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आर्ट ऑफ लिविंग की भेंट चढ़े 200 किसान परिवार, पीएम से लेकर सीएम सब खामोश..

लम्बे समय तक हरियाणा के भाजपा प्रमुख और हरियाणा की वर्तमान भाजपा सरकार के मंत्री अभिमन्यु के अख़बार के अनुसार श्री श्री रविशंकर ने दिल्ली 200 किसानों की फसल बर्बाद कर दी है.. यही नहीं उन्हें इतना मुआवजा भी नहीं दिया गया जो फसल के बीज पर खर्च हुआ..

नई दिल्ली. ये इलाका महाराष्ट्र के विदर्भ या बीड जिले का नहीं जहां हर साल न जाने कितने किसान आत्महत्या कर लेते हैं, बल्कि ये देश की राजधानी दिल्ली का ही एक हिस्सा है। मेल टुडे की एक खबर के मुताबिक श्री श्री रविशंकर के ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए जिस यमुना स्थित ज़मीन से किसानों को खदेड़ा जा रहा है, उनका आरोप है कि इतने रुपयों में तो उनकी बुआई लागत की भरपाई कर पाना भी मुश्किल है।

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देश में ये किस तरह की गुंडागर्दी है। जहां किसाना का जबरन इस तरह से शोषण किया जा रहा है कि या तो वे खुदकुशी कर लें या फिर अपने घुटने टेक दे। यहीं के एक गरीब किसान पान सिंह ने अंग्रेजी अखबार मेल टुडे से बात कर किसानों के दुख की कहानी सुनाई।
उन्होंने बताया कि आर्ट ऑफ लिविंग के लिए किसानों से तीन दिन के लिए ये जमीन छीन ली गई है। इसकी तैयारी से पहले ही किसानों की उपजाऊ जमीन को पूरी तरह तहस नहस कर दिया गया है। इसके बदले जितनी राशि हमें संस्था की ओर से दी जा रही है वो हमारे मेहनताना और लागत से काफी कम है।
सिंह ने बताया कि उनकी करीब 9 बीघा ज़मीन आर्ट ऑफ लिविंग ने कब्जाई है, और इसके बदले उन्हें मात्र 26 हजार रुपये मिले हैं। जबकि इस अपनी फसल पर करीब 2.25 लाख रुपये का भारी खर्च आया था। ‘मेरी पूरी मेहनत और पैसे पर पानी फेर दिया गया है। भगवान जाने अब मैं इस मुसीबत से कैसे निपटुंगा।’
इस घिनौने कृत्य से पान सिंह की तरह ही यहां करीब 200 किसान परिवार प्रभावित हुए हैं।
इतना ही नहीं दिल्ली में यमुना के पश्चिमी हिस्से की करीब 100 एकड़ जमीन पर उग रही गेंहूं, सब्जियों और फलों की फसल को बुल्डोज़र से उजाड़ दिया गया है। इनमेंचिल्ला, नंगली सराय काले खां, डीएनडी व नोएडा के बगल में दिल्ली की डीडीए की प्रॉपर्टी का एक बड़ा हिस्सा शामिल है।
इस बारे में आर्ट ऑफ लिविंग एक शिक्षक विनय सुखिजा से भी मेल टुडे ने बात की। उन्होंने बताया कि किसानों की जुती हुई फसल के एक इंच हिस्से को भी नहीं नुकसान नहीं पहुंचाया गया है। इसके लिए सिर्फ खाली पड़ी जमीन का ही इस्तेमाल किया गया है। हमने इन किसानों को 4 हजार प्रति बीघा के हिसाब से रुपये दिए हैं, इसके बावजूद हमें किसानों का झगड़ा फसाद झेलना पड़ रहा है। जबकि डीडीए के सीनियर अधिकारी ने बताया कि हमने एओएल को सिर्फ 60 एकड़ जमीन के लिए अनुमति दी थी, जबकि उन्होंने किसानों के खेतों समेत 150-200 एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया है।
यहीं के एक किसान धर्म सिंह बताते हैं कि एक सप्ताह पहले एओएल के चार अधिकारियों ने उनसे किसानों की जमीन पर एक सांस्कृति कार्यक्रम करने की सलाह मांगी थी। मैंने उनसे बिना पैसे लिए अपनी खाली पड़ी जमीन का इस्तेमाल करने का वादा कर लिया। दो दिन बाद वे लोग एक बुल्डोज़र के साथ आए और हमारे हरे-भरे खतों में बुल्डोज़र फेर दिया। खेत में ककड़ी, तोरई, खीरा, बैंगन, गोभी प्याजा आदि की फसल थी। मेंरे विरोध करने पर उन्होंने मुझे पुलिस कार्रवाई करने की धमकी दी और बदले में मात्र 14 हजार रुपये थमा दिए। ये राशि मेरी पूरी फसल के लिए काफी नहीं है। मेरी पूरी फसल में केवल गोबी के बीजों की लागत ही 26 हजार रुपये की थी।

(haribhoomi)

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3 comments

#1Heera PrasadJune 17, 2016, 7:06 AM

क्या आप बिहार के खबरें नहीं छापते हैं ।

#2mahendra guptaMarch 12, 2016, 3:43 PM

समर्थ को नहीं दोष गुसाईं

#3Sandeep SinghMarch 12, 2016, 9:25 AM

निंदनीय

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