/यकीन मानो कि तुम पत्रकार नहीं, घुटे दलाल हो..

यकीन मानो कि तुम पत्रकार नहीं, घुटे दलाल हो..

तुमने अपना जमीर बेच दिया, अब दांव पर लगा दी पत्रकारिता..
जितने भी कुकृत्य हैं, सार्वजनिक हो चुके हैं तुम्हारे चेहरे पर..
तुमसे लाख बेहतर हैं गांव-कस्बे के पत्रकार, तुम तो निकृष्ट हो..

-कुमार सौवीर॥
लखनऊ: अब तो पत्रकारिता के अलम्बरदारों और नेताओं की शक्ल से भी नफरत होती जा रही है। किसी टुच्चे दलाल की तरह ताना-बाना अख्तियार कर लिया है इन पत्रकार नेताओं ने। सड़कछाप कुत्तों की तरह बीच सड़क जितनी कुकुर-झौंझौं पत्रकार नेता की शक्ल में तुम लोगों ने कर डाली है, उतना तो कोई पत्रकार कर ही नहीं सकता।
अब तुमने पत्रकारों की पीडा को लेकर आंदोलन का ऐलान किया है। अच्छी बात है। पिछले काफी लम्बे समय से पत्रकारों पर हमले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। आम पत्रकारों के बीच इस बारे में खासी खुसफुसाहट और बेचैनी है। तुम खुद को पत्रकारों का नेता मानते हो, तो तुम्हें यह करना ही चाहिए था।Screenshot-2015-09-28-10.02.42
लेकिन जरा अपने गिरहबान में झांक लो। क्या वाकई पत्रकारों की बिरादरी की तुम्हारी इन जमूरा-नुमा कवायदों-उछलकूदों को पसंद करती है। हर्गिज नहीं। तुमने पत्रकारों के अंतर्मन में उनकी भावनाओं को झांकने की कोशिश ही नहीं की? अगर किया होता तो आज यह नहीं होता, बल्कि आम पत्रकारों के प्रतिनिधि होते, पत्रकारों के निरंकुश तानाशाह नहीं।
जरा पूछ तो लो कि क्या सोचते हैं तुम्हारे साथीगण, तुम्हा्री इन करतूतों पर। सिर्फ और सिर्फ दल्लागिरी। सब जानते हैं कि जब किसी घटना में तुम्हे किसी बड़े नेता या बड़े अफसर की पूंछ फंसी दिखती है, तो तुम उनको तेल लगाने के लिए पूरा मामला ही पलट कर देते हो। शाहजहांपुर का जागेंन्द्र सिंह हत्याकाण्ड अभी भी पत्रकारों के जेहन अब तक ताजा है। जब राम सिंह मंत्री को बचाने के लिए तुमने पूरा खेल बदलने की साजिश कर दी। अपने दो कौड़ी के पोर्टल तहलका डॉट कॉम में तुमने जागेंद्र को पत्रकार मानने से इनकार कर दिया। तब के अपने अजीज टुच्चे डीजीपी अरविंद जैन के बयान छाप-छाप कर तुम सत्ता के तलवे चाटते रहे। राम सिंह वर्मा को क्लीन चिट दे दी तुमने अपने पोर्टल में। उस हत्याकाण्ड में प्रशासन की खाल खींचने के बजाय तुमने वहां की जिलाधिकारी शुभ्रा सक्सेना से मिल कर डील करने का चक्कर चला दिया। बुलन्दशहर की डीएम बी चंद्रकला के इशारे पर जब दैनिक जागरण के दफ्तर पर कूड़ा-कचरा फेंका गया और जब उस पर हंगामा हुआ, तो पत्रकारों की संरक्षा के बजाय तुमने चंद्रकला की आवाज बदलने की कोशिश की कि तुम बहुत नैतिक और ईमानदार हो।
लेकिन तुम्हारी यही नैतिकता और ईमानदारी तब कहां चली जाती है जब तुम देर रात शराब में धुत्त होकर आम आदमी को पीटते हो, हंगामा करते हो। और जब तुम्हारी ऐसी कुत्सित हरकतों से त्रस्त नागरिक तुम्हें सरेआम पीट देता है तो तुम उस पर पत्रकार-उत्पीड़न का हल्ला मचाना शुरू कर देते हो। वह कहां चली जाती है तुम्हारी नैतिकता, जब पयूर्षण के वक्त़ रायपुर की जैनी धर्मशाला में तुम मुर्गा-बकरा की हड्डियां बिखेरते हो और तुम पर वह धर्मशाला वाला 50 हजार रूपया का जुर्माना ठोंक देता है। तुम पत्रकारों को सुरक्षा नहीं, बल्कि दलाल-ठोंगी और पाखंडी लोगों को बाकायदा पत्रकार बनाने की फैक्ट्री के तौर पर शक्ल लेते जा रहे हो। दरअसल तुम बेशर्म हो और बेहद डरपोक भी, जो इतिहास में पहली बार अपनी सुरक्षा के लिए एक सरकारी गनर लिए नुमाइश करते दिख रहे हो। डरपोक कहीं के
पांच साल पहले एक वरिष्‍ठ पत्रकार रवि वर्मा और एक फोटोग्राफर की गम्‍भीर बीमारी के बाद मौत हो गयी थी। मैंने उनके परिजनों को आर्थिक सहायता के लिए मुख्‍यमंत्री के लिए एक ज्ञापन तैयार किया, जिस पर 187 पत्रकारों ने हस्‍ताक्षर किया। लेकिन तुमने उस ज्ञापन को मुझसे ले लिया कि उस पर तुम कार्रवाई करोगे और सूचना सचिव और मुख्‍यमंत्री से समय लेकर सीधे सहायता दिलाओगे। लेकिन तुमने दिल्‍ली में सरकारी गेस्‍ट हाउस में शराब की झोंक में कुबूल लिया कि वह ज्ञापन तुमने फाड़ दिया था। तुमने यह भी बताया था कि यह हिसाम सिद्दीकी बहुत कमीना मुसलमान है, और चूंकि तुम खुद चुनाव लड़ने की तैयारी में थे, इसलिए तुम चाहते थे कि इस मसले को उसके बाद सरकार के सामने रखा जाए। लेकिन चुनाव जीतने के बावजूद तुमने इस काम को आगे बढाने के बजाय, उस ज्ञापन को ही फाड़ दिया।
सहारा के पत्रकार भुखमरी की हालत में हैं, तुम खामोश हो।
वहां सैकड़ों की तादात में पत्रकार बेरोजगार हो गये, परिवार तबाह हो गये, तुम खामोश हो।
जागेंद्र सिंह की जघन्य हत्या में खुलेआम मंत्री और कोतवाल की संलिप्तता दिखी, लेकिन तुमने उसे बेच डाला। जब मैंने शाहजहाँपुर पहुँच कर हादसे की असलियत दुनिया को दिखानी शुरू की तो तुमने मुझ पर बेहूदे और अश्लील आरोपों की झड़ी लगा दी। मेरे खिलाफ गुंडों-शोहदों की टोली भेज दी।
बलरामपुर में एक पत्रकार को एक मंत्री के बेटे ने पीट कर लहूलुआन कर दिया। मगर तुम उस मंत्री और सरकार के चरण-चांपन करते रहे।
कानपुर में पत्रकार को गोली मार दी गयी, तुम बाथरूम में माउथ-ऑर्गन बजाते रहे।
सुल्ताानपुर में करूणा मिश्र की हत्या हो चुकी है, तुम दूर बैठ कर सियार-रूदन कर रहे हो।
जौनपुर का मंत्री ललई यादव तुम्‍हारे जिले और इलाके का है, तुम उस पर इसलिए खामोश रहे कि तुम्हारी एक हरकत पर वह तुम्हा‍री चमड़ी तक खींच सकता है। ऐसे में तुम क्या नेतागिरी करोगे, यह तो बताओ? हर शाम टुन्न होकर गाड़ी लड़ाते हो, पिटते हो, प्रेस क्‍लब को जआघर में तब्‍दील कर दिया है तुमने, अपनी करतूतों से पत्रकारिता का दामन काला करते हो, वाकई बेशर्म हो तुम।
और आज जब तुम थके, तो एक नेता ने तुम्हारे खिलाफ बागडोर सम्भाल ली। बोले:- चलो, गांधी प्रतिमा के नीचे पत्रकार उत्पीड़न करने वालों की खैर-खबर ली जाएगी।
क्याी खाक करोगे तुम। बलरामपुर काण्ड पर तुमने क्या किया, बताओ। हमें बताओ कि जौनपुर में एक मंत्री ने सोंधी ब्लाक चुनाव में घंटों हंगामा किया, पत्रकारों को बुरी तरह पीटा लेकिन तुम खामोश रहे। क्यों ?
किसी एक बेईमान और निर्लज्ज से सिर्फ उसकी गद्दी झटक लेना ही पर्याप्तं नहीं होता है। और अगर कुर्सी झटकना ही मकसद है, तो फिर इसमें पत्रकारों की नाम मत लिया करो।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.