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‘ड्रॉमेबाज़’ केजरीवाल सरकार के दो क्रान्तिकारी फ़ैसले हुक़ूमतों का मिजाज़ बदल देंगे..

By   /  January 28, 2016  /  No Comments

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-मुकेश कुमार सिंह॥

दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार को मैं बुनियादी तौर पर एक ‘ड्रॉमेबाज़’ सरकार मानता रहा हूं. अपने कई ब्लॉग में मैंने इस सरकार के अपरिपक्व फ़ैसलों की बख़िया भी उधेड़ी है. लेकिन आज केजरीवाल सरकार के ऐसे दो क्रान्तिकारी फ़ैसलों की बात, जो दिल्ली ही नहीं धीरे-धीरे पूरे देश की तमाम छोटी-बड़ी सरकारों के अन्दाज़ को बदलने का सबब बनेगी.images

केजरीवाल सरकार जितनी संजीदगी के साथ अपनी ‘पेपर-लेस ऑफ़िस’ योजना पर काम कर रही है, वो बेशक, क़ाबिल-ए-तारीफ़ नीति है. इसी कड़ी में, सूचना के अधिकार (RTI) से जुड़ी सारी गतिविधियों को भी तीन महीने में ‘ऑन-लाइन’ करने का लक्ष्य रखा गया है. ये फ़ैसला भी मील का पत्थर साबित होगा. केजरीवाल सरकार ने यदि अपने ये दोनों संकल्प निभा लिये तो जल्द ही वो देश की सबसे पारदर्शी हुक़ूमत का दर्ज़ा पा सकती है. ऐसा होते ही दिल्ली का मॉडल पूरे देश के लिए मिसाल बन जाएगा.

21वीं सदी, IT यानी Information Technology की सदी है. दुनिया भर में सबसे क्रान्तिकारी बदलाव इसी IT के ज़रिये विकसित हुए हैं. इसकी अहमियत को समझने के लिए अतीत में झांकना बहुत दिलचस्प होगा. इंसान की तरक्की में पहला सबसे बड़ा योगदान पहिये की ख़ोज का था. पहिये की गतिशीलता ने मनुष्य का जीवन आसान बनाया. इंसान की उत्पादकता बढ़ी. फिर जानवरों को पशुओं के रूप में साधकर मनुष्य ने उसी पहिये में और उत्पादकता तथा गतिशीलता का इज़ाफ़ा किया. घोड़े में अपरिमित गतिशीलता थी. तो बैल में अपार शक्ति थी. हाथी में विशालता का वैभव था. जबकि ऊंट अपने इलाके का विलक्षण प्राणी था. हज़ारों साल इन पशुओं का बदौलत विकसित होते रहे कृषि प्रधान अर्थतंत्र ने सारी दुनिया पर राज किया.

मध्यकाल में बारूद की ख़ोज से मानव इतिहास में ख़ूब भूचाल आये. अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए इंसान ने इंसान के साख जमकर युद्ध किये. सल्तनतें बनायी और मिटायी गयीं. फिर औद्योगिक क्रान्ति के आगमन ने पूरी दुनिया को उलट-पुलट डाला. तरह-तरह के इंजन बने, जिन्होंने उत्पादकता और गतिशीलता की ऐसी उपलब्धियां हासिल कीं कि आये दिन एक से बढ़कर एक, अद्भुत ख़ोज और उपकरण इंसान के सामने आते गये. बिजली, टेलीग्राफ़, रेडियो, टेलीफ़ोन, टीवी और पेट्रोलियम की ख़ोज और विस्तार का इतिहास सौ-डेढ़ सौ साल का ही तो है. लेकिन ज़रा देखिए, इन सबने मिलकर इंसान के जीवन को कहां से कहां पहुंचा दिया! हरेक तकनीक का एक ही मकसद था – इंसान के जीवन को आसान बनाना, उसकी उत्पादकता और गतिशीलता को और ऊंचा उठाना.

पहला दौर, मेकैनिकल-क्रान्ति का था तो दूसरा इलेक्ट्रिक-क्रान्ति का और तीसरा इलेक्ट्रानिक-क्रान्ति का. कम्प्यूटर की ख़ोज के बाद दुनिया डिज़िटल-क्रान्ति के चौथे दौर में जा पहुंची. ये डिज़िटल क्रान्ति का ही क़माल है कि आज इंसान की संख्या से भी कई गुना ज़्यादा कम्प्यूटर उसकी सेवा में लगे हैं. सबसे छोटे कम्प्यूटर को माइक्रो प्रोसेसर कहते हैं, जो ज़्यादातर इलेक्ट्रानिक उपकरण का हिस्सा हैं. इंटरनेट के विस्तार के बाद डिज़िटल-क्रान्ति की पताक़ा अब IT के हाथ में है. थोड़े वक़्त पहले तक जिस डिज़िटल-क्रान्ति का उद्देश्य इंसान की उत्पादकता और गतिशीलता को और ऊंचा उठाना था, वहीं अब IT का लक्ष्य ऐसे तकनीकी विकास को सुनिश्चित करना है जो इंसान को इंसान के मनमानेपन और अराजक ढर्रों से मुक्ति दिला सके और सही मायने में एक समता मूलक समाज स्थापित कर सके. ‘ई-गवरनेंस’ की सारी परिकल्पना का सार यही है.

भारत में कम्प्यूटर को लाने का श्रेय राजीव गांधी को मिला. आम जनता ने रेलवे आरक्षण के रूप में कम्प्यूटर के चमत्कार का पहला रसास्वादन किया. धीरे-धीरे कम्प्यूटर का विस्तार जीवन के हर क्षेत्र में दिखने लगा. सरकारों ने सबसे पहले अपनी बेवसाइट्स को बनाने का काम शुरू किया. इसी से ‘ई-गवरनेंस’ के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने का काम हुआ. अगला दौर ‘ऑन-लाइन’ की क्रान्ति से आया. बैंकिंग को इसने आमूलचूल बदल दिया. अब, ‘ई-ऑफ़िस’ के विस्तार का दौर है. दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने इसी ‘ई-ऑफ़िस’ को पूरी तरह से अपनाने की मुहिम छेड़ रखी है. ‘ई-ऑफ़िस’ की क़ामयाबी को ही ‘पेपर-लेस ऑफ़िस’ कहते हैं. इसमें सरकार का हरेक काम कम्प्यूटर और डिज़िटाइज़ेशन के सिद्धान्तों के मुताबिक़ होता है. इसमें फ़ाइलें क़ाग़ज के रूप में नहीं दौड़ती, बल्कि उन्हें कम्प्यूटर-डाटा के रूप में एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता है.

‘पेपर-लेस ऑफ़िस’ की बदौलत सरकार के काम करने की गति में बेशुमार तेज़ी लायी जा सकती है. इससे जनता के काम बहुत तेज़ी और पारदर्शिता से हो सकते हैं. सरकार दफ़्तरों में धक्के ख़ाने, दलालों और रिश्वतख़ोर कर्मचारियों के शिकंज़े से मुक्ति मिल जाती है. सबसे बढ़कर, सरकारी कर्मचारियों पर नकेल कसना मुमकिन हो सकता है. उनके लिए भाई-भतीजावाद के हथकंड़ों को अपनाकर एक-दूसरे की नाजायज़ हरक़तों पर लीपा-पोती कर पाना मुश्किल हो जाता है. हरेक व्यक्ति की उत्पादकता का कम्प्यूटर में ही ऐसा अकाट्य लेखा-जोख़ा होता है कि छोटा हो या बड़ा, कोई भी कर्मचारी या अफ़सर उसके फन्दे से बच नहीं सकता. हिन्दुस्तान की ज़ंग खा चुकी सरकारी व्यवस्थाओं के लिए ‘ई-ऑफ़िस’ सबसे बड़ा वरदान साबित होगी.

ज़िन्दगी के कितने ही क्षेत्रों में ‘ऑन-लाइन’ गतिविधियों ने आम जनता का जीवन बदल दिया है. इसे देखते हुए ही केजरीवाल सरकार ने पूरी दिल्ली सरकार को ‘ई-ऑफ़िस’ में बदलने का काम हाथ में लिया है. इसी दिशा में काफ़ी काम हो चुका है. बाक़ी बचे काम को भी तेज़ी से आगे बढ़ाया जा रहा है. हालांकि, दिल्ली सरकार में डिज़िटाइज़ेशन की बुनियाद शीला दीक्षित के ज़माने में ही रखी गयी थी. ये मनमोहन सिंह सरकार की 2008 में चालू हुई ‘ई-गवरनेंस’ योजना का हिस्सा था. इससे देश की हरेक सरकार को जोड़ा गया था. कालान्तर में ऐसे ही छोटे-बड़े प्रयास भारत को बदलने का सबब बनते रहे. ख़ुशग़वार है कि केजरीवाल सरकार जिस तेज़ी से ‘ई-ऑफ़िस’ के मोर्चे पर आगे बढ़ रही है, उससे वो बहुत जल्द देश की पहली ‘पेपर-लेस ऑफ़िस’ वाली सरकार बन जाएगी. ऐसा होते ही अन्य सरकारों पर भी ख़ुद को बेहतर बनाने का दबाव बनेगा. फिर देखते ही देखते ये क्रान्ति राष्ट्रव्यापी हो जाएगी.

केजरीवाल सरकार ने सूचना के अधिकार से जुड़े सारे क्रियाकलाप को भी तीन महीने के भीतर ‘ऑन-लाइन’ कर देने का लक्ष्य रखा है. ये बेहद सराहनीय काम है. ‘ऑन-लाइन आरटीआई’ का मतलब ये है कि जनता को कम्प्यूटर के ज़रिये ही सरकार से ब्यौरा मांगने, उसकी फ़ीस जमा करवाने और फिर ‘ऑन-लाइन’ ही ब्यौरा पाने की सहुलियत मिल जाएगी. इससे सरकारी कामकाज़ में पारदर्शिता का स्तर और बढ़ेगा. सरकारी अफ़सरों की मनमानी घटेगी. रोज़मर्रा के भ्रष्टाचार पर भी इसका असर ज़रूर पड़ेगा. लेकिन ऊंचे दर्ज़े की रिश्वतख़ोरी को ये नहीं रोक पाएगा. दुनिया के तमाम विकसित देशों में भी ऊंचे स्तर की रिश्वतख़ोरी होती है. अलबत्ता, डिज़िटाइज़ेशन की वजह से वहां आम जनता को रोज़मर्रा में वैसी झंझटें नहीं झेलनी पड़तीं जैसी कि विकासशील देशों में होती है.

ज़ाहिर है, डिज़िटाइज़ेशन से बहुत सारी बीमारियों का समाधान हो सकता है. बेशक, ये हर मर्ज़ की दवा नहीं हो सकती. ये इंसान की पतित प्रवृत्तियों को नेस्तनाबूत नहीं कर सकती. डिज़िटाइज़ेशन ने पुरानी पीढ़ी के लोगों के लिए भारी चुनौती पैदा की है. सरकारी नौकरियों में भी 50 साल से ज़्यादा उम्र वाले ऐसे करोड़ों लोग हैं जो कम्प्यूटर पर काम करने का कौशल सीखना नहीं चाहते. फ़िलहाल, इस तबक़े का गतिरोध व्यवस्था परिवर्तन को झेलना पड़ रहा है.

लेकिन यक़ीन जानिए कि वो दिन दूर नहीं जब या तो पिछली पीढ़ी के इन लोगों को नये ज़माने के मुताबिक़ ख़ुद का ढालना सीखना होगा, या फिर वो कबाड़ की तरह दरकिनार कर दिये जाएंगे. उनके लिए महाभारत के अर्जुन की ‘न दैन्यम् न पलायनम्’ यानी ‘न दासता स्वीकार करूंगा और न ही पलायन करूंगा’ वाली प्रतिज्ञा काम नहीं आ सकती. उन्हें या डिज़िटाइज़ेशन की दासता को स्वीकार करना होगा या ‘वीआरएस’ (स्वैच्छिक सेवानवृत्ति) लेकर पलायन की राह पकड़नी होगी.

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  • Published: 2 years ago on January 28, 2016
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  • Last Modified: January 28, 2016 @ 6:30 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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