/हम-दर्दों को दूर भगाओ, ग़म-दर्दों से राहत पाओ..

हम-दर्दों को दूर भगाओ, ग़म-दर्दों से राहत पाओ..

-अभिरंजन कुमार॥

भाimages (3)रत जैसे जटिल देश की राजनीति भी बेहद शातिराना तरीके से खेली जाती है। इस ग्लोबल देश में व्यूह रचनाएं अब इस तरह से होने लगी हैं कि बिहार चुनाव को प्रभावित करना हो, तो दादरी में एक घटना करा दो और उसे राष्ट्रीय ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बना दो। एक आदमी बलि का बकरा बनेगा, तो हज़ारों-लाखों नेताओं-कार्यकर्ताओं-पूंजीपतियों-ठेकेदारों की देवियां और अल्लाह ख़ुश हो जाएंगे। एक अख़लाक को बलि का बकरा बनाने से आपको मालूम ही है कि कितनों की देवियां और अल्लाह उनपर मेहरबान हो गए!

बिहार वाया दादरी के कामयाब एक्सपेरिमेंट से समस्त राजनीतिक दलों का दिल बाग-बाग हो उठा है। अब यूपी वाया हैदराबाद वाया जेएनयू वाया यहां वाया वहां की व्यूह-रचना की जा रही है, और दूरगामी लक्ष्य 2019 का लोकसभा चुनाव है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से अलग-अलग जातियों और संप्रदायों की गोलबंदी करने में जुटे हैं।

सत्तारूढ़ पार्टी को लगता है कि वह हिन्दुओं की गोलबंदी करके न सिर्फ़ यूपी में, बल्कि दोबारा केंद्र की सत्ता भी हासिल कर सकती है, लेकिन यह अत्यंत सरलीकृत राजनीतिक रणनीति है। यह तब कामयाब होती, जब भारतीय मानस सिर्फ़ सांप्रदायिक आधार पर विभाजित होता। सच्चाई यह है कि भारत जितना सांप्रदायिक आधार पर विभाजित नहीं है, उससे ज्यादा जातीय आधार पर विभाजित है। संप्रदाय दो-चार हैं और जातियां सैकड़ों-हज़ारों हैं। इसलिए विपक्ष की रणनीति मुसलमानों, दलितों और उन अन्य हिन्दू जातियों की गोलबंदी करने की है, जो अपने को शोषित-वंचित मानती रही हैं और जिनके मन में कथित सवर्णवादी ब्राह्रमणवादी मनुवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ गहरा आक्रोश है।

दोनों धड़े अपने-अपने हिसाब से जिस तरह की गोलबंदियां कराने का प्रयास कर रहे हैं, उसके लिए समाज में नफ़रत के बीज बोना अनिवार्य है। अगर आप मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत के बीज नहीं बोएंगे, तो हिन्दुओं की गोलबंदी नहीं होगी और हिन्दू गोलबंद नहीं होंगे, तो पहले धड़े का खेल खत्म हो जाएगा। इसी तरह, अगर आप कथित सवर्णवादी ब्राह्रमणवादी मनुवादी व्यवस्था का हौवा खड़ा नहीं करेंगे, तो हिन्दू जातियां मुसलमानों के साथ मिलकर वोट नहीं करेंगी और अगर वे मुसलमानों के साथ मिलकर वोट नहीं करेंगी, तो दूसरे धड़े का खेल खत्म हो जाएगा। इसीलिए दोनों धड़े अपना-अपना खेल बचाने के लिए नफ़रत का खेल खेल रहे हैं।

नफ़रत के इसी खेल के तहत आज हमारे सियासी बाज़ार में अजीबोगरीब थ्योरियां बिक रही हैंं। एक धड़ा आतंकवादी हमलों के हवाले से ऐसा इम्प्रेशन देने की कोशिश करता है कि अधिकांश मुस्लिम आतंकवादियों से सहानुभूति रखते हैं और उन्हें सचमुच में इस्लाम के लिए कुर्बानी देने वाले वीर जवान मानते हैं। इसी तरह दूसरा धड़ा यह इम्प्रेशन देने की कोशिश करता है कि इस देश में दलितों की “सांस्थानिक हत्या” और मुसलमानों की “न्यायिक हत्या” की जा रही है और “आरक्षण” उनके कई मर्ज़ो का एकमात्र इलाज है।

दोनों तरफ़ से झूठ का व्यापार हो रहा है और पब्लिक को भी सच नहीं चाहिए, क्योंकि मानव-मन में भरोसे और भाईचारे की तुलना में अविश्वास और दुश्मनी ज़्यादा टिकाऊ होती है। भरोसा और भाईचारा बनाने में सदियां बीत जाती हैं, जबकि अविश्वास और दुश्मनी को एक पल में क्रिएट किया जा सकता है। और एक बार जब मन में अविश्वास और दुश्मनी का भाव आ जाए, तो इसे भरोसे और भाईचारे की तरफ मोड़ना अगर असंभव नहीं, तो अति-कठिन तो है ही।

कवि अब्दुल रहीम खानखाना उर्फ़ रहीम कवि ने कहा भी है-
“रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।
टूटे पे फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय।”

इसी तरह महात्मा कबीर ने भी कहा है-
“मंदिर तोड़ो, मस्जिद तोड़ो, यह सब खेल मज़ा का है
पर किसी का दिल मत तोड़ो, यह तो वास ख़ुदा का है।”

आज ये सच्चाइयां सुनने और स्वीकार करने के लिए कोई तैयार नहीं है कि न तो हर मुस्लिम आतंकवादी है, न ही किसी दलित या मुसलमान की “सांस्थानिक” या “न्यायिक” हत्या की जा रही है। 125 करोड़ लोगों के देश में इक्का-दुक्का अपवादों को नियम की तरह पेश करने का पाप किया जा रहा है।

सच्चाई यह है कि रोहित वेमुला को किसी संस्थान ने नहीं मारा। या तो वह ख़ुद अपने नकारात्मक विचारों की मौत मरा या फिर उसे उसके इर्द-गिर्द के शातिर सियासतदानों ने अवसाद का मरीज़ बनाया। हो सकता है, उन्हीं में से किसी ने उसे आत्महत्या करके क्रांतिकारी बनने का नुस्खा भी सुझाया होगा। इसी तरह अफजल और याकूब को भी किसी न्यायालय ने नहीं मारा, वह गुमराही और हिंसा के रास्ते पर जाकर ख़ुद मरा। जिन्हें इन घटनाओं में दलित और मुसलमान एंगल ढूंढ़ना है, ढूंढ़ते रहें और भीतर-भीतर कुढ़कर अपनी सकारात्मक ऊर्जा को बर्बाद करते रहें।

अभी लोगों के दिमाग में दिन-रात इस हद तक नफ़रत भरी जा रही है कि लोग कबीर और रहीम की नसीहतों के ख़िलाफ़ खड़े होने पर आमादा हैं। वे अलग-अलग जातियों और संप्रदायों के बीच प्रेम के धागे तोड़कर उनमें एक स्थायी गांठ डालना चाहते हैं। वे लोगों के दिल तोड़कर और उनके दिलों से ख़ुदा को निकालकर वहां शैतान को बिठाना चाहते हैं। ध्रुवीकरण की गंदी राजनीति देश की बड़ी आबादी को नफ़रत और अवसाद का मरीज़ बनाने पर आमादा है। हमारे असली दुश्मन पाकिस्तान या दूसरे मुल्कों में बैठे लोग नहीं, बल्कि हमारे ख़ुद के बगल में बैठे हमारे हमदर्द हैं।

इसलिए एक नारा मैं भी देना चाहता हूं-
हम-दर्दों को दूर भगाओ।
ग़म-दर्दों से राहत पाओ।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.