/सरला मिश्रा की जली लाश को आज भी इंतजार है न्याय का..

सरला मिश्रा की जली लाश को आज भी इंतजार है न्याय का..

-आनन्द मिश्र||

भोपाल : नाम सरला मिश्रा। आयु ४१ वर्ष। शिक्षा डबल एम.ए.,एम.एड.,एल.एल.बी. स्नातक पत्रकारिता। परिचय म.प्र. कांग्रेस की दबंग नेता एवं स्वतन्त्रता सेनानी की पुत्री, पौत्री। पद, राजनीति, म.प्र. युवक कांग्रेस की संयुक्त सचिव। हालपता सौ फीसदी जलने के बाद तड़प-तड़प कर हुई मौत। वजह, राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के संयुक्‍त कुकर्म।Sarla-Mishra

जी हां, यह कहानी है मध्य प्रदेश की बेहद जुझारू और सक्रिय नेता सरला मिश्रा की। सरला की ख्वाहिशें थीं राजनीति में महिलाओं के लिए एक मजबूत डगर बनाना, लीक बनाना, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। हालांकि उसमें गजब का जोश था। कुछ कर डालने का माद्दा था। मप्र युवक कांग्रेस के विभिन्न पदों में रही सरला तब चर्चा में आयी जब मप्र के कुछ युवक कांग्रेसियों ने जबलपुर में कांग्रेसी पार्षद कैलाशशर्मा के ढाई वर्ष के पुत्र लक्की शर्मा पर तेजाब फेंक दिया। तब सरला मिश्रा ने ऐसे नेताओं के खिलाफ आवाज उठाई। इसकी सक्रियता ने पूरे मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि खुद कांग्रेस की राजनीति में एक जबर्दस्त तूफान खड़ा कर दिया।

सरला अपना सीना तान कर उस मासूम बच्चे को न्‍याय दिलाने के लिए खड़ी थी, मगर पूरी राजनीति उसके खिलाफ हो गयी। मगर सरला ने हौसला नहीं खोया। नतीजा यह हुआ कि सरला ने लक्की को लेकर तात्कालिक प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समक्ष पहुंच गयी। तो हंगामा हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उस बच्चे का उपचार अमेरिका में कराने का निर्णय लिया। इतना ही नहीं, सरला ने इस मामले में अपनी ही पार्टी के ऐसे आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेताओं के खिलाफ भी मोर्चा खोला। हालांकि उस पर इसके खिलाफ हमलों की साजिशें भी बुनी गयीं। लेकिन इसके बावजूद सरला अडिग ही नहीं। नतीजा यह हुआ कि तब आपराधिक प्रवृत्ति के चालीस से अधिक मध्य प्रदेश के युवक कांग्रेस के नेताओं को पार्टी से बाहर निकला था। उस समय श्री मोतीलाल बोरा म.प्र. के मुख्यमन्त्री थे।

राजीव गांधी की मप्र यात्रा में सदैव सरला मिश्रा उनकी टीम की सदस्य रही। उनका 10 जनपथ नई दिल्ली में प्रवेश बगैर रोकटोक था। श्री राजीव गांधी की हत्या के बाद भी यह क्रम बना रहा। लगातार 20 वर्षो तक कांग्रेस पार्टी के लिये सेवा में देने के बाद भी उन्हें उचित स्थान नहीं मिला।

सन् 1993 में दिग्विजय सिंह को मुख्यमन्त्री बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे उनकी राइटहैंड भी कहलाती थी किन्तु दिग्गी ने कभी भी उन्हें विधायक राज्यसभा का टिकिट नहीं दिलाया जबकि वे अपने भाई लक्ष्मण सिंह को तो विधायक,सांसद बनवाते रहे। सन् 1997 में सरला मिश्रा की सब्र का बांध टूट गया। वे इन्हीं बातों को लेकर एक दिन मुख्यमन्त्री निवास दिग्विजय सिंह से मिलने पहुंची और तैश में आकर बोली:- महाराजा मैं तेरे को अंतिम मौका दे रही हूं। अभी भी वक्त है, सम्भल जा, वरना मैं तो तुझे छोडूंगी नही।

इसी के कुछ दिनों के बाद 14 फरवरी 1997 को स्थानीय कुछ नेता सायं 5.30 बजे सरला को उनके आवास से एक कार्यक्रम के बहाने लेकर गये तथा बाद में वह १०० प्रतिशत जली अवस्था मे लौटी। संभवत उसे सी.एम. हाउस या उसके आस-पास ही जलाया गया। दूसरे दिन से लेकर २७ फरवरी तक भाजपा ने विधानसभा नहीं चलने दी। अंत में गृहमंत्री चरणदास महंत विधानसभा के अंदर सरला मिश्रा हत्याकाण्ड की सी. बी. आई. जांच की घोषणा की किन्तु नोटीफिकेशन न करने के कारण आज तक सी. बी. आई. जांच प्रारंभ नहीं हो सकी।

वर्तमान प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को भी इस हत्याकाण्ड की जानकारी है एवं हमने उन्हें अगस्त 2014 से लेकर लगातार पत्र लिखें, किन्तु वे भी वैसे ही निकले जैसे अन्य नेता हैं। शिवराज सिंह चौहान, बाबूलाल गौर, डॉ गौरीशंकर शैजवार, गोपाल भार्गव, विश्वास सारंग के साथ मुख्यमन्त्री आवास में बैठक (23 जुलाई 2015) के बाद शिवराज ने हम से कहा था कि मिश्रा जी मैं आपके साथ हूं मेरी प्रधानमन्त्री जी से बात हो चुकी है। यही बात म.प्र. संगठन मन्त्री अरविन्द मे भी कही थी कि मिश्रा जी मैं अन्न की कसम खाता हू्ं इसकी जांच सीबीआई से होगी। मेरी मोदी जी से बात हो चुकी है।

लेकिन शर्म की बात है कि इस मामले में एक भी सरकार ने कोई भी कान नहीं दिया। जबकि यह सारे दल इस समय आम आदमी के मन में महिलाओं को लेकर सम्मान, शील की भाव का प्रदर्शित करने में संलग्न है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.