ताकतवर लोगों के लिए टैक्स से बचना इतना आसान कैसे..

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-रवीश कुमार||

क्या कभी आपने हिसाब किया है कि आप इंटरनेट, अखबार और न्यूज़ चैनलों पर महीने का कितना खर्च करते हैं। कभी सोचा है कि आप इतना पैसा क्यों खर्च करते हैं। क्या इसलिए कि मीडिया सत्ता का सामूहिक गुणगान करे या ये चाहते होंगे कि जो कहा जा रहा है और जो नहीं कहा जा रहा है उन सबकी गहन पड़ताल हो, रिसर्च हो ताकि आपको भी भरोसा हो सके कि आप जो जानते हैं करीब करीब ठीक ठीक जानते हैं। मीडिया को लेकर कई बुरी खबरें आती रहती हैं मगर वहीं कुछ लोग इसी दौर में मीडिया को बदलने में भी लगे हैं।panama-leaks

जर्मनी के दक्षिणी हिस्से में एक शहर है म्यूनिख। यहां से एक अखबार निकलता है जिसका नाम है ज्युड डॉयचे त्साइटुंग। जर्मन में ज्युड का मतलब होता है दक्षिण, डॉयचे मतलब जर्मनी और त्साइटुंग मतलब अखबार। दक्षिण जर्मनी का अख़बार बड़ा अख़बार है जिसका सर्कुलेशन 4 लाख 32 हज़ार है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुए ज्युड डॉयचे त्साइटुंग यह अख़बार काफी लोकप्रिय है।

इस अखबार को सूत्रों के ज़रिये पनामा शहर की एक कंपनी मोसाक फोंसेका के दस्तावेज़ मिलते हैं। एक करोड़ से अधिक ईमेल और पीडीएफ फाइल मिलती है। मोसाक फोंसेका एक कानूनी सेवा देने वाली कंपनी है जिसका काम कंपनियों की खरीद बिक्री में मदद करना है। आरोप है कि 1977 में बनी इस कंपनी ने कई फर्ज़ी कंपनियों को बिकवाने का खेल खेला है जिसके ज़रिये दुनिया के बड़े लोगों ने अपना पैसा अपनी सरकार से छिपा कर पनामा में जमा कराया है ताकि टैक्स न देना पड़े। ज्युड डॉयचे त्साइटुंग अखबार को 1970 के दशक से लेकर 2015 के बीच 2 लाख से अधिक शेल कंपनी यानी काग़ज़ी कंपनियों के दस्तावेज़ मिले हैं। इन्हीं दस्तावेज़ों को पनामा पेपर्स नाम दिया गया है।

लाखों कंपनी और करोड़ों दस्तावेज़ों को पढ़ना आसान नहीं था। वो भी तब जब इनकी जांच के लिए दुनिया के कई देशों में पड़ताल ज़रूरी थी। इसलिए ज्यूड डॉयचे त्साइटुंग अखबार ने इन दस्तावेज़ों को इंटरनेशनल कॉन्‍सोर्टियम ऑफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्‍ट्स (International Consortium of Investigative Journalists) से साझा किया। दुनिया भर के 370 पत्रकार एक साल तक इन दस्तावेज़ों की जांच करते रहे।

इस समूह में भारत की तरफ से इंडियन एक्सप्रेस भी शामिल है जिसकी वेबसाइट और अखबार में पनामा पेपर्स को काफी विस्तार से छापा गया है।

ICIJ 76 देशों के दुनिया भर के 109 संस्थानों के खोजी पत्रकारों का एक समूह है। 1997 में ICIJ की स्थापना हुई थी ताकि इस ग्लोबल दौर में पत्रकारिता किसी मुल्क की सीमा के भीतर सिमट कर न रह जाए। अपराध, भ्रष्टाचार अब एक देश की सीमा तक सीमित नहीं हैं, कई देशों का मामला हो जाता है इसलिए यह ज़रूरी है कि कई देशों के पत्रकार मिलकर काम करें। ICIJ में कई प्रकार के अनुभवी लोग काम करते हैं खासकर वे लोग जो सरकारी रिकॉर्ड को पढ़ने में दक्ष होते हैं। तथ्यों की जांच करने वाले और वकील भी होते हैं।

पत्रकारिता कहीं दम तोड़ रही है तो कहीं दुनिया भर के पत्रकार पत्रकारिता का दम तोड़ने वालों का तिलिस्म तोड़ रहे हैं। पनामा पेपर्स बताता है कि अमीरों का भी अंडरवर्ल्ड होता है। दुनिया भर के ताकतवर लोग अपने मित्र, रिश्तेदार, किसी अजनबी के नाम से फर्ज़ी कंपनी बनाते हैं, उन्हें कंपनी बनाने को कहते हैं और अपने पैसे को इधर से उधर कर लेते हैं। भारत में ऐसी बातें उठती रहती हैं मगर कोई ठीक से धरा नहीं जाता है। जर्मनी के जिस पत्रकार ने इतने बड़े खुलासे की पहल की है उसके बहाने जानने में कोई बुराई नहीं कि जर्मनी में प्रेस की आज़ादी की क्या स्थिति है। भारत की क्या स्थिति है।

रिपोटर्स बिदाउट बॉर्डर्स हर साल दुनिया भर में प्रेस की आज़ादी पर एक रैंकिंग निकालता है। 2015 में भारत का स्थान 180 देशों में 136वां हैं। यानी इसके अनुसार भारत में प्रेस की स्वतंत्रता बहुत ही ख़राब है। जर्मनी का स्थान 12वां हैं और फिनलैंड का स्थान पहला। भारत का स्थान अफगानिस्तान से भी नीचे है।

हिटलर के दौर में जर्मनी में ग्लाइश शाल्टुंग व्यवस्था थी, इसके तहत खबरों को एक जगह से पूछ कर, प्रमाणित कराकर सारे अखबारों में छापा जाता था। इससे जर्मन प्रेस की विश्वसनीयता समाप्त हो गई थी। वहां के लोग बहुत दिनों तक झूठी खबरों को यकीन के साथ पढ़ते रहे और उनकी बेखबरी का लाभ उठाकर लाखों यहूदियों को गैस चेंबर में डालकर भून दिया गया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी में ये हालात बदलने लगे तभी एक यादगार वाकया हुआ जो जर्मन प्रेस के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है।

जर्मनी की एक बड़ी पत्रिका है स्पीगल। इस पत्रिका ने रक्षा घोटाले की खबर छापी। संपादक ही गिरफ्तार कर लिया गया। पूरी दुनिया देख रही थी जर्मनी अपने प्रेस की आज़ादी के लिए क्या करता है। वहां पर हज़ारों लोग संपादक के समर्थन में निकल आए। नतीजा ये हुआ कि संपादक को छोड़ा गया और रक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। तब से लेकर अब तक जर्मनी ने प्रेस की आज़ादी को बहुत मेहनत से हासिल किया है। ये उदाहरण आपको इसलिए दिया कि प्रेस की आज़ादी को हासिल करने में जनता का भी उतना ही बड़ा रोल होता है जितना पत्रकार और संपादक का। शायद इसीलिए जर्मनी प्रेस की स्वतंत्रता का स्तर भारत से कहीं ज़्यादा ऊपर है। नेपाल भी हमसे कई रैंक आगे है। जर्मनी से अनवर ने बताया है कि इस वक्त जर्मनी के एक शहर बॉन में जर्मन मीडिया पर प्रदर्शनी चल रही है जिसका नाम है दबाव में। इस प्रदर्शनी का मकसद है कि मीडिया कैसे दबाव में काम करता है। जिसके यहां प्रेस की स्वतंत्रता होगी वहीं पर प्रेस की आलोचना की प्रदर्शनी भी लग सकती है।

पनामा पेपर्स, विकीलीक्स की तरह ही है लेकिन विकीलीक्स से बहुत बड़ा है। विकीलीक्स में तो पांच अखबार ही शामिल थे लेकिन पनामा पेपर्स को खंगालने में सैंकड़ों पत्रकार साल भर तक जुटे रहे। क्या ये कहानी अपने आप में किसी बड़े साहित्य या फिल्म से कम रोमांचक है। वैसे जिस लीग कंपनी की बात हो रही है उसका एक पार्टनर फोंसेका पनामा का मशहूर लेखक भी है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के बीच में पड़ता है पनामा शहर। इस पनामा पेपर्स से उजागर हुआ है कि दुनिया के 72 मौजूदा या पूर्व हो चुके राष्ट्र प्रमुखों ने फर्ज़ी कंपनी बनाकर अपना पैसा यहां रखा है।

सीरि‍या के राष्ट्रपति बशर-अल-असद, मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक, लीबिया के गद्दाफी। आइसलैंड के प्रधानमंत्री सिंगमुंदुर दावी गुणलुन और उनकी पत्नी का भी नाम आया है, आरोप है कि दोनों ने पनामा की ला कंपनी के ज़रिये टैक्स हैवन में निवेश किया है। हंगामा हुआ है रूस के राष्ट्रपति पुतिन जी का नाम देखकर। आप जानते ही हैं कि बड़े लोग अपने नाम से नहीं बल्कि किसी और से कह देते हैं कि वो अपने नाम से कोई कंपनी खोल ले और उसमें पैसा लगा देते हैं। वो इस पैसे को कहीं और लगा देता है। बड़े लोगों का सिर्फ नाम आता है, बवाल होता है मगर अदालतों में साबित नहीं हो पाता। बहुत कम धराते हैं।

2008-13 : पुतीन के मित्र ने फर्ज़ी कंपनी बनाकर 2 अरब डॉलर गुप्त ठिकाने पर रखा है। सर्जे रोल्डुगिन नाम का यह मित्र पुतीन के लिए फ्रंट का काम करता है। पैसे को गुप्त रखने के लिए मौसाक फोंसेका कंपनी ने कागज़ी कार्रवाई करने और कंपनी बनाने में मदद की। रूस के सरकारी बैंकों के ज़रिये लाखों करोड़ों डॉलर इन कंपनियों में लगाए गए हैं। ये कंपनियां ट्रक बनाने का दावा करती हैं तो रिसॉर्ट चलाने का दावा भी करती हैं।

अमीर आदमी अपना स्वर्ग यहीं देख लेता है। उसके लिए स्वर्ग का मतलब वो नहीं होता जहां देवता होते हैं, परियां होती हैं। उसका स्वर्ग तो वहां जहां वो बिना टैक्स दिये पैसा रख सके, उसकी सरकार को पता न चल सके। इसे टैक्स हैवन कहते हैं। हिन्दी में कर-स्वर्ग या उर्दू में कर-जन्नत कहें तो सुनने में ठीक नहीं लगता है।

पनामा पेपर्स पूरी दुनिया के सामने सवाल खड़े करता है कि ताकतवर नेताओं, देश के प्रमुखों और उद्योगपतियों के लिए टैक्स से बचना इतना आसान कैसे हो जाता है। कैसे तमाम जांच एजेंसिया इस हकीकत से आंखें मूंद लेती है। कभी आपने सुना है कि इतना बड़ा खुलासा तमाम सरकारों ने मिलकर किया हो। अक्सर पत्रकार ही अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाकर क्यों करता है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग का नाम आया है। जबकि ये कहा जाता है कि चिनफिंग भ्रष्टाचार पर लगाम कस रहे हैं। कई नेताओं और सैनिक अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। लेकिन अब उन्हीं पर सवाल उठ रहे हैं। इसलिए जो नेता यह कहे कि उसने भ्रष्टाचार समाप्त कर दिया है, ज़रा ठहर कर सोचने की ज़रूरत है। राजनीति से जिस दिन भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा उस दिन नेता आपकी गाड़ी मांग कर रैली करने जाएंगे। आपको खुद ही पता चल जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस अखबार के अनुसार इस सूची में 500 भारतीयों के नाम हैं।

भारतीयों को 2013 के बाद विदेशों में कंपनी बनाने की इजाज़त मिल गई थी। आरोप है कि इससे पहले ही कई लोगों ने अपना पैसा इन फ्रंट कंपनियों के ज़रिये बाहर भेज दिया था। भारत में सुप्रीम कोर्ट की एसआईटी विदेशों में काला धन की जांच कर रही है। विदेशों में जमा धन को बताने के लिए भारत सरकार ने एक कानून भी बनाया है।

सब हैरान हैं कि अभी तक किसी बड़े भारतीय नेता का नाम कैसे नहीं आया। हमारे नेता भी नहीं कह रहे हैं। वे एक दूसरे को लेकर इतने आश्वस्त हैं कि लोकपाल की भी मांग नहीं कर रहे हैं। दो साल हो गए लोकपाल कानून के पास हुए, अभी तक लोकपाल जी आए भी नहीं हैं। खुद ही लोग प्रमाणपत्र दे रहे हैं कि भ्रष्टाचार समाप्त हो गया है। बहरहाल पनामा लीक्स खुलासे के बाद दुनिया के कई देशों में हड़कंप मच गया है। रायटर्स ने बताया है कि न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के टैक्स प्रशासन ने अपने नागरिकों की जांच शुरू कर दी है। ऑस्ट्रेलिया ने कहा है कि उसके यहां 800 अमीर नागरिकों की जांच शुरू हो गई है। फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद ने कहा है कि लीक में हुए खुलासे को लेकर जांच करेंगे। स्वीडन के टैक्स प्रशासन ने भी कहा है कि वो न्यूज संगठनों से दस्तावेज़ लेकर जांच करेंगे। पनामा लिक्स में 400-500 स्वीडन के नागरिकों के भी नाम हैं।

मशहूर खिलाड़ी मेसी का भी नाम आया है। मेसी ने कहा है कि वो उनका नाम लेने वाले अखबारों के खिलाफ मुकदमा करेंगे। रूस ने कहा है कि ये बदनाम करने की साज़िश है। क्रेमलिन के प्रवक्ता ने कहा है कि यह इस बात का प्रमाण है कि पुतिन को लेकर फोबिया किस हद तक बढ़ गया है। जब कुछ नहीं मिलता है तो अगला निगेटिव बातें करने लगता है।

पनामा लीक्स के पहले विकीलीक्स ने भी कई खुलासे हुई। जितनी कार्रवाई नहीं हुई उससे ज्यादा पत्रकारों को दरबदर होना पड़ा। भारत में ही कितना कहा गया कि काला धन विदेशों में है। लाने के नाम पर कड़ा कानून बनाकर उन्हीं से निवेदन किया गया कि बता दीजिए कितना है। इस खुलासे के बाद भारत के वित्त मंत्री ने कहा है कि बेनामी संपत्तियों के ख़िलाफ़ ग्लोबल अभियान 2017 तक अमल में आ जाए फिर उसके बाद किसी के लिए अपनी संपत्ति छिपा कर रखना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा। जिन लोगों ने पिछले साल खुलासा करने के लिए दी गई रहम की समय सीमा के बाद भी संपत्तियों को छिपाया है उनकी ख़ैर नहीं है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन 500 भारतीयों के खिलाफ़ जांच करने के आदेश दे दिये हैं जिनका नाम पनामा पेपर्स में आया है। सरकार ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के समूह के इस खुलासे का स्वागत भी किया है। एक्सप्रेस अखबार ने ऐश्वर्या राय का नाम भी एक संदर्भ में लिया है लेकिन उनकी टीम ने इसे बेबुनियाद बताया है। और भी कई नाम हैं, अमिताभ बच्चन से लेकर अडानी के बड़े भाई, हरीश साल्वे, इंडिया बुल्स के समीर गहलोत, इकबाल मिर्ची। इनमें से कुछ ने अपनी सफाई देते हुए इन बातों को बेबुनियाद बताया है। कुछ की सफाई आती ही होगी।

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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