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मुद्रा राक्षस की मौत और हिंदी साहित्य का पानी..

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-नवीन कुमार
जब से मुद्रा राक्षस के निधन की ख़बर आई है मुझे रह-रहकर युसूफ मियां याद आ रहे हैं। युसूफ मियां लखनऊ की एक फुटपाथ पर जूते-चप्पलों की मरम्मत करके घर चलाते थे। जून के महीने में लखनऊ में प्रधानमंत्री का दौरा हुआ। पूरे शहर को उनके स्वागत में तोरण द्ववारों से पाट दिया गया। फुटपाथों को रंग दिया गया। पार्टी के कार्यकर्ता रंगीन साफे पहनकर रैली वाले दिन सड़कों पर निकले। लखनऊ की पुलिस स्कॉटलैंड यार्ड बन गई। अचानक प्रधानमंत्री के दिल्ली से चलने की सूचना आई। जिस फुटपाथ पर युसूफ मियां बैठते थे वहीं से रैली में जाने का रास्ता था। ट्रैफिक रोक दिया गया।
mudrarakshas

मैदान में लाखों पार्टी कार्यकर्ताओं का हुजूम और सड़कों पर भयानक सन्नाटा। इस वीभत्स विरोधाभास के बीच कायम निर्जनता को कभी कभी पुलिस की सायरन वाली गाड़ी तोड़ती है। युसूफ मियां को प्यास लग रही है। वह पास के नलके से पानी लेने के लिए उठते हैं। सिपाही उनकी पीठ पर मारता है एक बेंत। चुपचाप बैठा रै। प्रधानमंत्री आने वाले हैं। युसूफ मियां को लगता है कि बर्दाश्त करना ठीक रहेगा। फिर एंबुलेंस गुजरती है। पार्टी के बड़े पदाधिकारियों की गाड़ियां निकलती है। अफसर गुजरते हैं। मंत्री गुजरते हैं।

प्रधानमंत्री के आने का समय करीब हो चला है। अचानक सड़कों पर टैंकर से पानी का छिड़काव शुरू हो जाता है जिससे प्रधानमंत्री को गर्मी न लगे। युसूफ मियां अपना लोटा लेकर उठते हैं। सिपाही फिर से मारता है एक बेंत। युसूफ मियां लोटा सामनने सरका देते हैं। शायद सड़कों पर छिड़के जा रहे पानी की कुछ बूंदे लोटे में गिर जाएं। ऐसा नहीं होता। युसूफ मियां की प्यास बर्दाश्त से बाहर हो रही है। तभी चहलकदमी बढ़ने लगती है। एक बड़े से ट्रक पर शीशे के विशाल मर्तबान में ठंडा पानी जा रहा है। यह प्रधानमंत्री का पानी है। गंगाजल। प्रधानमंत्री जहां भी जाते हैं वही पीते हैं। उसी से नहाते हैंं। मर्तबान से पानी छलक न जाए इसलिए ट्रक धीरे-धीरे चल रहा है।

युसूफ मियां की आंखें बाहर आने को हैं। वह पुलिसवाले के पैरों में गिर जाते हैं। लेकिन वह हिलने देने को भी तैयार नहीं है। फिर प्रधानमंत्री का काफिला दूूर से आता हुआ नजर आता है। खुली जीप में। चारों तरफ से फूलों की बारिश हो रही है। केवड़े और गुलाब की खुशबू चारों तरफ बिखर जाती है। देशभर के छायाकार प्रधानमंत्री की मुस्कुराती हुई तस्वीर बनाने के लिए टूट पड़ते हैं। इधर युसूफ मियां को हिचकी आ रही है। वो अपनी उखड़ती हुई सांसों को रोक नहीं पा रहे। जैसे प्रधानमंत्री का काफिला गुजरता है। पुलिसवाले इत्मीनान की सांस लेते हैं। सिपाही युसूफ मियां को पानी पी लेने की इजाजत देनेे के लिए फिर से डंडा फटकारता है। लेकिन युसूफ मियां की मौत हो चुकी है।

इस कहानी का क्राफ्ट ऐसा था कि कोई महीने भर तक उसे रोज़ ही पढ़ता रहा। ऐसा लगता था जैसे लखनऊ की फुटपाथ पर युसूफ मियां की उखड़ती हुई सांसें इस मुल्क के हर नौजवान को बागी हो जाने का आमंत्रण दे रही हैं। जैसे युसूफ मियां की प्यास कह रही हो कि इस देश के सारे सामंतों, साहूकारों और सम्राटों के मर्तबान तोड़ डालो। जैसे युसूफ मियां कि निकली हुई आंखें कह रही हों कि इन नज़रों से कैसे देख पा रहे हो मेरी मौत? हंस में छपी वह कहानी थी “युसूफ मियां की मौत और प्रधानमंत्री का पानी।”

1995 की फरवरी में लखनऊ में ऊंचे पाएंचे के पायजामे और बिना कॉलर वाले कुर्ते में अटके एक लेखक से पहली मुलाकात हुई थी तो छात्र जीवन की अनगढ़ता तरतीब के सिरे ढूंढने में नाकाम रही थी। मल्टीनेशनल कंपनियों के बढ़ते खतरे पर बोलने आए थे। तब उन्होंने कहा था कि तुमलोग इनके आतंक को अभी नहीं समझ पा रहे हो। ये एक दिन रबर की थैलियों को दुनिया के सबसे क्रांतिकारी अविष्कार की तरह बेचेंगे, तुम खरीदने के लिए मचलोगे और राजनीति तुम्हारी इस हालत पर मज़े लेगी। मैंने पूछा था आप राक्षस जैसे लगते तो नहीं। उनका जवाब था लगता तो रावण भी नहीं था। लेकिन उसकी अकाट्य तार्किकता की हत्या करने के लिए तुम्हारी स्मृतियों में उसके दस सिर डाले गए, खतरनाक मूंछें डाली गईं, अट्टाहास डाला गया।
इसके बाद कई मुलाकातें हुईं। इलाहाबाद में, लखनऊ में और दिल्ली में भी। हर बार हैरानी होती। यह प्यारा राक्षस बूढ़ा तो हो रहा है लेकिन कमज़ोर नहीं पड़ रहा। उनकी सोच हर बार हमें हमारी सीमाओं का एहसास कराके विदा करती। आज जब हम साहित्य का मरा हुआ पानी देख रहे हैं तो मुद्रा राक्षस के न होने से पैदा हुआ शून्य अनंत तक फैल गया है। युसूफ मियां से भरे इस भयानक समय से भागते हुए पुरस्कृत-उपकृत साहित्यकार प्रधानमंत्री के आचमन को लोकतंत्र का पवित्र अनुष्ठान बता रहे हैं तो मुद्रा राक्षस के सरोकारों के प्रतिबिम्ब हममें से हरेक को मर्तबान तोड़ देने की अपील कर रहे हैं।

 

लखनऊ के दुर्विजयगंज से दिल्ली के राजेंद्र भवन तक इस मृत्यु का शोक सवालों के बादलों में बदल गया है। हम देख रहे हैं अपने समय के प्रकांड और दुर्दांत साहित्यकारों-आलोचकों-समीक्षकों को इन बादलों के न बरसने की कामना करते हुए। वो जानते हैं इन बादलों की पीछे युसूफ मियां की निकली हुई आंखें हैं। वह दिख गईं तो जनता मर्तबानों को तोड़-डालेगी। सम्राटों की नींद उड़ा देगी। कहने का दिल तो नहीं लेकिन कहना अब सिर्फ रस्म है कि अलविदा मुद्रा राक्षस। साहित्य के इस मरते हुए पानी के बीच भी हम युसूफ मियां को बचा ले जाने की मुकम्मल कोशिश का वादा करते हैं।

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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