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‘आधार-कार्ड’ हो सकता है निराधार : नंदन निलेकनी UIDA को ‘गुड-बाई’ करने पर आमादा

By   /  September 18, 2011  /  10 Comments

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– शिवनाथ झा।।

चाणक्य जैसे कुटिल राजनीतिज्ञ आज नहीं हैं, लेकिन “चापलूस” और “चाटुकारों” की डॉ. मनमोहन सिंह  की सरकार में कमी नहीं है. आईटी की दुनिया का ‘भीष्म पितामह’ कहलाने वाले नंदन निलेकनी मनमोहन सिंह सरकार और योजना आयोग के आला सहयोगी की शतरंजी चाल में फंस गए हैं

बस बहुत हुआ : नंदन निलेकनी

आचार्य चाणक्य ने कहा था कि जब राजा प्रजा के हित की बात सुनना बंद कर दे और निरंकुश हों जाये तो राजा के सबसे निकटतम सलाहकार को अपने बस में करना और उसे जन-हित और राष्ट्र-हित के बारे में ज्ञान देकर राजा को वश में किया जा सकता है. लेकिन यह बात उस समय की थी जब चाणक्य अपने शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य को अखंड-भारत का “सर्वश्रेष्ठ” राजा बनाने और अलेक्जेंडर सहित सेल्युकस और केलेस्थिनिज को भारत वर्ष के हित में वापस भेजने की बात सोच रहे थे.

हालांकि चाणक्य जैसे कुटिल राजनीतिज्ञ आज नहीं हैं, लेकिन “चापलूस” और “चाटुकारों” की डॉ. मनमोहन सिंह सरकार में कमी नहीं है. यहाँ भारत वर्ष का हित सोचने वाला और आईटी की दुनिया का ‘भीष्म पितामह’  कहलाने वाले नंदन निलेकनी मनमोहन सिंह सरकार और योजना आयोग के आला सहयोगी के शतरंजी चल में फंस गए हैं. शायद इसी कारण पिछले कई दिनों से कुछ लॉबीस्ट माने जाने वाले पत्रकार इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए थे। कईयों ने इस प्रोजेक्ट के डाटा की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा दिए थे।

केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलुवालिया द्वारा बनाये गए इस चक्रब्यूह का शिकार बन रहे हैं निलेकनी, जो पिछले वर्षों से अपने अथक प्रयास के द्वारा भारत के प्रत्येक नागरिक को उसकी अपनी एक पहचान पत्र के द्वारा भारतीय होने का अधिकार प्रदान कर रहे हैं. लेकिन यदि, चल रहे हालत को माना जाय तो वह समय दूर नहीं है कि किसी दिन नंदन निलेकनी इस चापलूस और चाटुकारों की दुनिया को त्यागकर अपनी आईटी की दुनिया में वापस चले जाएँ.

निलेकनी के अत्यंत करीबी के एक अधिकारी ने “मीडिया दरबार” को बताया कि “अभी इस विषय पर कुछ भी टिपण्णी करना ठीक नहीं होगा, लेकिन बनते हालत में इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि निलेकनी अपना त्यागपत्र प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को समर्पित कर अपनी आईटी की दुनिया में वापस चले जाएँ.” निलेकनी स्वयं बातचीत के लिए उपलब्ध नहीं थे. गौरतलब है कि निलेकनी ने प्रधान मंत्री के ‘विशेष अनुरोध’ पर ही इनफ़ोसिस छोड़ा था और प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की मदद के लिए दिल्ली आये थे.

कहीं तो गड़बड़ है: मोंटेक सिंह आहलूवालिया

सूत्रों का मानना है कि गृह मंत्री चिदम्बरम ने इस विभाग पर होने वाले खर्चों को फिजूल खर्च बताया है और इससे प्रेरित होकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने अगले वित्तीय वर्ष (2012-13) में यूआईडीए को आवंटित होने वाले कुल राशि में 50 फीसदी की कमी कर दी है. निलेकनी इस बात को लेकर मानसिक तौर पर काफी परेशान है और शायद अपना मन भी बना चुके हैं इन खुर्रांट राजनीतिज्ञों से अलग अपनी दुनिया में वापस होने का.

सूत्रों के अनुसार, अगले वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए यूआईडीए ने कुल 3,500 करोड़ की मांग की थी. दुर्भाग्यवश चिदम्बरम और अहलुवालिया की “मिली भगत” के कारण इस राशि को सीधे आधे से भी कम कर दिया गया और योजना आयोग ने मात्र 1,400 करोड़ राशि की पेशकश की है. आश्चर्य है कि पिछले वित्तीय वर्ष 2011-12 में यूआईडीए को कुल 3,000 करोड़ राशि मुहैया कराई गई थी.

वैसे प्रधान मंत्री जो कि योजना आयोग के अध्यक्ष भी होते हैं, ने इस विषय पर किसी भी प्रकार की “दखलंदाजी” अब तक नहीं की है, लेकिन प्रधान मंत्री कार्यालय के सूत्रों के मुताबिक, वे स्वयं इस घटनाक्रम से स्तब्ध हैं. सूत्रों के मुताबिक, प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के “व्यक्तिगत अनुरोध” पर ही नंदन निलेकनी अपनी आईटी की दुनिया को छोड़ कर देश के प्रत्येक नागरिक को एक भारतीय होने का पहचान पत्र और नागरिक संख्या उपलब्ध कराने के लिए यूआईडीए का कार्यभार संभाला था.

यूआईडीए के अधिकारी ने बताया कि “यह दलगत राजनीति और कुंठित मानसिकता” का परिणाम है. अधिकारी के अनुसार, “यूआईडीए में निलेकनी किसी भी मौद्रिक विषय में अपने आप को नहीं जोड़े हैं. किसी भी तरह के मौद्रिक लेन देन में सम्बंधित बिलों का भुगतान सीधा सरकार द्वारा किया जाता है, जहाँ किसी भी प्रकार का कोई गोलमाल संभव नहीं है. हों सकता है, यह भी एक कारण सकता है जो गृह मंत्री या योजना आयोग के उपाध्यक्ष के गले नहीं उतरता हों. प्रधान मंत्री इस विषय से वाकिफ है या नहीं अब तक मालूम नहीं, लेकिन बनते हालातों में निलेकनी का प्रधान मंत्री से मिलकर अपना त्याग पत्र समर्पित करने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है.”

उपाय है जरूरी : पी चिदंबरम

आतंरिक छान-बीन से ऐसा प्रतीत होता है कि “गृहमंत्रालय ‘आधार’ की बढती लोकप्रियता को कमजोर कर नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) को प्रमुखता देना चाहता है.  एनपीआर भी लगभग ‘आधार’ जैसा ही एक प्रयास है जो देश में लोगों कि आबादी के अतिरिक्त कुछ अन्य सूचनाओं को एकत्रित कर रहा है. चुकि इस कार्य का करता-धर्ता गृह मंत्रालय है और गृह मंत्री की देख रेख में है, इसलिए ‘आधार’ के बजट में कटौती कर उसे प्रोत्साहित किया जा सकता है. इसमें मंत्री के अलावा इस कार्य में जुड़े आला अधिकारियों की आमदनी संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है.”

आतंरिक सूत्रों का कहना है कि गृह मंत्री यह चाहते हैं कि एनपीआर के तहत एकत्रित आंकड़े और सूचनाओं का इस्तेमाल यूआईडीए के अधीन किये जा रहे यूआईडी  में किया जा सकता है इसलिए यूआईडीए पर होने वाले सभी व्यय “बेकार” हैं. इतना ही नहीं, गृह मंत्रालय ने तो यूआईडीए की स्थापना और इसकी स्वायतत्ता पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. सूत्रों के अनुसार यूआईडीए की स्थापना और इसकी स्वायत्ता तब तक मान्य नहीं है जब तक नेशनल ऑथोरिटी ऑफ़ इंडिया बिल 2010 संसद द्वारा पारित नहीं हो जाता. गौरतलब है कि यह बिल अभी संसद की स्टैंडिंग कमिटी के पास अवलोकनार्थ पड़ा है.

एक अधिकारी तो यहाँ तक कह गए: “यह कैसे संभव है कि जिस संस्था का कोई संवैधानिक आधार नहीं हो, भारत की संसद उसकी स्थापना और स्वायत्ता को क़ानूनी रूप ना दे दे, तब तक इस पर इतनी बड़ी राशि का व्यय तो तर्क संगत नहीं लगता, साथ ही, इसके द्वारा इस स्थिति में ‘आधार कार्ड’ निर्गत करना क्या क़ानूनी दस्तावेज हों सकता है?” यूआईडीए अब तक एक करोड़ आधार कार्ड बनाकर वितरित कर चुका है और आगामी 2014 तक साठ करोड़ आधार कार्ड वितरित करने का लक्ष्य  है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

10 Comments

  1. Shraman N L says:

    बारह अंको का आधार, गुरु नहीं है खोंट।
    चाहे बैंक में खाता खोलो, चाहे डालो वोट ॥
    अलग दिखोगे भीड़ से या पूछे पहचान।
    सब मर्जों की एक दवा है कोई नहीं अनजान॥

    क्या है आधार -बारह अंकों का पहचान नंबर कार्ड- इसमें अंकित-हर व्यक्ति के लिए अलग,बच्चों के लिए भी -व्यक्ति का जन सांख्यकीय और बायोमीट्रिक रिकार्ड होता है। इसमें दर्ज-यूनीक आईडी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पहचान देती है. इस कार्ड में फोटो, नाम ,जन्म तिथि, लिंग, कालातीत अवधि, ऊँचाई, आँखों का रंग, पहचान दर्ज होती है। पिता या पति का नाम, पता, फोन नम्बर, ईमेल, बैंक् खाता संख्या, अंगुलिओं के निशान, आदि का अभिलेख कार्ड को मशीन में डालने पर दिखता है। इस पर कार्ड धारक व जारी करने वाले अधिकारी के हस्ताक्षर होते हैं।
    (भूलना भूल जाओगे पुस्तक से साभार)

  2. आओ !देखो! भारत के प्राणो में क्या उन्माद भरा है ।
    शासन के प्रतिबन्ध व्यर्थ है,और व्यर्थ है सब धारायें ,
    उन्हें तोङकर जनता के स्वर गुज रही हैं सभी दिशाएँ ।
    नारी कंण्ठ पुकार रही है ,उनके उपर हो रहे जुर्म मिटाओ ,
    जनता दाँत पिसती जाती , बंद हथेली उसकी खुल जाती ।
    पर नेता के शासन में,देश की जनता चुप बैठकर आज तमाशा देखती जाती ।
    एक हाथ जब उठता था,किसी देश भक्त नेता का, हाथ हजारो उठ जाते थे ,
    पर जब आज का नेता अपना हाथ उठाता है ,जनता के दुसरे हाथ में जूता-चप्पल उठ जाता है ।
    एक बार यदी उठ जाती, मिलकर आवाज ईस धरा से आती ।
    रख देती वह पीस भ्रश्टाचारी लोगो को, चटनी कर उसको खाती ।
    उठ नहीं रही है आवाज ईस धरा से,मैं क्या समझूँ सबको सूँघ गया है साँप ।
    आजाद देश की जनता हो गयी गुलाम, सरकारी कुत्ते जनता के चुने नुमाईन्दे हो गये है साँप ।
    सोचो, क्यो लोग अकारण ,आज गुलामी को अपनी ही मजबुरी बताएँ ।
    क्यों न हिन्दूस्तान की जनता मिलकर करे विरोध, सब अपना रोष जताएँ ।
    क्या हो गया है ,आज के ईस भारत को,यह भी चाहिए,वह भी चाहिए,सब कुछ चाहिए ।
    भुजा(हाथ)उठा कर नेता जनता से बोले,हमें सिर्फ़ वोट चाहिए वोट चाहिए ।
    आज देश की जनता की उठी भुजाएँ बोली,हमें सिर्फ़ नोट चाहिए नोट चाहिए ।
    पर सोचो ऎसे में इस देश क्या होगा, वह दिन दुर नहीं जब ब्लैक मनी सबकी जेब में होगा ।
    लाख तुम धर्मनिती की बाते कह डालो , फिर भी ब्लैक मनी कमाऊँगा ही ।
    और देश के लिए कुछ कर न सका तो क्या,अपनी सात पुश्ते बिठा कर खिलाऊँगा ही ।
    भरा कहाँ है, घडा पाप का उसको और भरना है, हर हिन्दूस्तानी को गुलाम बनाकर रखना है ।
    क्यों अपनी पुण्य-भूमि को अपने ही पापी दल करें कलंकित ?
    क्यों सच का दमन करें ये भोली-भाली जनता को करें आतंकित ?
    क्यों न बम से जला देते,उन भ्रश्टाचारी लोगों को, निर्दोष को बनाते अपना निशाना ।
    एक बार तो हमको दम दिखलाना ही होगा, अब नहीं चलेगा कोई बहाना ।
    क्या हो गया है ईस आजाद देश को,भ्रष्टाचार नंगा नाच रहा है ।
    भारत देश की जनता कि यह कैसी खामोशी ,सब कुछ भौचक्का देख रही है ।
    मैंने तो संकल्प कर लिया है, मरना तो है ही फ़िर डर-डर कर क्यों जिना ।
    ब्यर्थ है अपनो का मोह, छोड.प्राण के पंछी सभी को एक दिन है जाना ।
    भूल न पायें जिसको सदियाँ, ऎसी क्रान्ती ज्योंति लेखनी जनता तक पहूँचाऊगा ।
    अगर बे मौत मर गया तो,इस शासन की जड. भी हिल जायगी ।
    मेरी क्रान्ती ज्योंति से आजाद हिन्दूस्तान के जीवन की फ़ुलवारी-सी खिल जायेगी ।
    यह मिट्टी जो अमर शहिदों की, अपबित्र हो गयीं है भ्र्ष्टाचारी लोगों से ।
    उसकी आजादी के लिए ,इस पर प्राण निछावर करते मन न तनिक हिचके ।
    यह डर निकाल फेंको तुम अपने जीवन से, नहीं अधिकार और किसी का मेरे जीवन पर ।
    भुल कर भी मत देना अधिकार अपने जीवन के ,जोर नहीं और किसी का मेरे जीवन पर ।
    धिक्कार है ऎसे जीवन को जहाँ ,आजादी का कोई मोल नहीं ।
    चिकनी-चुपडी. बातों से ईस देश का, अब उध्द्दार नहीं ।
    ईन्सानों के दिलों में अब कोई देश प्रेंम का मोंल नहीं ।
    जब से हिन्दूस्तान की आजादी को, बेईमानों ने अपना आशियाना बनाया ।
    तब से अब तक एक भी माँई का लाल , लाल बहादुर , नेता सुभाष नहीं आया ।
    भाषण से ही जनता को बेवकुफ़ बनाया जाता ,वहीं दुसरे दीन मिडियाँ और प्रेंस में दिखाया जाता ।
    आज का दौर
    यह देश है बेईंमानो का रिश्व्वतखोरो का भ्रष्टाचारी लोगों का ,ईस देश का यारों क्या कहना ।
    यहाँ चौड्य़ी छाती नामीं गुन्डों की,भोली शक्लें चोरों की ।

  3. राजनिती चालीसा
    भ्रश्टाचार चालीसा
    दोहा
    जनता के हक है , नेतन के पैरन की धुल !
    हर नेता पाल रखत् है, गुन्डन को जनता के अनकूल !
    अनपण नेतन के दुवारे , नतमस्तक होवै जात है अच्छॆ-अच्छॆ वीर् !
    अपनी कुर्सी की धौश् में , भारत देश के नेता भ्रस्र्टाचार् को आपस में पकावैं खीर !
    चौपाई
    जय हनुमान ग्यान गुन सागर ! भ्रश्टाचार राजनिति से उजागर !!
    जनता का सेवक चुनाव जीत हुआ बलवाना! बेईमानी उसकी माता,भ्रश्टाचार सुतनामा!
    जीत चुनाव हुआ अति बलवन्ती !शतबुध्दि को त्याग हुआ कुमति के संगी !!
    सोना चाँदी आगन ऎसे बिराजॆ ! जॆसे बारिश मे कुकूर मुत्ता घर आगन मे साजे !!

    बाहो मे बाला ऒर मदीरा बिराजॆ ! तन पर सफ़ेद कुर्ता ऒर द्दोती साजॆ !!
    राक्षसी प्रबृति के लोगो ने राजनिति का किया हॆ खंड्न ! फ़ॆली गुन्डा गर्दी हुआ समाज मे खन्ड्न!!
    विद्या वीहिन लोग हुए राजनिति मे अति चातूर ! कहते है मै हूँ जनता की सेवा करने को आतूर !!
    चरित्र वीहिन हो गया है सब नेता ! समाज के जितने भी अवगुण सब इनमे बस लेता !!
    भोली सकल लेकर जनता के सन्मुख आवा ! जीत चुनाव पाँच साल फिर नही कबहू मुँख दिखावा !!
    महाकाल रुप धरि सब कुछ लीए डकारे ! हमरे देश का कानून सुबह शाँम झाडू मारे इनके दुवारे !!
    गठबन्धन की राजनिति अब सवै चलावै ! मनमोहन कि छ्वी पर भी अब दाँग लगावे!
    राहूल ने भी की मनमोहन की बहुत बडाई ! तुम हो काग्रेस मे वेदाग नेताओ मे मेरे भाई !!
    आज सहज ही पूरा भारत तुम्हरे गुन गावै ! पर ऎसे मे भाजपा तुम्हरे गले की फाँस बनावै !!
    टेलीकाम,कामनवेल्थ,आ.पी.एल,आदर्शा ! राजा,कलमाडी,ललीतमोदी,अशॊकचौहान,सुरर्शा!!
    देश की जनता कुछ भी कह ले ईस जहा मॆ ! अब हमारा कोई कुछ नही कर सकता सारे जहा मे !!
    तुम सब हमे चुनाव जिताकर कोई उपकार नही है कीन्हा ! नोटो की गड्डी दारुँ की बोतल दी, तब तुमने वोट है दिन्हा !!
    हमेशा हमने झूठा प्रचार किया मनमानी ! मुरख जनता मुझको वोट देकर खुद से किया बेईंमानी !!
    स्वीज बैंक हजारो कोष दूर है, यारो जाना ! फ़िर दो-चार हजार वहा लेकर क्या जाना !!
    जनता की गाडी कमाई ! हमने दिया स्वीज बैंक मे जमा कराई !!
    ईतना जोखिम काम भला हम जनता को क्यो देते ! भारत मे बैंको की रखवाली फिर हम किसको देते !!
    कहने को हम है जनता के रखवारे ! लेकिन बिना हमारी आज्ञा कोई हाथ पॉव भी नही मारे !!
    राजनिति मे सब कुछ जायज है करना ! फिर देश की जनता और कानून से हमे क्या डरना !!
    हम अपनी गुन्डा गर्दी और बडाते जावैं ! देश की जनता को लूटते और डराते जावैं !!
    थाना-पुलिस कभी हमरे निकट नहि आवैं ! कमीने नेताओ का जब नाम सुनावै !!
    सरकारी महकमा समाज में है एक कीडा ! भॊली-भाली जनता को देती हरदम पीडा !!
    संकट मे ये अपनो को और फ़सावै ! पैसा कौडी,ईज्जत सब कुछ दाँव पर लगवावै !!
    कभी-कभार जनता होवै हैं सब पर भारी ! पर उनका भी हक गटक गये सबको किया भिखारी !!
    राजनिति में अगर कोई सच्चा आना चाहे ! समझ लो वह अपनी जिन्दगी से जान गवाए !
    चारो दिशाओ में घुम-घुम किया अत्याचारा ! तब जाकर किया ईतना बडा भ्रस्टाचारा!!
    साधू सन्त सब है राजनिति के चट्टू-बट्टू ! गेरुवा वस्त्र पहन कर हर जनता को घुमाते लट्टू- लट्टू !!
    राजनिति में सब कुछ जायज ठहराया जाता ! चुनाव प्रचार में नेता बडे-बडे वादो का पुल बाधता जाता !!
    देश की जनता कट्पुतली,कानून हमारी मुट्टी में ! शाँम सवेरे तलवे चाटती पुलिस हमारी चुट्की में !!
    हमारे झूठे- झूठे भाषण् लोगो को अति भावै ! मानो वे अपने को जन्मो-जनम् धन्य व्हे जावै !!
    पाँच साल बाद नेता फिर जनता के बीच मे आवै ! जब वह फ़िर अपनी किस्मत को अजमावै !!
    लेकिन अब उसके अपने भी साथ न धरईं ! अब तो जेल मे बैठकर ऎश करईं !!
    सब अवगुन समाप्त करे राजनिति पिटारा ! जब राजनिति का लिया सहारा !!
    जै जै जै राजनिति गोसाईं ! तुम्हरी कृपा हम जैसन पर सदा बनाई !!
    जो सत् बार पाठ राजनिति चालीसा कोई !अपराध् मुक्त्त् समाज ईस देश मे पैदा होई
    !!
    दोहा
    नेता जनता से वादा करत संकट हरन , मुरख जनता भी पूजत नेता मंगल मुरत रुप !
    नेतन की सब पीडीं जन्मो जनम राज करिहै ,ऎशन बिचार जनता अपने ह्र्दय में बषहूँ शुर भूप !!

  4. YASHWANTSINGH says:

    ऐसा लगता है कि देश में अभी अच्छी लिए हुए लोग भी बहुत है |

  5. राहुल गंगाधरन says:

    शिवनाथ झा और मीडिया दरबार को बहुत बहुत बधाई जो इंतना महत्वपूर्ण रिपोर्ताज उपलब्ध करवाया. इस देश के नेता और लालफीताशाह को जब तक किसी परियोजना के बजट में से हिस्सा न मिले, उन्हें चैन नहीं मिलता और वे उस परियोजना के पीछे हाथ धोकर लग जाते हैं. दुःख तो इस बात का है की चंद पत्रकार भी उनके इस खेल में शामिल हो जाते हैं फिर नंदन निलेकनी की क्या बिसात इन चालों को मात देने की.

  6. जितेन्द्र नारायण says:

    केवल काम करने वालों के लिए भारत एक असुरक्षित जगह है.आपको यहाँ के सारे निकम्मे लोग जो किसी-न-किसी नकारात्मक प्रवृति जैसे-जातिवाद,सम्प्रदायवाद,परिवारवाद,निहित स्वार्थ, घटिया राजनीति आदि से लैस होते हैं,की ओर चुम्बक की तरह खींचना चाहते हैं. अगर आप नहीं खिंच पाए तो फिर आप पर कीचड़ उछालना शुरू कर देते हैं.मैं व्यक्तिगत रूप से नंदन निलेकनी का प्रशंशक हूँ और उनका समर्थन करता हूँ.

  7. Manjari Kaur says:

    क्या आप बता सकते हैं की इस आलेख के लेखक वही शिवनाथ झा हैं जो ९० के दशक में इंडियन एक्सप्रेस में हुआ करते थे? मैं अभी कनाडा में हूँ और उस ज़माने में दिल्ली में उन्हें पढ़ा करती थी. मुद्दत बाद फिर कलम के सिपाही से वेब पर मुलाक़ात हुई.

    • admin says:

      जी हाँ, इस रिपोर्ट के लेखक वही शिवनाथ झा हैं, जो कभी इंडियन एक्सप्रेस में हुआ करते थे.

  8. इस आलेख (खबर कह कर जानकारी का अपमान होगा) से स्पष्ट है कि ऐसा अवश्य हुआ होगा…जब एक वित्तीय वर्ष में उपलब्ध करवाई जाने वाली राशि और उसी के अगले वित्तीय वर्ष में उपलब्ध करवाई जाने वाली राशि का अंतर इस तरह का है जैसे कि ये प्रोजेक्ट समाप्ति की ओर है..
    एक बात तय है कि राजनीतिज्ञ किसी भी रूप में देश की घुसपैठ का समस्या, शरणार्थी समस्या को सुलझाना नहीं चाहते हैं, इसी कारण इस तरह के कदम उठाये जाते हैं कि सही आदमी स्वयं ही काम छोड़ दे और यदि आगे सरकारी तंत्र को काम करवाना पड़े तो वे अपने चमचों से करवा कर स्वार्थ-सिद्ध कर सकें…
    इस घटना के पीछे लम्बा खेल है…

  9. prafulla das says:

    Great story Shivnath. It might take many more years for the UIDAI to issue these cards to all the people. Everything appears to be so frustrating.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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