Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

पत्रकार ने बेपर्दा किया उत्तर प्रदेश लोकायुक्त घोटाला..

By   /  January 28, 2016  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

सुप्रीम कोर्ट तक को चकरघिन्नी बनाया था साजिशों ने..
सरकार की चलती तो संजय नहीं, वीरेंद्र ही होते लोकायुक्त..
सलाम कीजिये इस जुझारू-सजग पत्रकार के जज्बे को..

-कुमार सौवीर॥
लखनऊ: अब आइन्दा यह आरोप मत लगाना कि पत्रकार बिकाऊ होते या तथ्यों को तोड़ते-मरोड़ते हुए सच्चाई छिपाने का धंधा करते हैं। मैं दावे के साथ कहता हूँ कि सत्ता या विरोध की राजनीति के मंजे खिलाड़ियों में भी यह दम नहीं था कि वे लोकायुक्त पद के चयन को लेकर हुई भद्दी साजिशों का खुलासा कर सकते। लेकिन एक पत्रकार ने अपने दायित्वों का पालन किया और आज यूपी के लोकायुक्त पद पर जस्टिस संजय मिश्र के नाम पर सुप्रीम कोर्ट ने बाकायदा मोहर लगा दी।

 

न्यायालय को धोखा देने की साज़िश

न्यायालय को धोखा देने की साज़िश

दरअसल लोकायुक्त पद पर मनमर्जी की नियुक्ति पर साजिशें बुनने की धोखाधड़ी हो रही थी। करीब डेढ़ साल तक सपा सरकार ने अपने चहेते जस्टिस एनके मेहरोत्रा को गैरकानूनी ढंग से लोकायुक्त की कुर्सी थमाए रखा था। नए लोकायुक्त के चयन के लिए कोई कवायद ही नहीं की सरकार ने। मामला सर्वोच्च न्यायालय पर पहुंचा, लेकिन सरकार ने कोर्ट के आदेश को भी धता दे दिया। फिर कोर्ट ने तयशुदा वक्त में यह नियुक्ति का आदेश दिया। मगर सरकार ने मामला फिर फंसने की कोशिश की तो कोर्ट ने तत्काल हस्तक्षेप करते हुए सरकार से पैनल लिस्ट मांग कर वीरेंद्र सिंह यादव को लोकायुक्त बना डाला।
लेकिन इसमें भी गड़बड़ की गई। जो पैनल लिस्ट भेजी गई उसमें वीरेंद्र सिंह का नाम ही नहीं था। जाहिर है कि यह कोर्ट को अँधेरे में रख कर सरकार अपने चहेते वीरेंद्र सिंह यादव लोकायुक्त बनाने की साजिश में सफल हो गई।
मगर इसी बीच यूपी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने मामले में हस्तक्षेप कर दिया। वे बोले कि,” मेरी लिस्ट में वीरेंद्र सिंह यादव का नाम ही शामिल नहीं था। ”
यानी यह मामला स्पष्ट धोखाधड़ी का साबित होता जा रहा था। और इस षडयंत्र के छींटे सीधे सीधे सरकार पर पड़ रहे थे। विपक्ष के नेता ने भी इस बारे में मुंह स्पष्ट खोलने से परहेज़ किया। राज्यपाल मजबूर थे। वे आखिर कोर्ट या सरकार के मामले में कैसे हस्तक्षेप करते? उन्होंने वीरेंद्र यादव की ताजपोशी का समारोह राजभवन में करने का आदेश दे दिया।
अब साफ़ लगने लगा कि इस प्रकरण का पटाक्षेप हो चुका है। लेकिन इसी बीच एक पत्रकार ने इस गोरखधंधा के मामले पर पलीता लगा दिया। सच्चिदानंद गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में आनन-फानन याचिका दायर करते हुए गुहार लगायी कि वीरेंद्र सिंह यादव का नाम कोर्ट को भेजने में धोखाधडी हुई और वीरेंद्र यादव का नाम जब पैनल लिस्ट में था ही नहीं तो कैसे कोर्ट ने उनके नाम को फ़ाइनल कर दिया ?
अजब संशय शुरू हुए। बवाल बढ़ा तो सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल सिंह ने प्रेस के सामने अपना दामन दिखाया कि ,” मेरी कोई भी रिश्तेदारी वीरेंद्र यादव से नहीं है।” वीरेंद्र यादव भी बोले कि, ” मेरी बहुत दूरी की ही रिश्तेदारी सपा नेताओ से है।” सरकार से कोर्ट ने खूब जिरह की लेकिन अंततः तय हो ही गया कि मामले में संशय खूब मौजूद हैं। नतीजा यह कि आज सुप्रीम कोर्ट ने वीरेन्द्र यादव का पत्ता काट दिया। अब यूपी के नए लोकायुक्त बनाये गए हैं जस्टिस संजय मिश्र।
लेकिन अब असली सवालों का दौर शुरू हो चुका है। क्या वाकई यूपी सरकार इस नियुक्ति में निजी हित साधना चाहती थी? सुप्रीम कोर्ट ने जब पैनल लिस्ट मांगी तो किस सरकारी या प्रशासनिक नुमाइंदे ने कोर्ट को गलत सूची थमाई जिसके बाद से इत्ता बड़ा बवंडर मचा कि सरकार की विश्वसनीयता तक संदिग्ध हो गई? सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की पैरवी कर रहे बड़े वकीलों ने इस लिस्ट की वैधानिकता को जांचने की जरूरत क्यों नहीं समझी?
और सबसे असल जवाब तो सीधे यूपी सरकार और सुप्रीम कोर्ट को देना होगा कि इस मामले में वे गंभीर संवैधानिक संकट पर कब और किस पर जिम्मेदारी तय करेंगी। लेकिन यह सवाल हमेशा जमीन में दबा ही रहेगा कि सरकारों को अपना संवैधानिक दायित्व टालने से कैसे रोका जाए, और कैसे अदालतें ऐसे संवैधानिक संकटों से दूर रहें। जाहिर है कि इस सवाल का जवाब तो जनता ही देगी।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 2 years ago on January 28, 2016
  • By:
  • Last Modified: January 31, 2016 @ 8:01 am
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक जज की मौत : The Caravan की सिहरा देने वाली वह स्‍टोरी जिस पर मीडिया चुप है..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: