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देवभूमि उत्तराखंड और महिला सशक्तिकरण..

-ज्ञानेन्द्र पाण्डेय॥

देवभूमि कहलाने वाले सीमांत पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में महिला सशक्तिकरण की स्थिति बेहतर नहीं कही जा सकती बावजूद इसके कि सन 2000 में भारत के एक स्वायत्त राज्य के रूप में वजूद में आने के बाद अब तक तमाम सरकारों और उनके मुखियाओं ने महिला सशक्तिकरण के अनेक दावे किए। भारतीय चिंतन परंपरा में नारी को देवता से ऊपर का दर्जा दिया गया है। इसीलिए कहा भी जाता है, ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवताः’। मतलब यह कि जहां नारी की पूजा की जाती है वहां देवता का वास होता है। उत्तराखंड को देवभूमि इसलिए कहा जाता है कि अनादि काल से यहां विभिन्न रूपों में विराजमान देवताओं का वास रहा है। इस नाते यह राज्य देवताओं की उपासना का केन्द्र भी रहा है। ईश्वर के नर और नारी दोनों ही रूप यहां पूजे जाते हैं, लेकिन विडम्बना यह है कि उत्तराखंड की नारी जो सुबह पांच बजे से रात के दस बजे तक चूल्हा-चौका, खेत-खलिहान और अंदर-बाहर तक पूरे दिन गृहस्थी और रोजमर्रा के कामों में लगी रहती है, उसे यह अधिकार तक नहीं है कि वह नियोजन में भागीदार बन सके, यही नहीं जिस खेत की निराई-गुड़ाई, बुवाई-कटाई के तमाम काम उसके जिम्मे होते हैं, उसका स्वामित्व भी उसके पास नहीं है। इसके साथ ही पहाड़ के जिन जंगलों से घास-पत्ती लाकर वह अपने पशुओं के चारे का इंतजाम करती है और जहां से बीनकर लाई गई सूखी लकडि़यों से उसके घर का चूल्हा जलता है, उन जंगलों के प्रबंधन का भी कोई अधिकार उसके पास नहीं है।

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उत्तराखंड में शहरों की संख्या तो सीमित ही है, लेकिन गांवों की संख्या काफी अधिक है, लेकिन रोजगार के साधनों के अभाव में ये गांव वीरान हो गए हैं। रोजगार की तलाश में पुरूष शहरों या मैदानी इलाकों की ओर पलायन कर चुके हैं और गांवों में बचे हैं तो केवल बच्चे और महिलाएं। पहाड़ का पानी और जवानी दोनों ही उसके काम नहीं आ रही है। विकास की बाट जोहते पहाड़ के गांव में सब कुछ महिलाओं पर ही निर्भर है। पहाड़ की महिलाएं जीवट की धनी हैं और जीवन के हर क्षेत्र में उनकी बेहतरीन भागीदारी रही है। चाहे पर्यावरण प्रदूषण की मार से बचने के लिए पेड़ बचाओ अभियान के तहत शुरू किए गए चिपको आंदोलन का मामला हो या फिर नशे की गर्त में डूबने वाली युवा पीढ़ी को बचाने के लिए शुरू किए गए नशा नहीं, रोजगार दो आंदोलन का मामला हो, उत्तराखंड की महिलाओं ने ऐसे हर आंदोलन में न केवल बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, बल्कि ऐसे आंदोलनों को नेतृत्व भी प्रदान किया। सातवें दशक के दौरान गढ़वाल क्षेत्र के सीमांत भोटिया गांव रैणी से शुरू हुए चिपको आंदोलन का नेतृत्व स्थानीय भोटिया महिला गौरा देवी ने ही किया था। जंगल काटने आए ठेकेदारों से पेड़ को बचाने के लिए गौरा देवी समेत सैकड़ों महिलाएं यह कहते हुए पेड़ों से चिपक गई कि पहले हमको काटो, फिर पेड़ काटना। यह बात अलग है कि इन्हीं ठेकेदारों में से एक ठेकेदार ने बाद में खुद को चिपको आंदोलन का जन्मदाता घोषित कर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खूब वाह-वाही लूटी। इसी तरह नशा नहीं, रोजगार दो आंदोलन की कमान भी अनेक महिलाओं के हाथ में ही थी। आंदोलनों का यह सिलसिला पृथक पर्वतीय राज्य की मांग को लेकर किए गए आंदोलन तक चला और महिलाओं की भागीदारी भी यथावत बनी रही। राज्य आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का इतिहास गवाह है कि 2 अक्टूबर, 1994 को जब महिला आंदोलनकारियों का एक जत्था अगले दिन दिल्ली में होने वाली रैली में शामिल होने के लिए आ रहा था, तब उन्हें तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार की पुलिस की दरिंदगी का शिकार भी होना पड़ा था।

उत्तराखंड के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास के संदर्भ में महिलाओं की भागीदारी के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहराने वाली बछेन्द्री पाल को कौन नहीं जानता। ऐसे हजारों नाम जिन्होंने उत्तराखंड की असमिता को एक अलग पहचान दी, आज गुमनामी में कहीं खो चुके हैं। यह सब शायद इसीलिए हुआ क्योंकि सरकारों ने नारी सशक्तिकरण के महज नारे दिए, किया कुछ नहीं। याद आता है वो लम्हा जब केन्द्र की तत्कालीन भाजपा सरकार उत्तराखंड को पृथक राज्य का दर्जा देने के लिए विधेयक का प्रारूप तैयार करने पर जुटी थी, तब राष्ट्रीय महिला आयोग उत्तराखंड में महिलाओं को नियोजन में भागीदारी देने के एक प्रस्ताव पर काम कर रहा था। आयोग की तत्कालीन अध्यक्ष मोहिनी गिरी के नेतृत्व में एक स्वेछिक संगठन हिमालयन अध्ययन केन्द्र ने इस आशय की एक रिपोर्ट भी केन्द्र और राज्य सरकार को सौंपी थी, लेकिन वह रिपोर्ट आज कहां है किसी को पता नहीं है, जबकि उत्तराखंड के रूप में इस राज्य के गठन के सोलह साल पूरे हो चुके हैं।

इस रिपोर्ट में मोटे तौर पर यह सिफारिश की गई थी कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में जहां पुरूष शक्ति के अभाव में जमीन की बुवाई से लेकर निराई, गुड़ाई, जुताई और फसल की कटाई तक सारे काम महिलाएं ही करती हैं, वहां जमीन के स्वामित्व का अधिकार महिलाओं को दिया जाना चाहिए। यही नहीं इस रिपोर्ट में नियोजन में महिलाओं की भागीदारी को लेकर भी यह तर्क दिया गया था कि जब ये तमाम काम महिलाओं को ही करने होते हैं तब महिला शक्ति को यह अधिकार भी दिया जाना चाहिए कि पानी कहां से आएगा, कैसे आएगा, कौन लाएगा से लेकर सड़कों के रखरखाव और तमाम तरह के बंदोबस्त करने का हक भी उसे है। बाद के वर्षों में जब केन्द्र सरकार ने संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के बाद ग्राम पंचायत और नगर पंचायत को अधिकार सम्मत बनाया तब ग्राम पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी तो थोड़ा बढ़ी लेकिन देश के दूसरे इलाकों की तरह उत्तराखंड में भी सरपंच पति का फार्मूला अपनाते हुए देर नहीं लगी। आज स्थिति थोड़ा सा बेहतर हो सकती है लेकिन महिला सशक्तिकरण की अवधारणा वास्तविक लक्ष्य से अभी भी कोसों दूर है। जिन जंगलों को उत्तराखंड की महिला पेड़ों से चिपक कर कटने से बचाती थी आज उन्हीं जंगलों का प्रबंधन विश्व बैंक की परियोजना के तहत जेएफएम यानी ज्वाइंट फोरेस्ट मैनेजमेंट के नाम पर ऐसी संस्थाओं को सौंप दिया गया है जिनके सदस्यों को जंगल की एबीसीडी तक मालूम नहीं है। सरकारी योजनाओं में ऐसी अनेक खामियां हैं जिनके चलते महिला सशक्तिकरण का नारा केवल नारा बनकर रह गया है। सरकार किसी की हो खोखले नारों से बचना होगा और महिला सशक्तिकरण की कोई ठोस और दीर्घकालीन पहल करनी होगी, तभी हम ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवताः’ के सूत्र वाक्य को अमल में ला सकेंगे।

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