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देशभक्ति का नंगा नाच..

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-कृष्णकांत॥

देश अपनी भक्ति को लेकर इतना शर्मिंदा कभी नहीं था. मुसीबतें थीं, अपार थीं, हम ​सब मिलकर लड़ते रहे, संघर्ष करते रहे और आगे बढ़ते रहे. अब हम पीछे लौटने लगे हैं. जो चीजें अब तक गैरलोकतांत्रिक मानी जा चुकी हैं, उन्हें अब लोकतंत्र का लबादा ओढ़ाया जा रहा है.bjp-leader-op-sharma-at-patiala-court
नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद शुरू हुआ राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रद्रोह, धर्म और धर्मद्रोह का खेल जेएनयू के बहाने चरम पर पहुंच गया. जेएनयू प्रकरण पर सत्ता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का खौफनाक गठबंधन सामने आया जो अब हर उस चीज को राष्ट्रविरोधी घोषित करने पर तुला है जो उससे असहमत है. कुछ बानगी देखें:
हिंदुत्व बचाने की पूरी जिम्मेदारी अपने नाजुक कंधों पर संभाल रहीं विहिप नेता साध्वी प्राची ने कहा, ‘जेएनयू को हाफिद सईद ने फंडिंग की है और उसी के सहयोग से यूनिवर्सिटी में सम्मेलन हुआ है. राहुल गांधी राष्ट्रवाद की परिभाषा बताएं, देश उनसे जानना चाहता है. डी. राजा आतंकी गतिविधियों में शामिल है, उसे भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए.’
भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने कहा, ‘राष्ट्र का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और जेएनयू के ‘देशद्रोह’ के आरोपियों के खिलाफ आजीवन कारवास की जगह फांसी मिलनी चाहिए या गोली मार देनी चाहिए.’
मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा, ‘क्या पाकिस्तान जिंदाबाद करने वाले देशद्रोहियों की जबान नहीं काट देनी चाहिए?’
​हरियाणा हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के पूर्व ओएसडी जवाहर यादव ने कहा, ‘जेएनयू में जो महिलाएं राष्‍ट्रविरोधी नारे लगा रही थीं, उनके लिए मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि आप लोगों से तो वेश्‍या भी बेहतर हैं, जो अपना शरीर बेचती हैं, लेकिन देश नहीं।’
सीपीआई कार्यकर्ता की पिटाई करने वाले विधायक ओपी शर्मा ने कहा, ‘अगर बंदूक होती तो मैं गोली भी मार देता.’
यह सारे बयान किन्हीं अनपढ़ उचक्कों के नहीं हैं. ये सारे लोग चुनकर आए हैं और विभिन्न सदनों की शोभा बढ़ा रहे हैं. शायद ये अच्छे दिनों के परिणाम हैं जिनका आपसे वादा किया गया था.
जेएनयू में आपत्तिजनक नारेबाजी की खबर सही थी या गलत, नहीं मालूम. लेकिन राष्ट्रभक्ति का उन्माद फैलाने के मकसद से जीन्यूज ने एक फर्जी वीडियो चलाया था. उस आधार पर अनर्ब गोस्वामी और दीपक चौरसिया भी राष्ट्रभक्त साबित होने की दौड़ में शामिल हो गए और चीखने लगे. वे जेएनयू वालों से प्रमाण पत्र मांगने लगे. गृह मंत्रालय अपनी पूरी मशीनरी के साथ इस खेल में शामिल हो गया. जब आरोप साबित नहीं हो सके तो सबने पल्टी मार ली. संघ, बजरंग दल या एबीवीपी का एक उच्छृंखल आदमी और केंद्रीय गृह मंत्रालय एक कतार में पाए गए.
कन्हैया या दूसरा कोई छात्र दोषी तो साबित नहीं हुआ, लेकिन समाज में पर्याप्त जहर घुल चुका है. उन्माद में आए लोग अपने विरोधी से देशभक्ति का प्रमाण पत्र मांग रहे हैं. जेएनयू के आसपास के लोग अपने घरों से जेएनयू को छात्रों को निकाल रहे हैं. अब जेएनयू के छात्र ​मात्र किरायेदार छात्र नहीं हैं. अब वे पाकिस्तान के एजेंट से कम नहीं हैं.
दूसरी ओर एबीवीपी देश भर के विश्वविद्यालयों में देशभक्ति की डिटेक्टर मशीन लगाकर तैनात हो गई है. एबीवीपी के आरोपों को आधार बनाकर बीएचयू से संदीप पांडेय को नक्सली और देशद्रोही कहकर निकाल दिया गया. बीएचयू के वीसी गिरीश त्रिपाठी संघ के प्रचारक हैं.
बीएचयू में ही एक परिचर्चा में शामिल होने गए कवि व चिंतक बद्रीनारायण के साथ एबीवीपी के लोगों ने अभद्रता की.
इलाहाबाद विवि में एबीवीपी ने वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन को परिसर में घुसने न​हीं दिया. उन्हें छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह लोकतंत्र और फ्रीडम आॅफ स्पीच ​विषय पर परिचर्चा के लिए बुलाया था.
21 फरवरी को ग्वालियर में दलित मुद्दे पर एक सेमिनार में शामिल होने गए प्रो. विवेक कुमार के कार्यक्रम में एबीवीपी ने पथराव किया. माहौल तनावपूर्ण है.
रोहित वेमुला प्रकरण में एबीवीपी से लेकर केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और स्मृति ईरानी की भूमिका रही.
क्या यह सब देशभक्ति के नाम पर हो रहा है? किसी को भी गोली मार देने की धमकी देना, कोर्ट में विधायक का कानून हाथ में लेना, चिंतकों के साथ अभद्रता, मारपीट करना यह सब कौन सी देशभक्ति है? हत्या करने, जबान काट लेने, गोली मार देने की बात करना क्या देशभक्ति है? अपने 70वें साल में प्रवेश करने से पहले यह लोकतंत्र अचानक इतना डरावना किसने बना दिया? आपसे तो कहा गया था कि अच्छे दिन आएंगे?

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. a.s.sharirakh on

    कसम से आपकी मासुमियत पर ग्लानी महसूस हो रही हैं.इतना तो झूठ मत बोलो.जी टीवी ने जो वीडियो दिखाया वो बिलकुल सच्चा साबित हुआ.हमारे टैक्स का पैसा चरकर देश का ही बेडा गर्क करने पर तुले हैं.देश की बात करने वाले बेइमान है और विरोध करने वाले और भी गये गुजरे.अरे जनता इतनी मूर्ख नहीं हैं.शरम करो पत्रकारिता के नाम पर अन्याय मत करो.

  2. jo log asurkshit nahsus kar rahe he vo apne giranban me jhankkar dekhe ki konsa chor chupa he. ab bharat desh ki takdir suvarn aakshro me likhi ja rahi he aur jinhe dar he apne papo ke khul jane ka vahi sarkar ko doshi man rahe he. NAMO

  3. देश का माहौल ख़राब कर दिया है बी जे पी और उसके मात्र संस्था ने लोग अब दूसरी इमरजेंसी जैसा मह शुश कर रहे है

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