/बोलो अच्छे दिन आ गये..

बोलो अच्छे दिन आ गये..

-आरिफा एविस॥

देश के उन लोगों को शर्म आनी चाहिए जो सरकार की आलोचना करते हैं और कहते हैं कि अच्छे दिन नहीं आये हैं. उनकी समझ को दाद तो देनी पड़ेगी मेमोरी जो शोर्ट है. इन लोगों का क्या लोंग मेमोरी तो रखते नहीं. हमने तो पहले ही कह दिया ये मामूली जुमला नहीं है जो सरकार बार-बार बोले. हमने तो वही किया जो अभी तक किया और कहा गया व जैसा पिछली सरकारें करती आयीं हैं. बस फर्क सालों का है. जो काम पिछली सरकारें 60 सालों में न कर सकी, वर्तमान सरकार पाँच साल में कर दिखाएगी, यही तो वादा था. और वादे तो होते ही तोड़ने के लिए. वादे हैं वादों का क्या.

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आपको याद होगा पिछली बार 13 दिन की सरकार में हमने वो किया जिसकी कल्पना भी नहीं की गयी थी. एनरान कम्पनी को 80 प्रतिशत बैंक गारंटी पर बिजली उत्पादन का ऐतिहासिक फैसला किया था. 1300 कृषि वस्तुओं का सीमा शुल्क 200 प्रति से घटाकर 0 से 10 प्रतिशत तक करने का दीर्घकालीन काम इसी सरकार ने बखूबी किया, जिसका पालन दूसरी सरकारें भी धीरे-धीरे करती आयीं है.
बंद आँखों से दिमाग चलाया जाता है. रात के अँधेरे में अच्छे दिन देखने पड़ते हैं. चीनी 34 रुपये से घटकर 23 रुपये किलो पर आ गयी. जनता को फायदा हुआ कि नहीं, चाहें किसानों के नाम पर राज्य सरकारों ने मिल मालिकों को पैकेज पर पैकेज दिया हो .
जब हमारी सरकार बनी तो 78 रुपये लीटर पैट्रोल था. आज 60 से 68 रुपये है. चाहें अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी कीमत 40 रुपये से भी कम क्यों न हो. सोना-चाँदी चूँकि गरीब से गरीब लोगों के पास होता है. इसलिए उसकी कीमत 31000-2500 के बजाय 49000-33600 रुपये कर दी ताकि गोल्ड ब्रांड में निवेश हो सके और अर्थव्यवस्था तेजी से दौड़ने लगे. क्या ये अच्छे दिन आपको दिखाई नहीं देते.
पुलिस विभाग देशद्रोही, आतंकवादियों, आदिवासियों, किसानों और छात्रों को नियन्त्रित करने में लगी है. क्या यह हमारी सफलता नहीं है? क्या ये सब अच्छे दिनों की सुगबुगाहट नहीं है?
गंगा की सफाई, देशद्रोहियों की सफाई अभी तक जारी है. लाखों करोड़ों रुपये सफाई अभियान को सफल बनाने के लिए विज्ञापनों में लगाया जा रहा है. झाड़ू, बैनर, पोस्टर, फ़िल्मी सितारों के साथ किताब का विमोचन और सेल्फी लेकर भारत को एकदम स्वच्छ बनाने की मुहिम जारी है. क्या यह अच्छे दिन की शुरुआत नहीं है?
भ्रष्टाचारियों के नाम सामने आ चुके हैं. जिन महानायकों, पूंजीपतियों, नेताओं के नाम पनामा लिस्ट में आये हैं. उनको छोड़कर बाकी सबको जेल में डालने की तैयारी है. क्या ये अच्छे दिन के संकेत नहीं? पूरी दुनिया में देश का डंका बज रहा है. अमेरिका भारत की शर्तों पर झुक गया है. पाक में हड़कंप मच गया. चीन जैसे गद्दार देश में भारत की तूती बोल रही है. विश्वभ्रमण से देश को विश्वगुरु मान लिया है. चाहे आर्थिक, सामाजिक खुशहाली के मामलों में दूसरे देशों की तुलना में हमारे देश की रेंक नीचे से पहले या दूसरे नम्बर पर हो.
भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी, आत्महत्या के मामले में तो एक नम्बर की उपाधि आज तक बनाये रखी है. देश के हर नागरिक के खाते में 15 लाख आ चुके हैं. स्टैंड अप इण्डिया के जरिये स्वरोजगार के लिए 10 लाख से 1 करोड़ रुपये बांटें जा रहे हैं.
रोजगार इतने पैदा हो चुके हैं कि एक व्यक्ति के लिए लाखों वेकेंसी निकलती हैं. भर्ती फार्म से बिलकुल पैसा नहीं कमाया जाता चाहे वो भर्ती कैंसिल ही क्यों न करनी पड़ें.
आलोचकों से मेरी अपील है कि सकारात्मक ही सोचें, नकारात्मकता हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी. तो बोलो अच्छे दिन आ गये.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.