/‘शहीद’ की भी एक ‘जाति’ होती है..

‘शहीद’ की भी एक ‘जाति’ होती है..

‘‘जब जब भी कोई सैनिक शहीद होता है , उसकी शहादत की बड़ी चर्चा होती है । बाद में हम सब कुछ भूल जाते है । ऐसा ही सैनिक चतराराम के साथ हुआ,पहले चतराराम शहीद हुआ फिर उसकी प्रतिमा को शहीद कर दिया गया’’

-भंवर मेघवंशी॥

राजस्थान के सिरोही जिले के रेवदर उपखण्ड क्षेत्र का गांव है जीरावल। यहां के दलित मेघवाल परिवार में 28 अगस्त 1973 को जन्मा चतराराम 28 अगस्त 1998 को केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल में शामिल हुआ।FB_IMG_1451843449006
तकरीबन तीन वर्ष फौज में रहा । इसी दौरान 12 मई 2001 को केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की एच क्यू 121 बटालियन पर इम्फाल मणिपुर में हुए उग्रवादी हमले के दौरान चतराराम की मौत हो गयी।
उनकी शहादत के दो रोज बाद उनकी पार्थिव देह उनके पैतृक गांव जीरावल पहुंची, जहां पर राजकीय सम्मान के साथ उनके शव की मेघवाल पद्धति से अंत्येष्टी कर दी गई। जिस जगह उन्हें दफन किया गया, वहीं पर एक शहीद स्मारक बनाया गया।
भारत सरकार द्वारा चतराराम को शहीद का दर्जा दिए जाने के बाद ग्राम पंचायत जीरावल ने ग्राम सभा की बैठक कर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि चतराराम के अंत्येष्टी स्थल ऊरिया तालाब के पास स्मारक बनाया जाए और शहीद सैनिक की आदमकद प्रतिमा बस स्टेण्ड पर और एक छोटी मूर्ति शहीद स्मारक स्थल पर लगाई जाए।
9 मार्च 2002 को क्षेत्रीय विधायक एवं तत्कालीन यातायात मंत्री राजस्थान सरकार छोगाराम बाकोलिया के हाथों दोनों मूर्तियों का अनावरण किया गया। साथ ही शहीद की स्मृति की स्थायी बनाने के लिए एक सामुदायिक भवन भी दलित बस्ती में बनाया गया। जैसा कि हम जानते ही है कि राजस्थान में देश सेवा के लिए सेना में जाने की विशेष गौरव की बात माना जाता है और अगर राष्ट्र सेवा करते हुए शहादत हो जाए तो समाज में उस सैनिक का दर्जा बेहद आला हो जाता है।
सरकार द्वारा मरणोपरांत शहीद का दर्जा दिया जाता है, शहीद के स्मारक बनते है, शहीद की मूर्तियां लगती है, शहीद के आश्रितों को भूमि आवंटित होती है, नकद सहायता दी जाती है तथा गैस स्टेशन अथवा पेट्रोल पम्प दिए जाते है। उनकी स्मृति को चिरस्थाई बनाने के हरसंभव यत्न होते है ताकि देश पर मर मिटने का जज्बा बरकरार रहे।
शहीद की शहादत को पूरा मान मिले, सम्मान मिले, ऐसी उसके परिजन, ग्रामजन तथा समाजजन अपेक्षा करते है। शहीद चतराराम के परिजन अशिक्षित होने की वजह से उनकी स्मृतियों को नहीं सहेज पाए, जिस मेघवाल जाति से चतराराम ताल्लुक रखते थे, वह भी इस क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ समुदाय है, इसलिए उसे भी शहीद की शहादत का महत्व समझ पाने में अरसा लग गया। जिन समुदायों का यहां वर्चस्व है, उनके लिए एक मेघवाल का शहीद होना, शहीद होना नहीं बल्कि मरना भर है, इसलिए उनसे यह सहन नहीं हो सका कि उसकी प्रतिमा लगे।
जब प्रतिमा लग गई तो वह वर्चस्वशालियों के आंख की किरकिरी बन गई । हालात यहाँ तक बिगड़े कि गांव के चैराहे पर लगी मूर्ति अपमानित हुई शहीद’ की भी एक ‘जाति’ होती है!
‘‘पहले दलित सैनिक चतराराम शहीद हुआ, फिर उसकी प्रतिमा से सिर को शहीद कर दिया गया’’FB_IMG_1451843472417
राजस्थान के सिरोही जिले के रेवदर उपखण्ड क्षेत्र का गांव है जीरावल। यहां के दलित मेघवाल परिवार में 28 अगस्त 1973 में जन्मे चतराराम 28 अगस्त 1998 को केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल में शामिल हुए।
तकरीबन तीन वर्ष फौज में रहे, इसी दौरान 12 मई 2001 को केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की एच क्यू 121 बटालियन पर इम्फाल मणिपुर में हुए उग्रवादी हमले के दौरान चतराराम शहीद हो गए।
उनकी शहादत के दो रोज बाद उनकी पार्थिव देह उनके पैतृक गांव जीरावल पहुंची, जहां पर राजकीय सम्मान के साथ उनके शव की मेघवाल पद्धति से अंत्येष्टी कर दी गई। जिस जगह उन्हें दफन किया गया, वहीं पर एक शहीद स्मारक बनाया गया।
भारत सरकार द्वारा चतराराम मेघवाल को शहीद का दर्जा दिए जाने के बाद ग्राम पंचायत जीरावल ने ग्राम सभा की बैठक कर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि चतराराम के अंत्येष्टी स्थल ऊरिया तालाब के पास स्मारक बनाया जाए और शहीद की आदमकद प्रतिमा बस स्टेण्ड पर और एक छोटी मूर्ति शहीद स्मारक स्थल पर लगाई जाए।
9 मार्च 2002 को क्षेत्रीय विधायक एवं तत्कालीन यातायात मंत्री राजस्थान सरकार छोगाराम बाकोलिया के हाथों दोनों मूर्तियों का अनावरण किया गया। साथ ही शहीद की स्मृति में एक सामुदायिक भवन भी दलित बस्ती में बनाया गया।
राजस्थान में देश सेवा के लिए सेना में जाने की विशेष गौरव की बात माना जाता है और अगर राष्ट्र सेवा करते हुए शहादत हो जाए तो समाज में उस सैनिक का दर्जा बेहद आला हो जाता है।
सरकार द्वारा मरणोपरांत शहीद का दर्जा दिया जाता है, शहीद के स्मारक बनते है, शहीद की मूर्तियां लगती है, शहीद के आश्रितों को भूमि आवंटित होती है, नकद सहायता दी जाती है तथा गैस स्टेशन अथवा पेट्रोल पम्प दिए जाते है। उनकी स्मृति को चिरस्थाई बनाने के हरसंभव यत्न होते है ताकि देश पर मर मिटने का जज्बा बरकरार रहे।
शहीद की शहादत का पूरा मान मिले, सम्मान मिले, ऐसी उसके परिजन, ग्रामजन तथा समाजजन अपेक्षा करते है। शहीद चतराराम के परिजन अशिक्षित होने की वजह से उनकी स्मृतियांे को नहीं सहेज पाए, जिस मेघवाल जाति से चतराराम ताल्लुक रखते थे, वह भी इस क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ समुदाय है, इसलिए उसे भी शहीद की शहादत का महत्व समझ पाने में अरसा लग गया। जिन समुदायों का यहां वर्चस्व है, उनके लिए एक मेघवाल का शहीद होना, शहीद होना नहीं बल्कि मरना भर है, इसलिए उनसे यह सहन नहीं हो सका कि उसकी मूर्तियां लगे।
जब मूर्तियां लग गई तो वह वर्चस्वशालियों के आंख की किरकिरी बन गई । गांव के चैराहे पर लगी मूर्ति अपमानित हुई और शहीद स्मृति सामुदायिक भवन सरकारी उपेक्षा के चलते बदहाल हो गया। सबसे क्रूर मजाक तो अंत्येष्टी स्थल पर बनाए गए शहीद स्मारक पर लगी मूर्ति के साथ किया गया।
लगने के कुछ ही माह बाद शहीद की मूर्ति के हाथ की बंदूक को तोड दिया गया, मानसिकता यह थी कि एक दलित मेघवाल के हाथ में बंदूक अच्छी नहीं लगती। पुलिस में मामला दर्ज हुआ पर किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। कोई नहीं पकड़ा गया। शायद पुलिस ने मान लिया कि शहीद की मूर्ति के हाथ से बंदूक खुद-ब-खुद नीचे गिर गई होगी।
हद तो यह है कि वर्ष 2002, 2003 तथा 2013 में तीन बार शहीद की प्रतिमा को शहीद करने का कुत्सित प्रयास किया गया। पहले बंदूक तोड़ी, फिर हाथ तोड़ा और अंततः शहीद की प्रतिमा का सिर तक काट दिया गया। आज सिरविहीन प्रतिमा शहीद की शहादत को चिढ़ाते हुए दो बरस से जस की तस खड़ी है।
शहीद स्मारक जीर्णोद्धार के लिए अभियान चला रहे क्षेत्र के युवा नेता बलवंत मेघवाल के नेतृत्व में इलाके के दलित युवा इस बात को लेकर काफी आक्रोशित है। उन्होंने जीरावल शहीद स्मारक की सुरक्षा व सम्मान के लिए संघर्ष छेड़ रखा है। आक्रोशित बलवंत मेघवाल कहते है कि- ‘‘देश पर मरने वालों का इस प्रकार कहीं अपमान नहीं होता है जैसा शहीद चतराराम मेघवाल के मामले में किया जा रहा है। हम हर स्तर पर अपनी मांग को लेकर जा चुके है लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।’’ मेघवाल के मुताबिक अब बड़ा जन आंदोलन छेड़ा जाएगा। वहीं इलाके के उपखण्ड अधिकारी रामचन्द्र गरवा कहते है कि- ‘‘यह मामला मेरे संज्ञान में लाया गया है। शहीद के स्मारक और मूर्ति को बार-बार खण्डित किया जाना अपमानजनक घटनाक्रम है। हम इसकी जांच करवा कर क्षतिग्रस्त स्मारक को जल्द सही करवाएंगे। प्रक्रिया चल रही है।’’
यह बात सही है कि सरकार में किसी भी काम को पुख्ता तौर पर अंजाम तक पहुंचाने की अपनी एक प्रक्रिया है पर उसकी सुस्त गति से दलित युवा आक्रोशित है, उन्हें लगता है कि प्रशासन कुछ करना नहीं चाहता है।
खैर, उम्मीद की जानी चाहिए कि शीघ्र ही शहीद चतराराम की मूर्ति व स्मारक एक भव्य स्वरूप प्राप्त करे तथा उसकी समुचित सुरक्षा के इंतजामात भी सुनिश्चित किए जाए, मगर जीरावल के शहीद चतराराम मेघवाल की शहादत को जिस तरह से उपेक्षित किया गया है और उनको भुलाने के प्रयास हो रहे है तथा बार-बार उनकी स्मृति को खण्डित किया जा रहा है, उससे स्पष्ट होता है कि जाति नामक घृणित व्यवस्था का कीड़ा किसी को भी नहीं छोड़ता है, चाहे व्यक्ति देश और समाज के लिए कुर्बान भी हो जाए मगर जातिय उपेक्षा के चलते उसे शहीद का सम्मान भी पूरी तरह से हासिल नहीं हो पाता है।
शहीद चतराराम की शहादत के साथ हो रहे दुव्र्यवहार ने साबित कर दिया है कि इस देश में शहीद सैनिक की भी एक जाति होती है और उसकी शहादत का सम्मान भी जातिगत भेद के आधार पर किया जाता है।
कितनी विडंबना की बात है कि जिंदा दलित सैनिक के साथ भी भेदभाव और घृणा की जाती है और वतन पर शहीद हो जाने के बाद उस शहीद की प्रतिमा तक से घृणा की जाती है, फिर क्यों कोई देश के लिए शहीद होने का स्वप्न संजोए ? कभी कहा गया था कि- ‘‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का बाकी यही निशां होगा।’’ शहीद चतराराम की मूर्ति और स्मारक के साथ विगत 13 वर्षों से हो रहे अपमान के बाद आज यह कहा जा सकता है कि-
‘‘शहीदों की कब्रों पर उग आएंगे, एक दिन कांटे।
शहीदाने वतन का नामोनिशां, यूं ही मिटता रहेगा।।’’
– भंवर मेघवंषी
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार है, उनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है। शहीद स्मृति सामुदायिक भवन सरकारी उपेक्षा के चलते बदहाल हो गया। सबसे क्रूर मजाक तो अंत्येष्टी स्थल पर बनाए गए शहीद स्मारक पर लगी मूर्ति के साथ किया गया।
मूर्ति लगने के कुछ ही माह बाद शहीद की मूर्ति की हाथ की बंदूक को तोड़ा गया, मानसिकता यह थी कि मेघवाल के हाथ में बंदूक अच्छी नहीं लगती। पुलिस में मामला दर्ज हुआ पर किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। कोई नहीं पकड़ा गया। शायद पुलिस ने मान लिया कि शहीद की मूर्ति के हाथ से बंदूक खुद-ब-खुद नीचे गिर गई होगी।
हद तो यह है कि वर्ष 2002, 2003 तथा 2013 में तीन बार शहीद की प्रतिमा को शहीद करने का कुत्सित प्रयास किया गया। पहले बंदूक तोड़ी, फिर हाथ तोड़ा और अंततः शहीद की प्रतिमा का सिर तक काट दिया गया। आज सिर विहीन प्रतिमा शहीद की शहादत को चिढ़ाते हुए दो बरस से जस की तस खड़ी है।
शहीद स्मारक जीर्णोद्धार के लिए अभियान चला रहे क्षेत्र के युवा नेता बलवंत मेघवाल के नेतृत्व में इलाके के दलित युवा इस बात को लेकर काफी आक्रोशित है। उन्होंने जीरावल शहीद स्मारक की सुरक्षा व सम्मान के लिए संघर्ष छेड़ रखा है। आक्रोशित बलवंत मेघवाल कहते है कि- ‘‘देश पर मरने वालों का इस प्रकार कहीं अपमान नहीं होता है जैसा शहीद चतराराम मेघवाल के मामले में किया जा रहा है। हम हर स्तर पर अपनी मांग को लेकर जा चुके है लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।’’ मेघवाल के मुताबिक अब बड़ा जन आंदोलन छेड़ा जाएगा। वहीं इलाके के उपखण्ड अधिकारी रामचन्द्र गरवा कहते है कि- ‘‘यह मामला मेरे संज्ञान में लाया गया है। शहीद के स्मारक और मूर्ति को बार-बार खण्डित किया जाना अपमानजनक घटनाक्रम है। हम इसकी जांच करवा कर क्षतिग्रस्त स्मारक को जल्द सही करवाएंगे। प्रक्रिया चल रही है।’’ यह बात सही है कि सरकार में किसी भी काम को पुख्ता तौर पर अंजाम तक पहुंचाने की अपनी एक प्रक्रिया है पर उसकी सुस्त गति से दलित युवा आक्रोशित है, उन्हें लगता है कि प्रशासन कुछ करना नहीं चाहता है।
खैर, उम्मीद की जानी चाहिए कि शीघ्र ही शहीद चतराराम की मूर्ति व स्मारक एक भव्य स्वरूप प्राप्त करेगा तथा उसकी समुचित सुरक्षा के इंतजामात भी सुनिश्चित किए जायेंगे , मगर जीरावल के शहीद चतराराम मेघवाल की शहादत को जिस तरह से उपेक्षित किया गया है और उसको भुलाने के प्रयास हो रहे है तथा बार-बार उनकी स्मृति को खण्डित किया जा रहा है, उससे स्पष्ट होता है कि जाति नामक घृणित व्यवस्था का कीड़ा किसी को भी नहीं छोड़ता है, चाहे व्यक्ति देश और समाज के लिए कुर्बान भी हो जाए मगर जातिय उपेक्षा के चलते उसे शहीद का सम्मान भी पूरी तरह से हासिल नहीं हो पाता है।
शहीद चतराराम की शहादत के साथ हो रहे दुर्व्यवहार ने साबित कर दिया है कि इस देश में शहीद सैनिक की भी एक जाति होती है और उसकी शहादत का सम्मान भी जातिगत भेद के आधार पर किया जाता है।
कितनी विडंबना की बात है कि जिंदा दलित सैनिक के साथ भी भेदभाव और घृणा की जाती है और वतन पर शहीद हो जाने के बाद उस शहीद की प्रतिमा तक से घृणा की जाती है, फिर क्यों कोई दलित देश के लिए शहीद होने का स्वप्न संजोए ? कभी कहा गया था कि- ‘‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का बाकी यही निशां होगा।’’ शहीद चतराराम की मूर्ति और स्मारक के साथ विगत 13 वर्षों से हो रहे अपमान के बाद आज यह कहा जा सकता है कि-
‘‘शहीदों की कब्रों पर उग आएंगे, एक दिन कांटे।
शहीदाने वतन का नामोनिशां, यूं ही मिटता रहेगा।।’’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार है, उनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.