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क्या गुरू गोगोई का खेल बिगाड़ देगा चेला..

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भारतीय जनता पार्टी के नेता हेमंत बिस्वा सरमा ने अप्रैल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में कामयाबी के लिए पूरी ताकत झोंक दी है..
वे लगातार दौरे कर रहे हैं, कमज़ोर कड़ियाँ कसने में लगे हैं, और हाँ उनका न्यूज़ चैनल भी उनकी मदद के लिए पूरी तरह से तैनात है..

-मुकेश कुमार||

दरअसल, हेमंत के लिए असम विधानसभा चुनाव प्रतिष्ठा बचाने के साथ-साथ राजनीतिक जीवन-मरण का भी प्रश्न है. ये एक बड़ी चुनौती भी हैं और बड़ा अवसर भी.
चुनौती ये साबित करने की है कि वे अपने दम पर भाजपा को जीत दिला सकते हैं या नहीं. विरोध के बावजूद भाजपा हाईकमान ने उन पर लगे तमाम दाग़ों को दरकिनार करके इसी उम्मीद में गले लगाया था कि वे पूर्वोत्तर में झंडा गाड़ने के उसके मिशन को अंजाम देंगे.

hemant biswa
हेमंत पर कम से कम तीन मामलों में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं. शारदा चिट फंड घोटाले में सीबीआई उनके घर पर छापे मार चुकी है. इसके मालिक सुदीप्तो सेन से उनके करीबी रिश्तों के बार में सीबीआई ने उनसे पूछताछ भी की थी.
इसके अलावा नॉर्थ कछार हिल्स घोटाले और लुईस बर्जर रिश्वत कांड में भी उनका नाम आ चुका है. और तो और भाजपा खुद भी उनके भ्रष्टाचार के बारे में बुकलेट जारी कर चुकी है.

निम्न मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले हेमंत की आर्थिक तरक्की चौंकाने वाली है. इसमें उनके अल्फा से संबंधों का कितना योगदान रहा, ये आम चर्चा का विषय रहता है.
जहाँ तक अवसर का सवाल है तो वह हेमंत के ख़ुद मुख्यमंत्री बनने का है. कांग्रेस छोड़कर उन्होंने भाजपा का दामन इसीलिए थामा था कि तरूण गोगोई ताज उन्हें सौंपने के लिए तैयार नहीं थे.
मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्होंने गोगोई के खिलाफ़ मुहिम छेड़ी और पार्टी के अंदर बगावत भी की. लेकिन जब फिर भी उनकी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हुई तो पार्टी को तोड़ने की कोशिश भी कर डाली.
भाजपा में शामिल होते वक्त वे तोहफे के तौर पर नौ विधायक भी साथ ले गए. हालाँकि उन्होंने वादा तो 52 विधायकों का किया था, मगर वह पूरा नहीं कर सके.
दरअसल, हेमंत की पहचान ही यही है कि वे एक अच्छे चुनाव प्रबंधक हैं. पिछले चुनाव में कांग्रेस की शानदार जीत के लिए उनके प्रबंधन को भी श्रेय दिया जाता है.
हेमंत एक अच्छे वक्ता भी हैं और कड़ी मेहनत करने वाले नेता भी. लोगों को साथ लेने का हुनर उन्हें आता है. वे विरोधियों को सहमत करने में माहिर माने जाते हैं.

गोगोई मंत्रिमंडल के सबसे काबिल मंत्री के रूप में भी उनकी पहचान होती थी. शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके काम को काफी सराहा गया था.
एक समय वे मुख्यमंत्री गोगोई के दाहिने हाथ माने जाते थे. लोगों का ये भी मानना था कि गोगोई उनकी सलाह के बिना कुछ नहीं करते थे. गोगोई ने पूर्व में उनका बचाव भी किया था.
हेमंत पर अल्फा के लिए काम करने का आरोप लग चुका है. पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार भी किया था. गोगोई की मेहरबानी से वे बच गए. केस डायरी ही ग़ायब हो गई और उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी.
ख़ुद गोगोई प्रेस कांफ्रेंस में कह चुके हैं कि हेमंत उनकी आँखों के तारे थे और जिस भी काग़ज़ पर दस्तख़त करने लिए कहते थे, वे कर देते थे. शायद यहीं से हेमंत की महत्वाकांक्षाओं को पंख लगने शुरू हो गए थे.
हेमंत के बारे में ये भी आरोप है कि जो भी उन्हें बढ़ावा देता है, वे उसी के साथ धोखा करते हैं. पहले हितेश्वर सैकिया के साथ भी उन्होंने ऐसा किया था.

मुख्यमंत्री के साथ उनकी अनबन तब शुरू हुई जब गोगोई ने अपने बेटे गौरव गोगोई को आगे बढ़ाना शुरू किया. हेमंत को लगा कि मुख्यमंत्री पद का नया दावेदार खड़ा हो रहा है. बस तभी उनका सुर बदल गया. वे विद्रोह पर उतर आए.
बहरहाल, भाजपा हाईकमान ने उन्हें पार्टी में शामिल करते ही चुनाव अभियान के संयोजक की ज़िम्मेदारी सौंपकर उन पर विश्वास भी जताया था. पार्टी के पास राज्य में कोई खास प्रभावशाली नेता भी नहीं था, इसलिए ये उसकी मजबूरी भी थी कि वह हेमंत को ही कमान सौंपे.
लेकिन हेमंत के सामने अब केंद्रीय मंत्री सर्बनंद सोनोवाल के रूप में एक प्रतिद्वंद्वी भी है. सुषमा स्वराज ने उन्हें भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश भी कर दिया है. ऐसे में उन्हें अपनी गोटियाँ बहुत सँभलकर चलनी होगी.
शायद इसी को ध्यान में रखकर उन्होंने मीडिया के ज़रिए अपनी इमेज बिल्डिंग का काम तेज़ कर दिया है. उनका चैनल दिन-रात इस काम में जुटा हुआ है. भाजपा हाईकमान को ये बात सुहा नहीं रही लेकिन अभी वह उन्हें रोकना नहीं चाहता.

वैसे हेमंत के सामने सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे अपने कितने समर्थकों को टिकट दिलवा और जिता सकते हैं. हालाँकि संभावनाएं बहुत कम हैं. अगर भाजपा जीतती है तो मुख्यमंत्री पद का फैसला करते समय इसका सबसे अधिक महत्व होगा.
कांग्रेस से उनके साथ केवल नौ विधायक आए थे और वे सभी जीतकर आएंगे इसमें भी संदेह है. आधे विधायकों के चुनाव क्षेत्रों से अच्छी रिपोर्ट नहीं है.

(बीबीसी)

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. mahendra gupta on

    ऐसे नेता किसी के भी नहीं होते यदि उनके स्वार्थ पुरे नहीं होते हैं तो ये अवसरवादी लोग निष्ठाएँ बदल सकते हैं, भा ज को यह बात याद रखनी चाहिए वैसे भी मुख्यमंत्री पद की लालसा में आये हैं अतः ऐसा कुछ होता नहीं दिखा तो वापिस कांग्रेस में जाते दिखाई देंगे

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