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हरेक बात पर कहते हो घर छोड़ो..

By   /  April 7, 2016  /  No Comments

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-आरिफा एविस ||

घर के मुखिया ने कहा यह वक्त छोटी-छोटी बातों को दिमाग से सोचने का नहीं है. यह वक्त दिल से सोचने का समय है, क्योंकि छोटी-छोटी बातें ही आगे चलकर बड़ी हो जाती हैं. मैंने घर में सफाई अभियान चला रखा है और यह किसी भी स्तर पर भारत छोड़ो आन्दोलन से कम नहीं है. यह बापू का नारा था जिनके साथ देश की अवाम ने हुकूमत के खिलाफ चलाया. इसलिए आज फिर से इस अभियान को अपने घर से शुरू करने की जरूरत महसूस हो रही है.आरिफा एविस
मैं इस घर का मुखिया हूँ अपने पिता की आलोचना देशद्रोह से कम नहीं होती, यह प्राचीन परम्परा के खिलाफ है. इसलिए घर में रहने वाले तमाम लोगों के खिलाफ मुझे स्वच्छता अभियान और घर छोड़ो आन्दोलन जैसे विश्व व्यापी अभियान को फिर से पुनर्जीवित करना पड़ेगा वैसे भी हमारे देश में तो पुनर्जन्म की हजारों सालों पुरानी परम्परा है. किसी ने ठीक ही कहा है कि जब जब धरती पर पाप होंगे तब तब कोई न कोई अवतार जन्म लेगा. इस बार मैंने शिवअवतार के रूप में घर की हुकूमत संभाली है. मेरी तीसरी आँख से एकदम साफ दिखाई देता है कि किस को घर से निकलना है और किस को घर में पनाह देनी है.
बापू के सबसे लोकप्रिय, विश्व-प्रसिद्ध विचार “सफाई अभियान” जन-जन तक, जन-जन के लिए घर-घर लागू कर दिया जाना चाहिए. मैंने उसी विचार को घर छोड़ो आन्दोलन के रूप चला रखा है. मेरे घर में किसी को भी अपने विचार रखने की आजादी बिलकुल भी नहीं है जो लोग इस घर में रहते हैं जिसका खाते हैं उसके बारे में तो वैसे भी कुछ नहीं बोलना चाहिए. जैसे जो लोग घर के दामाद हैं वो कभी नहीं बोलते. जिस जगह रहते हो उसी की बुराई करते हो, इस बात का भी ख्याल नहीं रखा जाता कि पास पड़ोस वाले क्या बोलेंगे? यही कि आप के तो सारे बच्चे नालायक निकले, जो आपने बाप की भी नहीं सुनते..
मैं मुखिया इसलिए ही बना हूँ. क्योंकि कोई था ही नहीं इस घर में, जो मुखिया बन सके. घर की व्यवस्था ठीक-ठाक चलती रहे. अब इसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी है. जो लोग मेरे निर्णयों में सहयोगी नहीं बनेंगे उनको अपना नया घर ढूंढ़ना पड़ेगा. मुझे यह अहसास हो गया है कि सफाई अभियान या घर छोड़ो आन्दोलन को चलाये बिना काम नहीं चलेगा.
भूल के भी पड़ोसी के घर के पक्ष में बात कही तो आपको घर छोड़ना पड़ेगा. अगर पास पड़ोस से प्यार मोहब्बत और एकता की बात की तो उसको भी घर छोड़ना पड़ेगा. मेरी कमियां न निकालो, चुपचाप रहो, बस गुजर बसर कतरे रहो वरना घर छोड़ो . मैं कहीं भी जा सकता हूँ मन हो तो बिना बताएं पड़ोसी के घर शादी में जाऊंगा तोहफे भी दूंगा लेकिन अपने घर में पड़ोसी का पैर भी नहीं पड़ना चाहिए.

समय समय पर आपने मेरी तारीफ नहीं की और काम में अड़चने डाली तो भी आपको घर छोड़ना पड़ेगा. हमारे गांव में सैकड़ों जातियां और कई मजहब हैं लेकिन सर्वश्रेष्ठ तो एक ही है. तुम लोगों की बीवी कहे कि इस घर में रहने पर डर लग रहा है तो सीधे बिना वीजा के दूसरी घर के रास्ते आप लोगों के लिए हमेशा के लिए खुले हुए हैं.आप नहीं जाओगे तो चिंता न करे मेरे भाई इस काम को जल्द ही कर देंगे.

माना कि मैंने तुम लोगों को खेतीबाड़ी करने लायक नहीं छोड़ा है. घर के सारे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी दूसरे लोग कर रहे हैं . फिर भी घर तो घर है अगर घास-फूस नहीं खा सकते तो आपको यहाँ रहने की कोई जरूरत नहीं.

मेरे घर का एक ही उसूल है कि यह घर में मांसाहार नहीं होना चाहिए. मेरी तो नाक में भी फिल्टर लगा है ताकि कोई जीवाणु न मर जाये और मांसाहारी की श्रेणी में न आ जाऊं. वो बात अलग है कि बेल्ट, जूते, बैग और जैकिट लैदर की ही पहनते हैं. दूध-दही हम यूँही पीते हैं.

इस घर में उठने वाली हर आवाज को बाहर का रास्ता दिखाने में देर नहीं लगेगी. समस्या को सहन करो पर चूं न करो. गर चूं करी तो बिना लिए दिए आपको दूसरे घर की नागरिकता मिल जाएगी. इसीलिए घर छोड़ो अभियान चलाने के लिए पूरी टीम बना दी गई है जो घर का भक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

मेरे घर में एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति प्रेम हो या न हो पर घर की दीवारों, खिड़की, छत और साज सज्जा के प्रति प्रेम होना बहुत जरूरी है.पड़ोसियों से घर जब तक नहीं बच सकता जब तक कि एक दूसरे के प्रति गुस्सा बरकरार न हो. मुखिया की सियासत के प्रति गुस्सा हरगिज नहीं बढ़ने देना चाहिए. जब आप एक गुलाम घर में रहते हो तो गुलामों की तरह रहो, घर के मुखिया की तारीफ करके अपने कर्तव्यों का पालन करो और खुश रहो. फिर कोई आपको घर से नहीं निकलेगा. हाँ समय समय पर घर भक्ति की परीक्षा के लिए भीड़ उन्माद का सहारा लेना कोई जुर्म तो नहीं. अगर डर बरकरार रहेगा तभी तो मुखियागिरी चलेगी वरना आज के ज़माने में, घर जैसी पुरानी व्यवस्था बचना मुश्किल है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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