/56 ईंची का लिजलिजा सीना..

56 ईंची का लिजलिजा सीना..

-संजय कुमार सिंह॥

नई सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से सूचना के सामान्य स्रोतों और परंपरागत तरीकों को बंद करके सेल्फी पत्रकारिता और मन की बात जैसी रिपोर्टिंग शुरू की है। प्रधानमंत्री विदेशी दौरों में पत्रकारों को अपने साथ विमान में भर या ढो कर नहीं ले जाते हैं इसका ढिंढोरा (गैर सरकारी प्रचारकों द्वारा ही सही) खूब पीटा गया पर रिपोर्टर नहीं जाएंगे तो खबरें कौन भेजेगा और भेजता रहा यह नहीं बताया गया। प्रचार यह किया गया कि ज्यादा पत्रकारों को नहीं ले जाने से प्रधानमंत्री की यात्रा का खर्च कम हो गया है लेकिन यह नहीं बताया गया कि कितना कम हुआ? किस मद में हुआ? क्योंकि, विमान तो वैसे ही जा रहे हैं, अब सीटें खाली रह रही होंगी। जो जानकारी वेबसाइट पर होनी चाहिए वह भी नहीं है। कुल मिलाकर, सरकार का जनता से संवाद नहीं है।images (17)
प्रधानमंत्री भले दावा करें कि वे गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले से सोशल मीडिया पर ऐक्टिव हैं पर यह नहीं बताते कि उस समय कौन सी मीडिया पर ऐक्टिव थे। एकतरफा संवाद चल रहा है। जवाब वो देते नहीं सिर्फ मन की बात करते हैं। औचक भौचक लाहौर की यात्रा कर आए लेकिन उससे देश का क्या भला हुआ या होने की उम्मीद है इस बारे में कुछ बताया नहीं गया और पठानकोट हो गया। इसमें कोई शक नहीं कि पहले मामले को दबाने और कम करने के साथ-साथ लापरवाहियों को छिपाने की कोशिश की गई। अभी भी कोई अधिकृत खबर नहीं आ रही है और मीडिया ने मुंबई हमले के समय जो जैसी रिपोर्टिंग की थी वैसे ही कर रही है।
ना मीडिया को जनता या देश या मुश्किल में फंसे लोगों की चिन्ता है और ना सरकार में उनकी भलाई की ईच्छा शक्ति। नुकसान कम या मामूली है यह बताने की कोशिश हर कोई कर रहा है। सरकारें अमूमन ऐसी ही होती हैं। इस सरकार से भी कोई उम्मीद नहीं करता अगर ये लव लेटर लिखने का मजाक उड़ाकर सत्ता में नहीं आए होते। पर लव लेटर लिखने वाले उतना तो कर रहे थे तुमसे तो जिसपर लव लेटर लिखना बनता है उधर गर्दन नहीं घुमाई जा रही। 56 ईंची सीना इतना लिजलिजा हो सकता है यह अंदाजा किसी को नहीं था। बात सिर्फ पठानकोट या पाकिस्तान पर हमला करने या उससे निपटने की नहीं है। आप तो अरविन्द केजरीवाल को हैंडल नहीं कर पा रहे हैं। आरोप लगा दिया कि ऑड ईवन फार्मूला भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए है और पर्दा डालने के लिए नजीब जंग को छोड़ दिया। वो भी ऐसे कि खुद को छूट मिल गई तो ऑड ईवन में जनता की याद नहीं आई पर दिल्ली सरकार डीडीसीए की जांच नहीं कर सकती है।
दिल्ली सरकार पूरी दिल्ली को (उपराज्यपाल और केंद्रीय मंत्रियों को छोड़ दे तो) नचा सकती है लेकिन डीडीसीए के घोटाले की जांच नहीं कर सकती (क्योंकि घोटाला तब हुआ तब भाजपा का असरदार नेता उसका अध्यक्ष था)। गैर सरकारी प्रचारक ये बताने में लगे हैं कि आज मेट्रो में बहुत भीड़ है। जो मेट्रो से नहीं चलता है वो जानता है कि बहुत भीड़ होती है। फोटो देखता रहा है और जो चलता है उसे पता है शुरू से हो रही है। फिर भी।

(वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.