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कोई ‘पुरुष उत्पीड़न’ कहे, तो हंसियेगा मत..

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महिलाओं द्वारा उत्पीड़न कानूनों का पुरुषों के खिलाफ दुरुपयोग तेज़ी से बढ़ रहा है। ये महिलाओं के सचमुच हो रहे शोषण और उत्पीड़न के मामलों को भी कमज़ोर करता है..

-अरविन्द शुक्ला॥

लखनऊ। लगभग एक दशक पहले दिल्ली में दीवारों पर एक संस्था के विज्ञापन पुते रहते थे, जो महिलाओं के उत्पीड़न के शिकार पुरुषों को एकजुट करने का आवाहन करती थी।

लोग बसों और इन विज्ञापनों को देख कर हँसते थे। लेकिन अब ‘पुरुष उत्पीड़न’ के विषय पर हंसियेगा मत – महिलाओं के खिलाफ अपराध के बढ़ते मामलों की तरह ये भी तेज़ी से उभरती एक सच्चाई है।images (23)

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता रुपेश शर्मा बताते हैं, “निस्संदेह फ़र्ज़ी रेप के मामले बढ़े हैं। मेरे सामने भी कई केस आए हैं। अधिकतर केस में प्रॉपटी, आपसी संबंध और पैसा का मामला होता है। खासकर 354 (छेड़खानी) का।”

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह ने गाँव कनेक्शऩ को फोन पर बताया, “कुछ लोग कानून का ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं। खासकर दिल्ली जैसे बड़े शहरों में। हम लोगों ने खुद बहुत सारे मामले फ़र्ज़ी पाए हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि रेप जैसी घटनाएं नहीं हो रहीं।”

बांदा में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर कहते हैं कि वे बलात्कार से पीड़ित एक युवती को इंसाफ दिलाने में जुटे थे, लेकिन उन पर ही एक महिला ने बलात्कार समेत कई संगीन धाराओं में केस दर्ज करा दिए। इन आरोपों की सत्यता की जांच न्यायालय में ही हो पाएगी।

अपने बचाव में आशीष कहते हैं, “मेरे ऊपर 55 वर्ष की एक महिला से रेप का केस है। रेप का आरोप लगाने वाली महिला इससे पहले चार लोगों पर बलात्कार का केस करा चुकी है। मैं जिस केस की पैरवी कर रहा था ये आरोप उस पूरे को कमजोर करने की कोशिश है।”

लखीमपुर में रहने वाले अतुल दीक्षित (30 वर्ष) की उनके पड़ोसी से किसी बात पर मारपीट हो गई। पड़ोसी ने दूसरे दिन थाने में अतुल पर अपनी बेटी से छेड़छाड़, बलात्कर समेत कई मामलों में केस दर्ज करा दिया।

मेडिकल रिपोर्ट में बात रेप साबित नहीं हुआ। लेकिन छेड़छाड़ के आरोपों को चलते उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा। वो कुछ दिनों पहले ही जमानत पर बाहर आए हैं।

आशीष और अतुल के केसों में सच का फैसला अदालत में होगा। लेकिन पीड़ित और हालात बता रहे हैं कि यौन उत्पीडन और इनसे जुड़ी कानून की धाराओं 376 (बलात्कार) व 498A (दहेज़ उत्पीड़न) को कुछ लोग हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के साथ ही बड़े शहरों में ये मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। निर्भया केस के बाद दिल्ली को देश की रेप कैपिटल कहा जाने लगा। लेकिन वर्ष 2013 में दिल्ली मे महिला आयोग से जो आंकड़े आए वो हैरान करने वाले थे। रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 के बीच दर्ज हुए 2753 मामलों में 1287 ही सही पाए गए जबकि 1464 केस झूठे और तथ्यहीन थे।

पुरुषों के हितों के लिए आवाज़ उठाने वाली संस्था सेव इंडिया फाउंडेशन के पास रोजाना देशभर से सैकड़ों कॉल आते हैं। संस्था का दावा है कि कई बार 75 फीसदी केस तक झूठे पाए गए हैं। संस्था की प्रवक्ता ज्योति तिवारी बताती हैं, “लड़का-लड़की सहमति से सेक्स करते हैं, किसी बात पर अनबन हुई तो रेप, बॉस प्रमोशन नहीं देता है तो रेप, वर्षों तक लिव इऩ में रहते हैं, संबंध खराब हुए तो रेप। दिल्ली में तो अधिकतर मामले सहमति के बाद वाले या फिर प्रॉपर्टी से जुड़े होते हैं।”

वो आगे बताती हैं, ”376 का दुरुपयोग वैसे ही हो रहा है जैसे कभी दहेज प्रथा का होता था। हम लोगों ने नए कानून बनाने का ही पुरजोर विरोध किया था। कानून में कुछ बदलाव होने जरुर उसके लिए हम लोग लगातार कानून मंत्रालय को लिख रहे हैं।”

अपनी बात के समर्थन में वो इंदौर के चर्चित ध्रुव अग्रवाल का उदाहरण देते हुए बताती हैं, “ध्रुव अग्रवाल पर उनकी किराएदर ने बलात्कार का आरोप लगाया, कोर्ट में वो साबित नहीं हुआ। जेल से निकलने के बाद उन्होंने सुसाइड कर लिया। ध्रुव ने सबसे पूछा था अब मेरी इज्जत कौन वापस करेगा?”

वो सवाल करती है, “क्या पुरुषों की इज्तत नहीं होती है। सोशल मीडिया का जमाना है लोग मिनटों में लोगों की फोटो वायरल होती है। आदमी की नौकरी चली जाती है, जिंदगी बर्बाद हो जाती है लोगों की। लेकिन अगर आरोप गलत साबित होते हैं तो उन्हें कोई नहीं पूछता।”

उत्तर प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष जरीना उस्मानी बताती हैं, “फर्जी केस की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए हम पीड़ित और आरोपी से दोनों से बात करने, और स्थानीय पुलिस का रिपोर्ट के बाद ही कोई कार्रवाई करते हैं।”

दिल्ली में एकाएक बढ़े रेप के मामलों के बाद वर्ष 2013 में देश के बड़े अग्रेजी अख़बार द हिंदू ने छह महीने की गहन पड़ताल के बाद रिपोर्ट लिखी थी कि दिल्ली के जिन 40 फीसदी मामलों में फैसला आया, जजों ने कहा कि सेक्स सहमति से हुआ था और ज्यादातर मामलों में महिला के माता पिता ने शिकायत दर्ज कराई। यह शिकायत उस व्यक्ति के खिलाफ होती है जिसके साथ उनकी बेटी भाग गई हो। रिपोर्ट कहती है 25 फीसदी ऐसे मामले हैं जिनमें मर्द सगाई के बाद या फिर शादी का वादा करने के बाद मुकर गए। पुलिसकर्मी भी मानते है कई केस दबाव बनाने के लिए होते हैं। हालांकि किसी पुलिसकर्मी ने अपना नाम नहीं दिया।

अपर पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश, अभय बताते हैं, जब भी कोई रेप की शिकायत आती है, पुलिस प्राथमिकी लिखकर जांच शुरू कर देती है, अगर झूठा पाया जाता है तो दफा 182 के तहत कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन अधिकतर मामलो में सुलह समझौता हो जाता है।

चर्चित झूठे मामले

1. फरवरी 2013 में दिल्ली की फास्ट ट्रैक कोर्ट की जज निवेदिता अनिल शर्मा ने नौकरानी से रेप के आरोपी एक शख्स को बरी करते हुए टिप्पणी की रेप या यौन शोषण के झूठे मामलों का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है, ये खतरनाक है इसे रोकना होगा।

2. फरवरी 2014- जोधपुर में बहला-फुसलाकर दुष्कर्म करने की झूठी एफआईआर कराने पर महानगर मजिस्ट्रेट ने आरोप लगाने वाली महिला को दिन भर कोर्ट में खड़ा रहने और 100 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

3. जून 2014 में शामली की रहने वाली युवती ने चलती कार में रेप का आरोप लगाया। पुलिस की पड़ताल में पता चला जिस लड़के पर आरोप लगाया गया था उसके पार्टनर ही साजिश रची थी। लड़की भी गिरफ्तार की गई।

5. नवंबर 2014- दिल्ली की ट्रायल कोर्ट ने बलात्कार के दो मामलों की सुनवाई करते हुए कहा कि झूठे आरोप लगाने वाली महिलाओं को सजा दी जाए। ऑडिशनल सेशन जज वीरेंद्र भट्ट ने अपने फैसलों में कहा कि अगर किसी शख्स पर रेप का आरोप लगता है तो उसके लिए बेहद दुख और शर्मिंदगी की बात होती है। शर्मिंदगी और अपमान बेगुनाह साबित होने के बाद भी जिंदगी भर पीछा नहीं छोड़ते।

4. सितंबर 2015- हरियाणा के अंबाला मंडल कमिश्नर पर रेप का आरोप लगाने वाली महिला को पंचकुला पुलिस ने फिल्मी स्टाइल में गिरफ्तार किया। बाद पता चला महिला कई और लोगों पर भी ऐसे केस दर्ज करवा चुकी थी। महिला पर पहले एक केस दर्ज था।

5. दिसंबर 2014 में हरियाणा के रोहतक में चलती बस में दो लड़कों की पिटाई कर सुर्खियों में आई बहनों की सच्चाई पर बस में सवार कुछ महिलाओं ने ही सवाल उठाए। उनके कई और वीडियो भी समाने आए थे। जो उन्हें सवालों के घेरे में खड़े कर रहे थे।

6. 2003 में दरवाजे से बारात लौटाकर दुनिया भर में सुर्खिंया ‘आइरन लेडी’ निशा सिंह 2012 में दहेज का केस हार गईं। इस केस में टर्न तब आया जब नवनीत सिंह नाम के शख्स ने निशा से पहले शादी होने का दावा किया हालांकि निशा ने उस पर भी केस किया। लेकिन दहेज वाले केस में नवनीत से निशा की नजदीकी को कोर्ट ने भी माना था।

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. धारा ३७६ और ४९८ (A) का दुरूपयोग बहुत ही तेजी से हमारे भारतीय समाज में बढ़ रहा है, इसके दुरूपयोग से न जाने कितने ही पुरुषों ने आत्महत्या कर ली और न जाने ही कितने घरो का सुख चैन छीन गया, समाज में जो प्रतिष्ठा गई सो अलग। सरकार, महिला आयोग, सामाजिक संगठन और न्यायालय को इस प्रकार की घटनाओं पर गहनता से चिंतन करना चाहिए और साथ ही ऐसे क़ानून में बदलाव के साथ साथ झूठे या फर्जी आरोप साबित होने पर कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए ताकि ३७६ और ४९८(A) जैसी धाराओं का कोई भी किसी का शोषण न कर सके।

  2. mahendra gupta on

    महिला सुरक्षा कानून का ऐसा दुरूपयोग उसकी उपयोगिता ,पर प्रश्न चिन्ह लगाता है ,देश में यह अवधारणा बनने लगी है कि कानून से हमें सुरक्षा प्राप्त है इसलिए अपने स्वार्थ पुरे करने के लिए वर इसे हथियार बन लेते हैं ,ऐसी अवस्था में कानून के रखवालों के लिए अनावश्यक ही बोझ बढ़ता जा रहा है ,
    यही हाल आज दलित व अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून के साथ हो , रहा है ,दोनों ही हालातों में ये भी अपराधी बनते जा रहे हैं , इस प्रकार के झूठे आरोप लगाने वालों के खिलाफ सख्त व शीघ्र कार्यवाही होनी चाहिए

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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