Share this on WhatsApp
Subscribe to RSS
कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे [email protected] पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

हम-दर्दों को दूर भगाओ, ग़म-दर्दों से राहत पाओ..

-अभिरंजन कुमार॥

भा

images (3)

रत जैसे जटिल देश की राजनीति भी बेहद शातिराना तरीके से खेली जाती है। इस ग्लोबल देश में व्यूह रचनाएं अब इस तरह से होने लगी हैं कि बिहार चुनाव को प्रभावित करना हो, तो दादरी में एक घटना करा दो और उसे राष्ट्रीय ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बना दो। एक आदमी बलि का बकरा बनेगा, तो हज़ारों-लाखों नेताओं-कार्यकर्ताओं-पूंजीपतियों-ठेकेदारों की देवियां और अल्लाह ख़ुश हो जाएंगे। एक अख़लाक को बलि का बकरा बनाने से आपको मालूम ही है कि कितनों की देवियां और अल्लाह उनपर मेहरबान हो गए!

बिहार वाया दादरी के कामयाब एक्सपेरिमेंट से समस्त राजनीतिक दलों का दिल बाग-बाग हो उठा है। अब यूपी वाया हैदराबाद वाया जेएनयू वाया यहां वाया वहां की व्यूह-रचना की जा रही है, और दूरगामी लक्ष्य 2019 का लोकसभा चुनाव है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से अलग-अलग जातियों और संप्रदायों की गोलबंदी करने में जुटे हैं।

सत्तारूढ़ पार्टी को लगता है कि वह हिन्दुओं की गोलबंदी करके न सिर्फ़ यूपी में, बल्कि दोबारा केंद्र की सत्ता भी हासिल कर सकती है, लेकिन यह अत्यंत सरलीकृत राजनीतिक रणनीति है। यह तब कामयाब होती, जब भारतीय मानस सिर्फ़ सांप्रदायिक आधार पर विभाजित होता। सच्चाई यह है कि भारत जितना सांप्रदायिक आधार पर विभाजित नहीं है, उससे ज्यादा जातीय आधार पर विभाजित है। संप्रदाय दो-चार हैं और जातियां सैकड़ों-हज़ारों हैं। इसलिए विपक्ष की रणनीति मुसलमानों, दलितों और उन अन्य हिन्दू जातियों की गोलबंदी करने की है, जो अपने को शोषित-वंचित मानती रही हैं और जिनके मन में कथित सवर्णवादी ब्राह्रमणवादी मनुवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ गहरा आक्रोश है।

दोनों धड़े अपने-अपने हिसाब से जिस तरह की गोलबंदियां कराने का प्रयास कर रहे हैं, उसके लिए समाज में नफ़रत के बीज बोना अनिवार्य है। अगर आप मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत के बीज नहीं बोएंगे, तो हिन्दुओं की गोलबंदी नहीं होगी और हिन्दू गोलबंद नहीं होंगे, तो पहले धड़े का खेल खत्म हो जाएगा। इसी तरह, अगर आप कथित सवर्णवादी ब्राह्रमणवादी मनुवादी व्यवस्था का हौवा खड़ा नहीं करेंगे, तो हिन्दू जातियां मुसलमानों के साथ मिलकर वोट नहीं करेंगी और अगर वे मुसलमानों के साथ मिलकर वोट नहीं करेंगी, तो दूसरे धड़े का खेल खत्म हो जाएगा। इसीलिए दोनों धड़े अपना-अपना खेल बचाने के लिए नफ़रत का खेल खेल रहे हैं।

नफ़रत के इसी खेल के तहत आज हमारे सियासी बाज़ार में अजीबोगरीब थ्योरियां बिक रही हैंं। एक धड़ा आतंकवादी हमलों के हवाले से ऐसा इम्प्रेशन देने की कोशिश करता है कि अधिकांश मुस्लिम आतंकवादियों से सहानुभूति रखते हैं और उन्हें सचमुच में इस्लाम के लिए कुर्बानी देने वाले वीर जवान मानते हैं। इसी तरह दूसरा धड़ा यह इम्प्रेशन देने की कोशिश करता है कि इस देश में दलितों की “सांस्थानिक हत्या” और मुसलमानों की “न्यायिक हत्या” की जा रही है और “आरक्षण” उनके कई मर्ज़ो का एकमात्र इलाज है।

दोनों तरफ़ से झूठ का व्यापार हो रहा है और पब्लिक को भी सच नहीं चाहिए, क्योंकि मानव-मन में भरोसे और भाईचारे की तुलना में अविश्वास और दुश्मनी ज़्यादा टिकाऊ होती है। भरोसा और भाईचारा बनाने में सदियां बीत जाती हैं, जबकि अविश्वास और दुश्मनी को एक पल में क्रिएट किया जा सकता है। और एक बार जब मन में अविश्वास और दुश्मनी का भाव आ जाए, तो इसे भरोसे और भाईचारे की तरफ मोड़ना अगर असंभव नहीं, तो अति-कठिन तो है ही।

कवि अब्दुल रहीम खानखाना उर्फ़ रहीम कवि ने कहा भी है-
“रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।
टूटे पे फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय।”

इसी तरह महात्मा कबीर ने भी कहा है-
“मंदिर तोड़ो, मस्जिद तोड़ो, यह सब खेल मज़ा का है
पर किसी का दिल मत तोड़ो, यह तो वास ख़ुदा का है।”

आज ये सच्चाइयां सुनने और स्वीकार करने के लिए कोई तैयार नहीं है कि न तो हर मुस्लिम आतंकवादी है, न ही किसी दलित या मुसलमान की “सांस्थानिक” या “न्यायिक” हत्या की जा रही है। 125 करोड़ लोगों के देश में इक्का-दुक्का अपवादों को नियम की तरह पेश करने का पाप किया जा रहा है।

सच्चाई यह है कि रोहित वेमुला को किसी संस्थान ने नहीं मारा। या तो वह ख़ुद अपने नकारात्मक विचारों की मौत मरा या फिर उसे उसके इर्द-गिर्द के शातिर सियासतदानों ने अवसाद का मरीज़ बनाया। हो सकता है, उन्हीं में से किसी ने उसे आत्महत्या करके क्रांतिकारी बनने का नुस्खा भी सुझाया होगा। इसी तरह अफजल और याकूब को भी किसी न्यायालय ने नहीं मारा, वह गुमराही और हिंसा के रास्ते पर जाकर ख़ुद मरा। जिन्हें इन घटनाओं में दलित और मुसलमान एंगल ढूंढ़ना है, ढूंढ़ते रहें और भीतर-भीतर कुढ़कर अपनी सकारात्मक ऊर्जा को बर्बाद करते रहें।

अभी लोगों के दिमाग में दिन-रात इस हद तक नफ़रत भरी जा रही है कि लोग कबीर और रहीम की नसीहतों के ख़िलाफ़ खड़े होने पर आमादा हैं। वे अलग-अलग जातियों और संप्रदायों के बीच प्रेम के धागे तोड़कर उनमें एक स्थायी गांठ डालना चाहते हैं। वे लोगों के दिल तोड़कर और उनके दिलों से ख़ुदा को निकालकर वहां शैतान को बिठाना चाहते हैं। ध्रुवीकरण की गंदी राजनीति देश की बड़ी आबादी को नफ़रत और अवसाद का मरीज़ बनाने पर आमादा है। हमारे असली दुश्मन पाकिस्तान या दूसरे मुल्कों में बैठे लोग नहीं, बल्कि हमारे ख़ुद के बगल में बैठे हमारे हमदर्द हैं।

इसलिए एक नारा मैं भी देना चाहता हूं-
हम-दर्दों को दूर भगाओ।
ग़म-दर्दों से राहत पाओ।

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे [email protected] पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

1 comment

#1Mahendra GuptaFebruary 14, 2016, 12:26 PM

कमीनेपन की सभी हदें पार कर ली हैं हमारे नेताओं ने ,

Add your comment

Nickname:
E-mail:
Website:
Comment:

Other articlesgo to homepage

डाॅ. राममनोहर लोहिया एक अनूठे फक्कड़ नेता..

डाॅ. राममनोहर लोहिया एक अनूठे फक्कड़ नेता..(0)

Share this on WhatsApp-मनमोहन शर्मा॥ 1958 की बात है। मैं इरविन अस्पताल के बस स्टैंड पर खड़ा बस का इंतजार कर रहा था कि मुझे सड़क पर खरामा-खरामा चलते हुए समाजवादी नेता डाॅ. राममनोहर लोहिया नजर आए। मई का महीना था और दिल्ली की कड़ाकेदार गर्मी जोरों पर थी। गर्मी के कारण मैं पसीना-पसीना हो

क्यों राहुल-अखिलेश को यह साथ पसन्द है..

क्यों राहुल-अखिलेश को यह साथ पसन्द है..(1)

Share this on WhatsApp-क़मर वहीद नक़वी॥ लखनऊ में रविवार को राहुल-अखिलेश के साझा रोड शो के कुछ राजनीतिक सन्देश बड़े स्पष्ट हैं. एक, यह महज़ उत्तर प्रदेश का चुनावी गठबन्धन नहीं है, बल्कि 2019 का विपक्षी राजनीति का रोडमैप है. यानी गठबन्धन को लम्बा चलना है. दो, दाँव पर सिर्फ़ एक चुनाव की हार-जीत नहीं

क्या राजस्थान के नेताओं ने पंजाब में कांग्रेस का माहौल मजबूत बना दिया

क्या राजस्थान के नेताओं ने पंजाब में कांग्रेस का माहौल मजबूत बना दिया(0)

Share this on WhatsApp-विशेष संवाददाता॥ चंडीगढ़। देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो हैं, उनमें से पंजाब में कांग्रेस की स्थिति सबसे मजबूत है। कांग्रेस के इस मजबूत माहौल के लिए जिन लोगों ने पंजाब में बहुत मेहनत की है, उनमें निश्चित रूप से पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह सबसे आगे हैं। लेकिन

28 को भारत बंद की घोषणा किसी ने की ही नहीं थी..

28 को भारत बंद की घोषणा किसी ने की ही नहीं थी..(2)

Share this on WhatsApp-जीतेन्द्र कुमार|| आपको यह पढ़कर ताज्जुब होगा। लेकिन आपके घर में अख़बार आता है, पिछले दस दिन का अख़बार देख लें। विपक्ष के किसी नेता का भारत बंद का आह्वान देखने को नहीं मिलेगा। भारत बंद कोई करेगा तो इस तरह चोरी-छिपे नहीं करेगा। इस उदाहरण से यह पता चलता है कि

संघ क्यों रहे नरेंद्र मोदी का गिरवी..

संघ क्यों रहे नरेंद्र मोदी का गिरवी..(0)

Share this on WhatsApp-हरि शंकर व्यास॥ आरएसएस उर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेंद्र मोदी को बनाया है न कि नरेंद्र मोदी ने संघ को! इसलिए यह चिंता फिजूल है कि नरेंद्र मोदी यदि फेल होते है तो संघ बदनाम होगा व आरएसएस की लुटिया डुबेगी। तब भला क्यों नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की मूर्खताओं

read more

मीडिया दरबार एंड्राइड एप्प

मीडिया दरबार की एंड्राइड एप्प अपने एंड्राइड फ़ोन पर इंस्टाल करें.. Click Here To Install On Your Phone

Contacts and information

मीडिया दरबार - जहाँ लगता है दरबार. आप ही राजा हैं इस दरबार के और कटघरे में है मीडिया. हम तो मात्र एक मंच हैं और मीडिया पर अपनी निगाह जमायें हैं, जहाँ भी मीडिया में कुछ गलत होता दिखाई देता है उसे हम आपके सामने रख देते हैं और चलाते हैं मुकद्दमा. जिसपर सुनवाई करते हैं आप, जहाँ न्याय करते हैं आप. जी हाँ, यह एक अलग किस्म का दरबार है. मीडिया दरबार...

Social networks

Most popular categories

© 2014 All rights reserved.
%d bloggers like this: