/नायक नहीं आंदोलन महत्वपूर्ण है..

नायक नहीं आंदोलन महत्वपूर्ण है..

मसीहा की तलाश में पागल हमारा समाज केजरीवाल से कन्हैया तक के कंधों पर अपनी उम्मीदों का बोझ डालने को बेकरार है. लेकिन इतिहास बताता है कि समाज जनता बदलती है. आंदोलन नेता पैदा करते हैं, नेता आंदोलन नहीं..

-अशोक कुमार पांडेय॥

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बाहर और भीतर पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह एक राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना और चैनलों से लेकर अखबारों और सोशल मीडिया के साथ-साथ इंटरनेट पर उपलब्ध ई-पत्रिकाओं में भी उसकी भरपूर धमक रही. अंतरिम जमानत पर रिहाई के बाद जेएनयू के छात्रों के बीच दिया कन्हैया का भाषण अनेक चैनलों ने लाइव चलाया और बताते हैं कि इंटरनेट पर इसे 30 लाख से अधिक लोग देख चुके हैं. इसके बाद जो प्रतिक्रियाएं आईं उनमें उसे चे ग्वेरा से लेकर लेनिन तक कहा गया, प्रशंसा के पुल बांध दिए गए और एक आम मत था कि भारत को अपना नया नेता मिल गया है. इसी के बरअक्स उसे विलेन बनाने वालों की भी कोई कमी नहीं है. ऐसा लगता है कि कन्हैया को लेकर देश का जनमत दो हिस्सों में बंट गया है.images (11)

अगर देखें तो उसका भाषण महान नहीं था. बौद्धिक सेमिनारों और आयोजनों में जाने वाले जानते हैं कि उसमें कोई नई और मौलिक बात नहीं थी. कुछ तथ्यात्मक भूलें भी थीं. वैसे भी संघर्षों में तपे वामपंथी छात्र नेता पूरे कमिटमेंट के साथ बोलते हुए अच्छा भाषण देते ही हैं. लेकिन वह भाषण निश्चित तौर पर ऐतिहासिक था. सोचिए जरा जेल और इतने दमन के बाद अगर उसके भाषण में डर का कोई कतरा होता? प्रतिहिंसा का कोई कतरा होता? कोई अभद्र टिप्पणी होती? कोई हल्की बात होती? तो यह पूरा छात्र आंदोलन कमजोर पड़ जाता. वह किसी डिबेट में नहीं था, जेल से आने के कुछ घंटों के भीतर उस छात्र समूह के सामने था जो उसके साथ रहा तो उस मीडिया और जनता के सामने भी जिसका एक बड़ा हिस्सा उसको खत्म कर देने के लिए मुतमइन था. इसलिए वह देस-काल महत्वपूर्ण बन गया. उसे इतिहास ने एक मौका, एक जिम्मेदारी दी, जिसे उसने  बखूबी निभाया. इस अवसर पर जिस कमिटमेंट और विट के साथ उसने दक्षिणपंथी राजनीति पर हमला किया और आंबेडकरवादी तथा वामपंथी छात्र राजनीति को एक मंच पर आने का आह्वान किया वह संघर्ष की उस लंबी परियोजना की ओर इंगित करने वाला था, जिसके बिना फासीवाद के खिलाफ कोई लंबी लड़ाई भारत में नहीं लड़ी जा सकती.

देश भर के तमाम इंसाफपसंद लोग जो सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं.. ये सब हीरो हैं. सब इसमें बराबरी के हिस्सेदार हैं.

और यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. देश में एक के बाद एक छात्र आंदोलनों की कड़ियां जुड़ती जा रही हैं. शुरुआत एफटीआईआई के आंदोलन से हुई जब एक औसत से भी निचले स्तर के कलाकार गजेंद्र चौहान को सिर्फ इस आधार पर इस प्रतिष्ठित संस्था की कमान सौंप दी गई कि वे सत्ताधारी पार्टी से जुड़े हुए हैं. वह आंदोलन कैंपस से बाहर निकला और जेएनयू ही नहीं अनेक विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्रों, फिल्म से जुड़े गंभीर लोगों और बुद्धिजीवी समाज ने उसे पूरा समर्थन दिया. उसके बाद केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय विश्वविद्यालयों की शोध फेलोशिप बंद किए जाने के खिलाफ एक ऐतिहासिक आंदोलन हुआ जिसमें छात्रों ने यूजीसी कार्यालय के सामने 88 दिनों तक लगातार धरना दिया. इसमें जेएनयू ही नहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय सहित तमाम जगहों के छात्र शामिल थे और उनके समर्थन में देश भर में धरना प्रदर्शन हुए. अंततः सरकार को फेलोशिप तो देनी पड़ी लेकिन इसे बढ़ाने की उनकी मांग ठुकरा दी गई. हैदराबाद के आंबेडकरवादी छात्र संगठन के कार्यकर्ता रोहित वेमुला के केंद्रीय मंत्रियों के दबाव में छात्रावास से निष्कासन के बाद आत्महत्या जैसा कदम उठाने के बाद तो आत्महत्या के  लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने की मांग के साथ देश के भीतर ही नहीं बाहर भी आंबेडकरवादी, वामपंथी और प्रगतिशील विचारधारा के लोगों ने जबरदस्त प्रतिरोध दर्ज कराया. हर बार की तरह इस बार भी जेएनयू इस प्रतिरोध में अपनी पूरी ताकत के साथ खड़ा था.

इलाहाबाद में छात्रों ने अपनी अध्यक्ष ऋचा सिंह के नेतृत्व में विषैले बयानों के लिए चर्चित सांसद आदित्यनाथ को प्रवेश करने से रोका तो उनके खिलाफ जो कुचक्र रचे जा रहे हैं वे आज तक जारी हैं. केंद्र में नई सरकार आने के बाद जिस तरह कैंपसों में हिंदुत्व का वैचारिक एजेंडा लागू करने के लिए कोशिशें हुईं उसमें यह स्वाभाविक था कि इसका दुष्परिणाम झेलने वाले तबके एक साथ आते और प्रतिरोध दर्ज कराते. जेएनयू में हुई एक घटना के बाद जिस तरह तीन छात्रों को राजद्रोह (भाषा की अपनी राजनीति होती है जिसके तहत ब्रिटिशकालीन राजद्रोह कानून को मुख्यधारा के चैनल देशद्रोह में बदल देते हैं) के आरोप में गिरफ्तार किया गया, वह तमाम तार्किक लोगों को गैरजरूरी और अतिरेकी कदम लगा और इसीलिए देश-विदेश से तमाम प्रगतिशील लोगों, विश्वविद्यालयों, शिक्षक संघों, बुद्धिजीवियों और आम जनता ने इसका कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराया. छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में कन्हैया के भाषण को इन्हीं परिप्रेक्ष्यों में देखा जाना चाहिए लेकिन मसीहा की तलाश में पागल हमारा समाज केजरीवाल से कन्हैया तक के कंधों पर अपनी अकूत उम्मीदों का बोझ डालने के लिए बेकरार है. उसे उद्धारक चाहिए जो पांच साल में दुनिया बदल दे और खुद बस एक बार जाकर वोट डालना हो. जाहिर है उसे हर बार धोखा खाना ही होगा. एक कमजोर और आत्मविश्वास से हीन समाज ही मसीहा तलाशता है लेकिन इतिहास का अनुभव बताता है कि समाज जनता बदलती है नेता नहीं. आंदोलन नेता पैदा करते हैं, नेता आंदोलन नहीं पैदा करते. व्यक्ति को आंदोलन से ऊपर खड़ा कर देने की प्रवृत्ति सत्ता और उसके समर्थकों के लिए तो लाभकारी होती है जो आज उसे कुछ साल पहले मिली सजा से लेकर एक मित्र के साथ सामान्य-सी तस्वीर को अपने कुत्सा प्रचार का हिस्सा बनाकर निजी हमलों की आड़ में व्यापक सवालों को छिपा रहा है लेकिन शिक्षा के बाजारीकरण और भगवाकरण के खिलाफ जो एक देशव्यापी आंदोलन सुगबुगा रहा है, उसके समर्थकों का इसे स्वीकार करना घातक होगा.

सौजन्य: हिंदी तहलका

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.