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मीडिया में दलाल-तंत्र..

-मुकेश कुमार॥
अगुस्ता वेस्टलैंड घोटाले में अँग्रेजी के बीस पत्रकारों (हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के पत्रकारों को इस लायक नहीं समझा जाता) को चालीस करोड़ की रिश्वत देने की ख़बर सच है या कोरी गप ये तो तभी पता चलेगा जब पूरी जानकारी सामने आएगी। लेकिन जिस तरह से इस अपुष्ट सूचना के आधार पर कुछ पत्रकारों को निशाना बनाकर उनका चरित्र हनन करने का अभियान छेड़ा गया उससे ये संदेह होना स्वाभाविक है कि इस चुनींदा लीक का मक़सद कुछ और ही था। इस मामले में सत्ता प्रतिष्ठान की चुप्पी भी ग़ौरतलब है। अगर सचमुच में ऐसा हुआ है तो उसे नाम उजागर करना चाहिए और यदि नहीं तो खंडन करके विवाद पर विराम लगाना चाहिए।

अगुस्ता

इस तरह के धुँधलके से उन चंद पत्रकारों की ही छवि ध्वस्त नहीं होती जिनसे सत्तारूढ़ दल का बैर है, बल्कि समूची पत्रकार बिरादरी ही कठघरे में खड़ी हो जाती है। ये न तो मीडिया के लिए शुभ है और न ही लोकतंत्र के लिए। लेकिन मौजूदा दौर की सियासत को शायद न मीडिया की कोई चिंता है और न ही लोकतंत्र की। बल्कि उसके लिए दोनों का कमज़ोर होना खुद के शक्तिशाली होने का ज़रिया है। फिर जो सरकार किसी भी तरह के विपक्ष और विरोध को हर क़ीमत पर कुचलने के लिए प्राणपण से जुटी हो, वह मीडिया में प्रतिरोध की बची-खुची आवाज़ों को ही क्य़ों बख्शेगी। इसलिए लाज़िमी है कि झूठ फैलाए जाएं, आरोप लगवाए जाएं और सोशल मीडिया पर इतनी गाली-गलौज़ करवाई जाए कि लोग मैदान छोड़कर ही भाग जाएं। ये एक सोची-समझी रणनीति है और इसे समझे बिना मीडिया तथा राजनीति के नए संबंधों को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
हालाँकि इसका ये मतलब नहीं है कि इस तरह की रिश्वतखोरी नहीं हुई होगी। आशंका तो यही है कि हुई होगी, क्योंकि ऐसा होना कोई अनहोनी तो है नहीं। मीडिया जगत ही नहीं उसके बाहर के लोग भी जानते हैं कि बड़ी कंपनियों द्वारा अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए जो तमाम उपाय किए जाते हैं उनमें मीडिया को साधना भी शामिल होता है। वे इसके लिए अलग से बजट भी रखती हैं जैसा कि अगस्ता वेस्टलैंड के सौदे को हासिल करने के लिए क्रिश्चियन मिशेल को चालीस करोड़ इसके लिए दिए गए। मिशेल ही भारतीय पत्रकारों को कंपनी की फैक्ट्री दिखाने के नाम पर यूरोप की सैर कराने ले गया। ज़ाहिर है कि इसका पूरा खर्च किसी पत्रकार या मीडिया घराने ने नहीं उठाया होगा। लेकिन इस तरह के छोटे-मोटे एहसानों से ही छत्तीस सौ करोड़ की डील नहीं जीती जा सकती, क्योंकि अधिकारियों और नेताओं को प्रभावित करने के लिए पत्रकारों के प्रभाव की ज़रूरत पड़ती है और उनसे ये काम मोटी रकम देकर ही करवाई जा सकती है। मसलन इसी सौदे में अटल सरकार के समय हैलीकॉप्टर की छत की ऊँचाई कम करवाकर अपनी दावेदारी मज़बूत करने के लिए कई स्तरों पर किकबैक का इस्तेमाल किया गया होगा और मीडिया भी उनमें से एक है।

 

पहले ये सुनी-सुनाई बात मानी जाती थी कि हथियारों के सौदों में दलाली नेता, अफसर और दलाल ही खाते हैं। मगर यदि ये रहस्योद्घाटन सही निकलता है तो पहली बार आधिकारिक रूप से ये साबित होगा कि इस तरह के लेन-देन में रक्षा मामले कवर करने वाले या इन विषयों पर लिखने वाले विशेषज्ञों का भी हिस्सा होता है। ये ठीक राडिया के मामले की तरह ही है। पहले सरकारों के बनने-बिगड़ने या नीतियों को कंपनियों के हिसाब से गढ़वाने के में मीडिया की भूमिका की चर्चाएं वर्षों से होती रही है, मगर राडिया मामले ने इसे सप्रमाण उजागर कर दिया था। अब यदि अगुस्ता वेस्टलैंड हैलीकॉप्टर सौदे में घूँसखोर पत्रकारों के नाम बाहर आते हैं तो रक्षा सौदों में भी उनकी लिप्तता सबकी नज़र में आ जाएगी। लेकिन ये मामला केवल पत्रकारों तक ही सीमित नहीं है। इसमें उनके संस्थानों की भी भूमिकाओं की जाँच की जाएगी तो पता चलेगा कि वे भी इस खेल में शामिल हैं। आख़िर हर मीडिया संस्थान जानता है कि उसका कर्मचारी कहाँ क्या ग़ुल खिला रहा है। मगर यदि वह चुप रहता है तो इसका मतलब यही है कि वह भी लाभान्वित हो रहा है। वर्ना उसे अपनी साख की चिंता तो होनी ही चाहिए। मीडिया के इस दलाल-तंत्र में पत्रकार ही नहीं मीडिया इंडस्ट्री का हर पुरज़ा शामिल है।
वास्तव में देखा जाए तो पत्रकारों, मीडिया संस्थानों और कंपनियों के बीच साठ-गाँठ रक्षा या कुछेक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है। ये दलाल-तंत्र हर क्षेत्र में मौजूद है और इसकी जड़ें नीचे तक फैली हुई हैं। बिज़नेस पत्रकारिता तो इसके लिए बुरी तरह बदनाम है। वहाँ महँगे तोहफों और पैकेट का चलन अरसे से है। मुट्ठी गरम करने के बहुत सारे तरीके कार्पोरेट जगत, जनसंपर्क एवं विज्ञापन की एजंसियों ने निकाल रखे हैं। पत्रकारों को उपकृत करके काम निकालने की सारी तरकीबें उन्हें आती हैं। राजनीतिक पत्रकारिता भी बिकाऊ हो चुकी है और अब तो थाने बिकने तक की ख़बरें आने लगी हैं। बहुत सारे न्यूज़ चैनल अंशकालिक संवाददाताओं को माइक आईडी देकर खुद कमाओ-खाओ और चैनल के लिए भी लाओ के हथकंडों को व्यावसायिक कला के रूप में साध चुके हैं। दुर्भाग्य ये है कि ये पतन पत्रकारों के स्तर पर कम सांस्थानिक स्तर पर ज़्यादा हुआ है। पत्रकारों को भी भ्रष्ट बनाने या भ्रष्टों को पत्रकार बनाकर काम करवाने की उनकी रणनीति अब पूरे मीडिया को लील चुकी है। नवउदारवाद के दौर ने इसे विस्तार देकर वैधता भी प्रदान कर दी है।
लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि सारे पत्रकारों को एक ही झाड़ू से बुहार दिया जाए। बहुत से पत्रकार ऐसे भी हैं जो काजल की कोठरी में रहकर भी खुद को बेदाग़ रखे हुए हैं। बेशक़ उन्हें इसका दंड भी भुगतना पड़ रहा है, पर वे डटे हुए हैं। पत्रकारों की इस विलुप्त होती नस्ल को बचाया जाना चाहिए क्योंकि इन्हीं से लोकतंत्र बचेगा और मीडिया भी। इसलिए सरकार से माँग की जानी चाहिए कि अगर पत्रकारों की ऐसी कोई सूची है जिन्होंने रिश्वत ली थी तो उसे सार्वजनिक करे, न कि अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए सभी पत्रकारों को बदनाम करने का कुचक्र चलाए।

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2 comments

#1mahendra guptaMay 24, 2016, 4:27 PM

आज मीडिया मीडिया तो रहा ही नहीं वह तो पूरा का पूरा ही दलाल बन चूका है , कोई सरकार का दलाल है तो विपक्ष का , कोई कम्पनीज का कोई संगठनों का , इस लिए अब जनता अपना ही मानस बनाती है ,मीडिया हाउस भी तो इन राजनीतिक दलों व कॉरपोरेट घरानों के , आम आदमी का कोई मीडिया नहीं वह तो इनके द्वारा केवल बरगलाया ही जाता है , आम आदमी को तो केजरीवाल जैसे लोग भी बुद्धू बना जाते हैं ,वह भी मीडिया के हाथों बिका हुआ है , व खुद मीडिया को खरीदने मे लगा हुआ है

#2Mahendra GuptaMay 24, 2016, 10:57 AM

आज मीडिया मीडिया तो रहा ही नहीं वह तो पूरा का पूरा ही दलाल बन चूका है , कोई सरकार का दलाल है तो विपक्ष का , कोई कम्पनीज का कोई संगठनों का , इस लिए अब जनता अपना ही मानस बनाती है ,मीडिया हाउस भी तो इन राजनीतिक दलों व कॉरपोरेट घरानों के , आम आदमी का कोई मीडिया नहीं वह तो इनके द्वारा केवल बरगलाया ही जाता है , आम आदमी को तो केजरीवाल जैसे लोग भी बुद्धू बना जाते हैं ,वह भी मीडिया के हाथों बिका हुआ है , व खुद मीडिया को खरीदने मे लगा हुआ है

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