” पत्र में तीन बिंदुओं पर संस्‍तुति मांगी गई थी: 1) प्रस्‍तावित भूमि के संबंध में संयुक्‍त निरीक्षण करवाकर स्‍पष्‍ट आख्‍या; 2) ग्राम सभा की खुली बैठक में जनता/ग्राम प्रधान द्वारा प्राप्‍त अनापत्ति प्रमाण पत्र की सत्‍यापित प्रति; 3) वन भूमि न होने के संबंध में स्‍पष्‍ट आख्‍या.

जमीन के बारे में डाली गई आरटीआई के जवाब में गांव वालों को प्रधान द्वारा जारी एनओसी थमा दी जाती है

इसके जवाब में 14 अगस्‍त 2015 को शासन को जो पत्र भेजा गया, उसमें संयुक्‍त निरीक्षण का परिणाम यह बताया गया कि कुल 7.061 हेक्‍टेयर प्रस्‍तावित जमीन वन विभाग के स्‍वामित्‍व की नहीं है. उस पर 156 चीड़ के पेड़ लगे हैं लेकिन वे ”वन स्‍वरूप में नहीं हैं.”

आकलन के मुताबिक इस भूमि का नज़राना 4,16,59,900.00 रुपये बनता है और वार्षिक किराया 1196.80 रुपये बनता है. जवाब में ग्राम सभा की खुली बैठक का कोई जि़क्र नहीं है.

ग्राम सभा की बैठक किए बगैर ज़मीन किस प्रक्रिया के तहत सोसायटी को दी गई, इसके लिए आवेदित आरटीआई के जवाब में गांव वालों को प्रधान द्वारा जारी एनओसी थमा दिया जाता है, जिस पर न तो तारीख है और न ही वह सत्‍यापित प्रति है. तब जाकर गांव वालों को पता लगता है कि उनके फर्जी दस्‍तखत के सहारे उनके साथ धोखा हुआ है.

इसके बाद एक और आरटीआई लगाई जाती है जिसका जवाब 22 नवंबर को आता है. इसमें बताया गया है कि सोसायटी ने सरकार के खज़ाने में दो लाख रुपये का नज़राना 20 नवंबर को ही जमा कराया है. उत्‍तराखण्‍ड परिवर्तन पार्टी के पीसी तिवारी पूछते हैं, ”मान लिया कि दो लाख रुपये 20 नवंबर को खज़ाने में पहली बार जमा हुए, तो पट्टा उसके बाद हस्‍तांतरित होना चाहिए था. आखिर दो महीने पहले 25 सितंबर को कब्‍ज़ा कैसे ले लिया गया और मुख्‍यमंत्री ने महीने भर पहले ही शिलान्‍यास कैसे कर डाला?”

ज़ाहिर है, खूबसूरत वादियों में ऊंचाई पर बसी सात हेक्‍टेयर ज़मीन की सालाना कीमत अगर 1196.80 रुपये हो, तो किसी भी कारोबारी के लिए इससे बढ़िया डील क्‍या होगी.

नैनीसार एक प्रतीक है
उत्‍तराखण्‍ड सरकार की प्रतीक जिंदल पर की गई मेहरबानियों का सिलसिला नैनीसार तक सीमित नहीं है. राज्‍य भर में ज़मीनों को गैर-कानूनी तरीके से उद्योगपतियों को सौंपने का एक संगठित धंधा चल रहा है.

सूबे में हरीश रावत की सरकार आने के बाद बाहर के कारोबारियों पर जैसी मेहरबानी की गई है, इससे स्‍थानीय लोगों में खासी नाराज़गी है. मसलन, प्रतीक जिंदल के समूह को रामगढ़ में भी काफी जमीनें दी गई हैं. वे इस पर हिमालयन हाइट्स नाम की एक आवासीय परियोजना बना रहे हैं.

भवाली के एक ठेकेदार मोहन चंद्र जोशी ने पिछले साल अनुबंध पर यहां निर्माण शुरू किया था, लेकिन आज उनकी अपनी जान के लाले पड़े हुए हैं. बीच में उनका काम रुकवा दिया गया और बिना भुगतान के करीब 35 लाख का माल ज़ब्‍त कर लिया गया.

हलद्वानी के एक रेस्‍त्रां में मिलने आए जोशी का चेहरा उड़ा हुआ था. वे कहते हैं, ”अब वे मुझे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं. मैंने मुकदमा किया तो प्रतीक कहने लगा कि मेरे पिता पर 52 मुकदमे पहले से दर्ज हैं, एक और सही. मेरे बेटे की हालत खराब है. उसके लिवर के ऑपरेशन पर लाखों खर्च हो चुका है. मैं बरबाद हो चुका हूं जिंदल के चक्‍कर में.”

जोशी की पत्‍नी रोते हुए कहती हैं, ”मेरे पति को जिंदल से बचा लीजिए. न पुलिस सुनती है, न अदालत. वे इन्‍हें मार डालेंगे.”

गांव वालों की बार-बार दी गई तहरीर के बावजूद एक भी एफआईआर ग्राम प्रधान से लेकर भ्रष्‍ट अधिकारियों पर दर्ज नहीं हुई है

मोहन जोशी जैसी कई कहानियां उत्‍तराखण्‍ड में बिखरी पड़ी हैं. जहां-जहां जिंदल समूह को ज़मीनें दी गई हैं, वहां-वहां नाइंसाफी की दास्‍तानें दफन हैं.

नैनीसार तो सतह के नीचे सुलग रहे उत्‍तराखण्‍ड का एक प्रतीक भर है, जहां अपनी ज़मीन छीने जाने का विरोध करने पर 32 लोगों को नामजद करते हुए 382 ग्रामीणों के खिलाफ 22 अक्‍टूबर को मुकदमा दर्ज कर लिया गया था. पूरा गांव यहां दोषी बना दिया गया है, जबकि गांव वालों की बार-बार दी गई तहरीर के बावजूद एक भी एफआईआर ग्राम प्रधान से लेकर भ्रष्‍ट अधिकारियों पर दर्ज नहीं हो सकी है.

देवभूमि में हो रही नाइंसाफियों पर आज डीएम चुप है. सीएम चुप है. तहसीलदार चुप हैं. प्रधान चुप हैं. बरसों से चुप रही जनता ज़मीन की लूट के खिलाफ़ अकेले बोल रही है. 22 अक्‍टूबर को अल्‍मोड़ा से उठी ये आवाज़ें 24 नवंबर को देहरादून पहुंचीं तो एक बार फिर सैकड़ों गिरफ्तारियां हुईं. इनका हौसला तब भी नहीं टूटा.

आखिरकार, उत्‍तराखण्‍ड परिवर्तन पार्टी की अगुवाई में ये आवाज़ें 28 नवंबर को दिल्‍ली के जंतर-मंतर पर भी पहुंच ही गईं. कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह को ज्ञापन देने के बाद सैकड़ों लोग वापस अपने गांवों को लौट चुके हैं, लेकिन महज दो महीने में नैनीसार एक ऊंघते हुए गांव से राष्‍ट्रीय प्रश्‍न में तब्‍दील हो चुका है. हरीश रावत की कुर्सी डोल रही है. क्‍या वे कुछ सुन पा रहे हैं?

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  • Published: 3 years ago on December 2, 2015
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  • Last Modified: December 2, 2015 @ 2:36 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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