/कन्हैया तुम बहक गये, दंगे और दमन को अलग नज़रों से नहीं देखा जा सकता..

कन्हैया तुम बहक गये, दंगे और दमन को अलग नज़रों से नहीं देखा जा सकता..

मुकेश कुमार सिंह॥

जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को मिली पहचान ही शायद अब उसकी दुश्मन बन चुकी है। प्रसिद्धि ने उसे अहंकारी बना दिया। अहंकार ने उसका विवेक-हर लिया। कन्हैया कोई पहला शख़्स नहीं है कि जिसे मीडिया की बदौलत रातों-रात मिली अपार पहचान को लेकर बदहज़मी हो गयी हो। चटपट प्रसिद्धि पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन उसे सहेज़कर रखना और पचा लेना बिरलों को ही आता है। प्रसिद्धि और क़ामयाबी ऐसा ख़ुराक़ है, जिसे हज़म कर पाना बहुत मुश्किल है। इसीलिए कन्हैया का ये बयान निहायत बचकाना है कि 1984 के सिख विरोधी दंगे और 2002 के गुजरात दंगे में फ़र्क़ है। क्योंकि एक में कथित रूप से सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल हुआ था तो दूसरा, भीड़ के पाग़लपन का नतीज़ा था।कन्हैया कुमार
बाद में कन्हैया की सफ़ाई भी आयी कि उनके बयान को ग़लत तरीक़े से पेश किया गया। अरे भाई, ये बात ज़रा पहले सोच लेते कि बयान को ग़लत तरीक़े से लिया ही जाएगा। लिहाज़ा, हम ऐसी बात बोले ही क्यों जिसे कोई तोड़-मरोड़कर पेश कर सके! तुमसे तो ये ग़लती और नहीं होनी चाहिए थी। क्योंकि तुमने तो अभी-अभी ‘हवन करके हाथ जलाया’ है। क्या तुम्हें पता नहीं कि दूध के जले को तो छाछ भी फूँक-फूँककर पीना चाहिए। तुम तो ग्रामीण और ग़रीब परिवेश से आते हो, तुम्हारे पैर तो ज़मीन पर ही रहने चाहिए थे। लेकिन तुम्हारी ज़ुबान बुरी तरह से बहक गयी। अब ये तुम्हारी मर्ज़ी है, तुम मानो या न मानो, लेकिन नुक़सान तो भारी हो चुका है!

वो बिरले होते हैं जो रातों-रात मिली प्रसिद्धि के बाद भी अपना सन्तुलन क़ाबू रख पाते हैं। तुमसे पहले अरविन्द केजरीवाल भी बहुत कम समय में सितारे की तरह चमके थे। लेकिन जल्द ही उन्होंने क़सम खा ली, जो तोड़नी पड़ी। उनकी कितनी ही बातें हैं जिसे लेकर उन्हें बाद में अफ़सोस जताना पड़ा, ग़लती माननी पड़ी। लेकिन केजरीवाल ने ख़ुद को राजनीति में नया बताकर इसकी भरपायी कर ली। तुम्हारे लिए ये उतना आसान नहीं हो सकता। क्योंकि लोग तुम्हें उतना मासूम नहीं समझते हैं। लोगों ने तुममें परिपक्व राजनेता वाली छवि देख ली थी। जहाँ से तुम आगे जा सकते हो, धड़ाम से गिर सकते हो, लेकिन सरककर भी पीछे नहीं जा सकते। प्रसिद्धि वाली गाड़ी में बैक-गियर नहीं होता।

कन्हैया, तुमसे पहले राहुल गाँधी ने अपनी ही सरकार के अध्यादेश को सार्वजनिक तौर पर फाड़कर ऐसी बदनामी बटोरी, जिससे वो पूरी ज़िन्दगी मुक्ति नहीं पा सकते। विरोधियों ने उन पर उसी दिन से नादान होने का जो ठप्पा लगाया, काँग्रेस के लिए उस छवि को धोना भारी पड़ रहा है। राहुल की तरह उनके पिता राजीव गाँधी भी देश के शीर्ष परिवार से थे। राष्ट्रीय पहचान उन्हें भी विरासत में मिली थी। लेकिन 84 के दंगों को उन्हें ये कहकर स्वाभाविक बता दिया कि ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’। बाद में सिख दंगों के लिए काँग्रेस और उसके नेताओं ने बारम्बार माफ़ी माँगी, लेकिन दाग़ नहीं धुले। राहुल की दादी को भी असमिया नेता देबकान्त बरुआ ने ‘Indira is India and India is Indira’ बताकर अमरता तो पा ली, लेकिन ये ख़्याति नहीं बल्कि चापलूसी का कुख़्यात उदाहरण बन गया। अटल बिहारी वाजपेयी का वो बयान कौन भूला है कि ‘अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण राष्ट्रीय भावना का प्रकटीकरण था’। उसी तर्ज़ पर अभी-अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी ‘भगवान का अवतार’ बताया गया है।

इन मिसालों की तह में जाने पर एक ही बात तय होती है कि प्रसिद्धि पाने के बाद इनसान को बेइन्तहाँ सतर्क रहना सीखना चाहिए। एक-एक शब्द को बहुत नाप-तौलकर और ये सोचकर बोलना चाहिए कि ज़माना उसकी बात का बतंगड़ बनाएगा ही। फिर भी हमें नुक़सान नहीं होना चाहिए। एक बार यदि नुक़सान हो गया तो उसकी भरपायी बहुत मुश्किल होती है। महेश भट्ट की बेटी आलिया ने एक आसान सवाल का एक बार बेवकूफ़ी भरा जवाब क्या दे दिया, सारी दुनिया में वो हँसी का स्थायी पात्र बन गयी। क्या उसे किसी ने जानबूझकर ग़लत ढंग से पेश किया था! उसे बाप की प्रसिद्धि का मोल चुकाना पड़ा। इसीलिए सार्वजनिक जीवन का उसूल कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे हमें सड़क पर चलते वक़्त ख़ुद को तो ग़लतियों से बचना ही चाहिए। औरों की ग़लतियों से भी ख़ुद को बचाने का हममें कौशल होना चाहिए। वर्ना औरों की ग़लती की भारी क़ीमत हमें चुकानी पड़ेगी।

कन्हैया तुम शोध-छात्र हो। तुम्हें इतना तो पता होना ही चाहिए कि दंगों का कोई प्रकार नहीं होता। समाज शास्त्र में भले ही दंगों का प्रकृतियाँ होती होंगी, लेकिन आम आदमी जिस समाज में रहता है उसमें दंगों का सिर्फ़ एक ही मतलब है – हिंसा, आगजनी और निर्मम कत्लेआम। मौत लाठी ये हो या गोली या मुक्के से, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। क़ानून की धाराएँ भले ही इसके हिसाब से लगें, इरादतन और ग़ैरइरादतन हत्या पर भले ही बहस हो, लेकिन मौत तो मौत है। असमय और अकारण मौत किसी की भी, कहीं पर भी और कभी भी निन्दनीय ही रहेगी। इसे साँप-नाथ और नाग-नाथ के भेद की तरह नहीं देखा जा सकता। अगर किसी ने सरकारी मशीन का सहयोग लेकर दंगे किये हैं तो वो भी उतना ही बड़ा ग़ुनाहगार है, जितना सरकारी मशीनरी की निष्क्रियता की वजह से होने वाला दंगा। क्योंकि सरकारी मशीनरी का बुनियादी काम ही है आम जनता के जान-माल की हिफ़ाज़त करना। उसने यदि हिफ़ाज़त नहीं की तो अपना काम नहीं किया। उसका अपना काम नहीं करना ही उसका क़सूर है।

बिल्कुल ऐसे, जैसे सिर्फ़ रिश्वत ख़ाना ही भ्रष्टाचार नहीं है। कोई तनख़्वाह ले और अपना कर्त्तव्य नहीं निभाये, तो वो भी भ्रष्टाचार ही है। फिर चाहे उसने ऐसा अपनी मर्ज़ी से किया हो या किसी के इशारे पर। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। इसी तरह, दंगों में मरने वालों की संख्या या उनके मज़हब वग़ैरह के हिसाब से उन्हें छोटा या बड़ा आँकना भी नादानी होगी। क्या एक जैसे दो दंगों में यदि प्रशासन ने कुछ तबाही को होने से बचा लिया तो उसके प्रभाव को कम-ज़्यादा करके देखना सही होगा। ये सब भ्रष्ट परिभाषाएँ हैं। राजनेता अपनी कमीज़ को दूसरे से ज़्यादा सफ़ेद बताने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाते हैं। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि औरों के ग़ुनाह गिनाने से हमारा अपराध कम नहीं हो सकता। फ़लाँ ने ग़लती की इसलिए हम भी ग़लती कर सकते हैं। ये तरीक़ा और दलील सही नहीं हो सकती।

इसी तरह, कन्हैया तुम्हें ये भी समझना होगा कि इमरजेंसी और फ़ासीवाद में भी कोई फ़र्क़ नहीं है। दोनों मानवाधिकारों का दमन करते हैं। अब यदि कोई कहे कि इन्दिरा गाँधी की इमरजेंसी अच्छी थी और एडाल्फ़ हिटलर का फ़ासीवाद ख़राब, तो उसे नादान ही समझना सही होगा। ये बिल्कुल ऐसे ही है किसी विशालकाय कुत्ते को हम शेर नहीं कहने लगते, छोटे पिल्ले को ख़रग़ोश नहीं समझा जाता। हो सकता है कि परिभाषाओं के आईने में इमरजेंसी और फ़ासीवाद में फ़र्क़ किया जा सके, लेकिन दमन तो दमन है। उसे छोटे-बड़े की तरह देखकर अच्छा या ख़राब नहीं कहा जा सकता। लिहाज़ा, इन प्रसंगों से तुम्हें सबक़ लेना चाहिए। अच्छे नेता सिर्फ़ ये तय करते हैं कि उन्हें सार्वजनिक तौर पर क्या नहीं बोलना है। इससे क्या कहना है ये तय करना बहुत आसान हो जाता है।

मुकेशOPINE

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.