/ओस्‍ताद, अरे वही तो है चंद्रकला। थोथा चना, बाजै घना..

ओस्‍ताद, अरे वही तो है चंद्रकला। थोथा चना, बाजै घना..

फर्क मां-बेटे के दरमियान का, और लटके-झटके माशा अल्‍लाह.. अरे आप ईमानदार हैं तो साबित कीजिए, नाटक-हंगामा काहे.. कमीशन बढ़ा लिया, साथ में सेल्‍फी लेने वाले की सेल्‍फी ले ली .. यूपी की ब्‍यूरोक्रेसी में अब खुल कर दिखने लगे हैं बकवादी अफसर..

-कुमार सौवीर॥
लखनऊ: हां तो मेहरबान, कदरदान, खानदान, पानदान, पीकदान, थूकदान, नाबदान। मेरी बात को सुनिये। फायदा आपको मिलेगा। हमको तो सिर्फ रूसवाई, बदनामी, कार्रवाई, जेल की धमकी और घर की महिलाओं को शातिर और पाले गये गुण्‍डों-शोहदों से छेड़खानी और सेल्‍फी खिंचवाने की चेतावनी मिलेगी।images (22)

हां, तो जमूरे। तैयार हो ?

तैयार हूं ओस्‍ताद।

तो फिर देख मेरी अदाएं, और खींच मेरी सेल्‍फी।

ओस्‍ताद। तुम तो बिलकुल्‍लै बी चंद्रकला होते जा रहे हो। बिलकुल बुलंदशहर की डीएम बी चंद्रकला की तरह। तुम्‍हारे नखरे और बदतमीजियां भी बुलन्‍द होते जा रहे हैं।

अबे, मैं मर्द हूं जमूरे। असली बदतमीज मर्द, जो अपनी बीवियों के पेट में पलती बेटियों का कत्‍ल करने पर आमादा होता है। वैसे यह चंद्रकला तो बाराबंकी की एक खास स्‍वादिष्‍ट मिठाई का नाम है बे जमूरे। लेकिन तू मुझे यह लहंगा-चोली काहे पहनाने पर आमादा है बे।

मिठाई। ओस्‍ताद। तुम आदमी हो या हौलट। लीद पर चांदी वाला वर्क ओढे हो। और हां, मुझे बाराबंकी की याद मत दिलाओ। यह नाम सुनते ही मुझे के-धनलक्ष्‍मी की याद आ जाती है और रूपहले सिक्‍कों की खनखनाहट सुनने लगती है। सुल्‍तानपुर-बागपत तक मशहूर है यह नाम।

लेकिन यह चंद्रकला पर काहे उखड़े जा रहे हो तुम जमूरे?

इसलिए कि चंद्रकला बिलकुल चंद्रमा की कलाओं की तरह है। सामने कुछ, पीछे कुछ और। एक बार उसने कहाकवि सूर्यकान्‍त त्रिपाठी निराला जी का कविता सुनी, तो फिर लगी कंकड़ लडाने।

कंकड़ी जमूरे?

मतलब पत्‍थर ओस्‍ताद। निराला ने एक महिला मजदूर पर लिखा था:- “वो तोड़ती पत्‍थर।“
बस फिर क्‍या था। चंद्रकला का दिमाग घूम गया। थीम को बेच डाला। लगी, पत्‍थर तोड़ने। पत्रकारों को बुलाया, एक बनती सड़क पर लगती सीमेंट की ईंटों हाथों से पकड़ कर आपस में लड़ाया। जातिवादी और धर्मवादी सरकारों में ऐसी ईंटें ही इस्‍तेमाल होती हैं। सो, टूट गयीं। बस क्‍या था। चंद्रकला ने एक पत्रकार के लिखे एक जोशीला बयान को रट कर वीडियो पर बोल दिया जिसे ने चैनल में जमकर बेचा। यह वीडियो वायरल हुआ। हजारों शेयरिंग, साढे चार लाख लाइकिंग। हंगामा। धमाचौक बधाइयों का सैलाब उमड़ पड़ा।

लेकिन यह तो अच्‍छा ही हुआ बेटा जमूरे।

अच्‍छा नहीं, बाबा जी का घण्‍टा। यही तो धंधा था। प्रशंसा की चादर के नीचे गड़बड़-झाला। हमारे एक कई सूत्रों बताया कि इसी में काला धंधा चौंचक-चमक गया। मीडिया के कैमरे और कलमें चंद्रकला के पीछे-पीछे दौड़ने लगीं। कहीं किसी बस की सीट गंदी मिली, तो किसी नाले में टोकरी भर कचरा मिला। कहीं किसी स्‍कूल की दीवार पर पेंसिल का निशान मिला, तो कहीं किसी सड़क पर पान की पीक। खबर दर खबर। चंद्रकला इतराती घूमती थीं, पीछे-पीछे पत्रकार चकरघिन्‍नी। धूम ही नहीं, धूम-2, धूम-3 से लेकर अगणित धूम की स्क्रिप्‍ट पर एक्‍शन-दर-एक्‍शन किया चंद्रकला ने।

लेकिन इसी बीच चंद्रकला ने अपनी अलग स्क्रिप्‍ट तैयार शुरू कर दी। हुआ यह कि इस अभिनेत्री की इस फिल्‍म को हिट कराया था पत्रकारों ने, लेकिन हिट होने के बाद यह अभिनेत्री अपने उन सहयोगी पत्रकारों को भूल गयी, जो उसे हिट कराये थे। ऐसे में तमाचा खाये पत्रकार भिन्‍नाय गये। नतीजा यह डीएम साहब की दूकान उजड़ने लगी। बदहवास डीएम साहब भागी-भागी पत्रकारों की झोंपड़ी पर अरदास लेने पहुंची। बोलीं:- “सरकार! आवौ ना। ” पत्रकारों ने टका सा जवाब दिया:-” हम नाय अइबै। ” पत्रकार सहम चुके थे। जान चुके थे कि चंद्रकला डीएम नहीं सैमसंग आई-पैड है। खैर, इस इनकार पर डीएम साहब बिगड़ गयीं। गुस्सा तो निकालना ही था ना, तो जब उस नयीं मूंछ वाले 18 साल के लौंडे ने चंद्रकला की सेल्‍फी ले ली, तो चंद्रकला ने उस लड़के की सेल्‍फी ले ली। भेज दिया उस लड़के को जेल। उसकी सात पुश्‍तों में से किसी ने भी जेल नहीं देखा था, लेकिन उस लौंडे ने पूरे खानदान का रिकार्ड तोड़ दिया।

फिर वही बात। गलत सेल्‍फी लेना तो गलत बात होती है जमूरे।

कौन सी गलत सेल्‍फी ओस्‍ताद। उसने बेडरूम में नहीं, भारी सभा में सेल्‍फी खींची तो इसमें क्‍या अपराध हुआ बताओ लेकिन चंद्रकला तो महिला है, उसके साथ सेल्‍फी लेना गलत है। कानून भी यही कहता है।

अबे जमूरे, छोड़ यह सब नौटंकी। खैंइच मोरि सेल्‍फी। तेरा तो ई-72 नोकिया है ना ?

चंद्रकला का तो आईफोन है ओस्‍ताद, उससे खिंचवा दूं क्या ? वह तो अन्‍दर की कहानी भी सुन-बक देता है। अरे उसकी बात करो ना जिसे चंद्रकला ने जेल भेज दिया। बेचारा वह तो इण्‍टर में पढ़ने वाला लौंडा था। जिन्दगी खराब कर दी उसकी। बेचारा। चंद्रकला की बहादुरी वाली बनायी-गढ़ाईं-सुनाई कई कहानियां वह अपने दोस्‍तों को सुनाया करता था। बे-इम्तिहा प्रशंसक था। बे-मोल। उस दिन उसे मौका मिल गया, तो उसे लगा तो उसके शौर्य की प्रतीक का फोटो खींच लिया जाए। सो, उसने खींच डाला। मगर जवाब में मिला दो-चार लप्‍पड़-तमाचे। फिर बुलायी गयी पुलिस। जिसने उसे आटा की तरह जमकर गूंथ दिया और जेल में ठूंस दिया।

ठीक किया। किसी महिला को सेल्‍फी में लेना गलत ही होता है जमूरे।

काहे की महिला ओस्‍ताद ? वह उसकी कोई गंदी फोटो तो खींच नहीं रहा था ? न ही बाथरूम या बेडरूम की फोटो बना रहा था। वह तो भरी भीड़-भरी मीटिंग में उसकी फोटो खींच रहा था। वहां सूचना विभाग के लोग थे। पूरी मीडिया भी अपने कैमरे और तामझाम के साथ मौजूद थी।

कुछ भी हो, एक महिला की सेल्‍फी लेना गलत है।

काहे गलत है। दोनों के बीच उम्र का फर्क देखो, फिर बात करना। मां-बेटे के उम्र का उम्र का फर्क है इन दोनों के बीच। बात करते हैं, हां नहीं तो

लेकिन है तो वह महिला है ही, है कि नहीं जमूरे ?

नहीं। डीएम महिला नहीं होती। वह शासकीय अधिकारी होती है ओस्‍ताद। वह स्‍त्री और पुरूष के झगड़े से बिलकुल अलग और ऊपर। चंद्रकला को कोई दिक्‍कत थी, तो समझाती, डांट देती। जेल भिजवाने का क्‍या औचित्‍य।

जमूरे, जरा ठण्‍डे दिमाग से सोचो। अगर सख्‍ती नहीं की तो प्रशासन कैसे चलेगा?

प्रशासन? कम्‍माल करते हो ओस्‍ताद। एक बिना दाढ़ी-मोंछ वाले स्‍कूली लौंडे-मोढे़ को जेल भेजने से प्रशासन चलता है। अरे प्रशासन करना ही था उसे तो जिस ठेकेदार और इंजीनियर को पकड़ती, एफआईआर दर्ज कर जेल भेजती जिसने बलुआ ईंट सड़क बनाने में लगायीं। उस पर क्‍या किया, कुछ नहीं। केवल बकवाद। बकर-बकर तो कोई भी कर सकता है। क्‍या बकरी और क्‍या सांड़-कुकूर। लेकिन जानवर और डीएम में फर्क होता है ओस्‍ताद। उसकी करनी में दम होना चाहिए। इतना ही गूदा था तो उस लूट की रिपोर्ट पुलिस में काहे नहीं दर्ज करायी? बात करती है

लेकिन जन-चर्चा तो यह है कि चंद्रकला बहुत ईमानदार अफसर है।

ईमानदार नहीं, बाबा जी का ठिल्‍लू। केवल चिल्‍ल-पों ही तो कर रही है । अच्‍छा एक बात बताओ ओस्‍ताद। वह तो हमीरपुर की डीएम भी रह चुकी है ना। पूरी दुनिया जानती है कि हमीरपुर खनन का सर्वोच्‍च अड्डा है, जहां अरबों-खरब के वारे-न्‍यारे होते हैं। हालत यह है कि आसपास के जिलों की सड़कें पनाह मांगती रहती हैं, इतनी ओवर-लोडेड ट्रक दौड़ते हैं। मंत्री गायत्री प्रजापति की निगाह हमीरपुर में ही होती है। पिछली बार जब अखिलेश यादव हमीरपुर गये थे, तो खनन को लेकर ही कमिश्‍नर तक सस्‍पेंड हो गये थे। लेकिन चंद्रकला पर शिकन तक नहीं आयी। ऐसा कैसा हो सकता है ओस्‍ताद?

ईमानदारी तो तब होती जब हमीरपुर में कम से कम खनन को लेकर ऐसी कोई ऐसी नजीर बनाती चंद्रकला, कि प्रशासन की कई पुश्तें याद रखतीं। तुम तो ओस्तााद हो ना, तो जाओ। देखो बहराइच में बरसों पहले डीएम रहे सैम्फिल जांग्याल को। जिले में आज भी उसके नाम का डंका बजता है। काम करने वाले काम करते हैं, नौटंकी नहीं करते ओस्ताद। मुंह में राम, बगल में छूरी नहीं करते। मैं एक नहीं पचासों आईएएस अफसरों को निजी तौर पर जानता हूं जो वाकई ईमानदार हैं, लेकिन ड्रामा कभी नहीं करते। डीएम देखना है ना, तो आओ। लखनऊ का राज शेखर, झांसी का अनुराग यादव, गोंडा का अजय उपाध्याय जैसे डीएम के नाम पर कोई कसम तक खा सकता है। रायबरेली में डीएन दुबे रहे हों या देवरिया में मणिप्रसाद मिश्र। कोई दाग रहा हो तो बोलो?

मगर…

अबे ओय ओस्ताद। अब चुप कर। सब को पता है कि बुलंदशहर में डीएम का कोटा पांच परसेंट का होता है। अब जो इतनी नौटंकी भी करे और वह पांच परसेंट का आठ परसेंट भी वसूले, तो वह कैसा ईमानदार?

और सुन बे ओस्ताद के बच्चे। यह पकड़ अपना झोला-झखड़। मुझे नहीं बनना तेरा जमूरा। आइंदा बोला तो वह कर्रा सेल्फी मारूंगा कि चेहरा चंद्रकला हो जाएगा।

(इसके साथ ही यवनिका के पतन की शुरूआत हो जाती है।)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.