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‘‘इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है..?’’ अमिताभ ने कहा, शहरयार को अवार्ड देकर हुए सम्मानित

By   /  September 19, 2011  /  No Comments

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‘‘सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है,
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है…
इस गीत को सुनकर आज भी लोग बरबस रूक जाते हैं।’’

कौन हुआ सम्मानित? : शहरयार को ज्ञानपीठ पुरस्कार सौंपते हुए अमिताभ बच्चन

जब विज्ञान भवन के सभागार में सदी के महानायक कहलाने वाले अमिताभ बच्चन ने अखलाख मुहम्मद खान उर्फ ‘शहरयार’ को ज्ञानपीठ पुरस्कार सौंपने के बाद ये पंक्तियां कहीं तो पूरा हॉल तालियों से गड़गड़ा उठा। अमिताभ ने कहा, ”हम सब अलग तरह से अपना जीवन जीते हैं और जीवन की आपाधापी में व्यस्त रहते हैं, ऐसे में बहुत कम अवसर मिलते हैं जब हम जीवन के गहरे अर्थों को समझते हैं और उनसे साक्षात्कार करते हैं।’’

यह पहला मौका था जब ज्ञानपीठ पुरस्कार किसी अभिनेता ने दिया हो। ज्ञानपीठ देश के सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार है। महानायक अमिताभ बच्चन ने शहरयार को ज्ञानपीठ से नवाजते हुए कहा कि उनकी शायरी के गहरे अर्थ हैं।

अमिताभ ने कहा कि उर्दू कविता शहरयार से गौरवान्वित हुई है और वे डॉक्टर राही मासूम रज़ा की तरह ही हिन्दी-उर्दू के बीच बनी एक काल्पनिक दीवार को तोड़ने के पक्षधर रहे हैं। वह वास्तव में हिन्दी उर्दू की साझी तहजीब के नुमाइंदे हैं।

अमिताभ ने कहा कि शहरयार साहब ने फासले, अंजुमन, गमन और उमराव जान के गीतों के रूप में फिल्मों को नायाब मोती दिए हैं। जो अपने आप में विराट जीवन दर्शन को समेटे हुए हैं जो गीत कभी पुराने नहीं पड़ते।

बॉलीवुड महानायक ने कहा, ‘‘आज मुझे शहरयार साहब को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।’’

अमिताभ ने कहा, ‘मैं तो कलाओं की दुनिया का वाशिन्दा हूं जिसमें हम दूसरों के लिखे शब्दों का अनुगमन करते हैं, शब्द की सत्ता कितनी बड़ी है यह आप सभी जानते हैं। भारतीय संस्कृति में शब्द को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है।’ उन्होंने कहा कि वे साहित्य का मर्मज्ञ विद्वान नहीं हैं लेकिन बाबूजी की वजह से साहित्य और साहित्यकारों के प्रति मेरी अटूट श्रद्धा रही है। इस अभिनेता ने कहा कि शहरयार साहब की शायरी में विविध रंग दिखाई देते हैं। उनकी शायरी सामाजिक दायित्वों से जुड़ी हुई है और उसमें सामाजिक संघर्ष भी शामिल है।

इस मौके पर शहरयार ने कहा कि भौतिक तरक्की से रूहानी तरक्की को अलग नहीं होना चाहिए, ललित कला और अदब यह काम करते रहे हैं, ज्ञानपीठ भी यही काम कर रहा है.उन्होंने कहा कि मेरा नाम भी महाश्वेता देवी, फिराख, महादेवी वर्मा के साथ लिया जाएगा।

ज्ञानपीठ पुरस्कार के रूप में शहरयार को वाग्देवी सरस्वती की कांस्य प्रतिमा, प्रशस्ति पत्र और सात लाख रूपए का चैक प्रदान किए गए। इस मौके पर गुलजार द्वारा संपादित ‘शहरयार सुनो’ किताब का लोकार्पण भी किया गया जिसमें शहरयार की चुनिंदा नज्में और गजलें शामिल हैं। इसके अलावा गुलजार ने एक अन्य किताब ‘कविताएं बच्चन की, चयन अमिताभ का’ का भी लोकार्पण किया। इसकी संपादक पुष्पा भारती हैं.

इस मौके पर केन्द्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली, महाराष्ट्र सरकार के कैबिनेट मंत्री पतंगराव कदम और गुलजार ने भी अपने विचार रखे। लेकिन शहरयार का अंदाज़-ए-बयां सब को उद्वेलित कर गया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों की जरूरत है और अभी भी शायरी में दूसरों के दुख दर्द को महसूस करता हूं। अपने इस शेर के साथ उन्होंने अपने संबोधन का अंत किया ‘‘एक ही धुन है रात को ढलता देखूं, अपनी इन आंखों से सूरज को निकलता देखूं।’’

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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