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देश आईसीयू के सहारे चल रहा है..

-मणि राम शर्मा||

शेयर बाजार में हुए घोटालों में देश के निवेशक कई बार अपने हाथ जला चुके हैं और देश की जनता का धन कहीं भी सुरक्षित नहीं है. सरकार इन घोटालों से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए किसी न किसी आयोग, मंडल, प्राधिकरण, कमिटी आदि का गठन कर देती है परन्तु इनका दायित्व कहीं पर भी तय नहीं होता. जनता से शिकायत प्राप्त होने पर ये मंडल, कमिटी, आयोग या प्राधिकरण जवाब में जनता को उपभोता फॉर्म या सक्षम न्यायालय में जाने का परामर्श देकर अपने कर्तव्य की औपचारिक पूर्ति कर देते हैं. वास्तव में देखा जाये तो हमारी विधायिकाएं और मंत्रिमंडल भी बहु सदस्यीय निकाय हैं. अत: यदि कमिटी, मंडल, आयोग या प्राधिकरण के गठन से कोई अभिप्राय: सिद्ध होता तो ये तो पहले से ही कार्यरत हैं. इसके विपरीत इन बहु सदस्यीय निकायों के गठन के कुछ नकारात्मक पहलू हैं. प्रथम तो किसी निकाय के बहुसदस्यीय होने पर किसी अनुचित कृत्य या निर्णय के लिए दायित्व ही हवा में विलीन हो जाता है. दूसरा, यदि इन निकायों के सदस्य यदि स्वच्छ छवि वाले न हों (जिसकी भारतीय वातावरण में पर्याप्त संभावनाएं हैं) तो फिर भ्रष्टाचार के रूप में इन सभी सदस्यों के पेट भरने तक भारी कीमत चुकानी पड़ेगी जबकि एकल सदस्य के होने पर मात्र एक सदस्य का ही पेट भरना पर्याप्त रहेगा. अत: बहु सदस्यीय निकाय भ्रष्टाचार को बढ़ावा ही देते हैं. वास्तव में निकाय के बहु सदस्यीय होने की बजाय निर्णायक व्यक्तियों का जवाबदेय होना ही अधिक महत्वपूर्ण है. तीसरा बहु सदस्यीय निकाय द्वारा किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए तुलनात्मक रूप में विलम्ब होगा.India
जब जनता किसी मुद्दे पर उद्वेलित हो जाती है या आक्रोशित होकर सड़कों पर उतर आती है तो उसे ठन्डे छींटे देने के लिए फिर किसी कमेटी या आयोग का गठन कर दिया जाता है. बाद में ये रिपोर्टें धूल चाटती हैं. स्वतंत्रता के बाद देश के विधि आयोग ने 300 से अधिक रिपोर्टें और परामर्श पत्र भारत सरकार को प्रस्तुत किये हैं किन्तु मुश्किल से ही इनमें से 10% पर कोई कार्यवाही की गयी है. इन रिपोर्टों पर की गयी कार्यवाही की जानकारी को सार्वजनिक पहुँच के भीतर भी नहीं रखा जा रहा है व इस प्रकार विधि आयोग पर किया गया खर्चा मात्र सार्वजनिक धन का अपव्यय साबित हो रहा है. इसी कूटनीति की बैशाखियों पर स्वतंत्रता के बाद की हमारी राजनीति की धुरी केन्द्रित है, चाहे सत्ता या विपक्ष में कोई सा ही राजनैतिक दल शामिल रहा हो. भारत में कानून बनाने और उसमें संशोधन के परामर्श के लिए विधि आयोग का स्थायी कार्यालय है किन्तु विधि आयोग के समस्त पद 1 सितम्बर 2012 से रिक्त होने वाले थे और सरकार ने इन पदों पर अभी तक नियुक्तियां नहीं की हैं. और जब दिल्ली बलात्कार काण्ड के बाद जनता सड़कों पर उतरी तो इसके एवज में आनन-फानन में एक नई वर्मा कमिटी का गठन कर दिया. यह हमारी अपनी चुनी गयी सरकार की संजीदगी, संवेदनशीलता, जागरूकता और जनोन्मुखी होने का श्रेष्ठ नमूना है.
सरकार विभिन्न क्षेत्रो में विदेशी पूंजी निवेश के लिए अपनी सहमति देती है किन्तु इस कटु सत्य को भूल रही है कि पूरे देश को गुलाम बनाने के लिए मात्र एक ईस्ट इंडिया कंपनी ही पर्याप्त थी तो विदेशी व्यापारियों को देश में निवेश की खुली छूट देने की क्या परिणति हो सकती है. विदेशी निवेशक एक रणनीति तैयार कर अपने आपको सुरक्षित कर लेते हैं. हर्षद मेहता काण्ड के समय जांच में पाया गया कि सीमित शाखाओं वाले संलिप्त सिटी बैंक ने 20 स्टाफ सदस्य आई ए एस या आई पी एस के रिश्तेदार लगा रखे थे ताकि उनके रसूक के बल पर किसी अनहोनी को टाला जा सके. इस काण्ड में अहम् भूमिका के बावजूद सिटी बैंक का कुछ भी नहीं बिगड़ा. इसी तर्ज पर भारत में भी चतुर लोग अपने व्यवसाय की रक्षा के लिए सेवानिवृत कर, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को सेवा में रखते हैं क्योंकि भारत में कानून नाम की कोई चीज नहीं है अत: इनके संपर्कों के आधार पर काम बनाया जा सकता है. सरकारी क्षेत्र के संगठित कर्मचारियों के लिए भी सातवाँ वेतन आयोग वरदान साबित हुआ है और उनकी परिलब्धियों में वर्ष 2006 में 200% की वृद्धि कर हमारे जन प्रतिनिधियों ने अपने लिए वेतन वृद्धि का मार्ग सुगम, निर्विघ्न और निष्कंटक बना लिया.

सरकारी कर्मचारियों की परिलब्धियों में वृद्धि के अध्ययन के लिए वेतन आयोग ने विदेशी दौरे भी किये और वहां की वेतन सम्बंधित स्थिति का जायजा लिया. किन्तु इस दल ने विदेशी कार्मिकों के कार्य निष्पादन, जवाबदेही, आचरण के नियम, कार्यप्रणाली आदि के विषय में कोई जानोपयोगी जानकारी नहीं ली है. न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण हेतु भी देश से कोई दल शायद ही विदेशों में अध्ययन हेतु भेजा गया हो. देश के सांसदों का प्रतिमाह वेतन, वर्ष जो 2005 तक 4000 रूपये था, को दिनांक 12.09.2006 से 16000 और शीघ्र ही दिनांक 18.05.09 से बढाकर 50000 रूपये कर दिया गया है! दूसरी ओर न्यूनतम मजदूरी की ओर देखें तो यह वर्ष 2005 में रुपये 2500 रूपये थी जो 2009 में बढ़कर मात्र 4000 रूपये ही हो पायी है. इस प्रकार हमारे माननीय जन प्रतिनिधियों की परिलब्धियों में 4 वर्ष में 1100% से अधिक बढ़ोतरी हुई और महंगाई की मार से त्राहि त्राहि करते आम मेहनतकश मजदूर की मजदूरी में समान अवधि में मात्र 60% वृद्धि हुई है. जहां आम आदमी के लिए 30 रुपये रोजना पर्याप्त बताये जाते हैं वहीं एक दिन के समारोह पर करोड़ों फूंक दिये जाते हैं और जनता के धन से खुद पर रोजाना 10000 रुपये से भी ज्यादा खर्च किये जाते हैं !

दिल्ली उच्च न्यायालय अनुसार निचले तबकों में तो शादियाँ टूटने का एक कारण मुद्रास्फीति भी है जिसके चलते वे इस महंगे शहर में जीवन निर्वाह करना मुश्किल पाते हैं. हमारे वित्तमंत्री इस उपलब्धि और नियोजन के लिए धन्यवाद के पात्र हैं. आशा है वे जल्दी ही गांधीजी के सपनों को साकार कर देंगे. देश के गैर सरकारी और असंगठित कार्मिकों को अपने पारिश्रमिक में वृद्धि के लिए फिर भी हड़ताल, धरने, प्रदर्शन, विरोध जूलूस आदि का आयोजन करना पड़ता है. जब हम ऐसी जनविरोधी नीतियों का अनुसरण कर रहे हों तो देश में सामाजिक-आर्थिक न्याय, समाजवाद की सभी बातें बेमानी लगाती हैं और यह कल्पना भी नहीं कर पाते कि जिस समाजवाद का सपना अपने पूर्वजों ने देखा था वह कितनी पीढ़ियों बाद पूरा हो सकेगा. इस प्रकार भारतीय गणतंत्र तो नौकरशाहों और नेताओं के गठबंधन से संचालित है व पांच वर्ष में एक दिन मतदान के अतिरिक्त जनता की इसमें कोई सक्रिय भागीदारी नहीं है. क्या यही हमारा लोकतंत्र है और लोकतंत्र के इसी स्वरुप के लिए हमारे पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी. वास्तव में देखा जाये तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की आज जो भव्य अट्टालिका दिखाई दे रही है उसकी नींव तो मेहनतकश और मजदूर लोगों के शोषण पर टिकी हुई है. अब समय आ गया है देश में विगत 65 वर्षों से जो लोकतंत्र का जो स्वांग चल रहा है उसका शीघ्र पटाक्षेप होना चाहिए.

देश के ऐसे हालात में समाजवाद और लोकतंत्र कैसे स्थापित हो सकता है जब संसद में चिंतन के स्थान पर मात्र निरर्थक बहस हो और जनप्रतिनिधियों व संविधान के रक्षकों के स्वयम चरित्र व आचरण में समाजवाद का नितांत अभाव हो. देश के शासन की बागडोर आज गैर जिम्मेदार हाथों में है और रेल पटरी से उतर चुकी है. पटरीवाले इंजीनियर कहते हैं कि पहियों का अलाइअनमेंट दोषपूर्ण है और गाड़ीवाले इंजीनियर कहते हैं कि पटरी का अलाइअनमेंट दोषपूर्ण है और अंत में दंड दिया जाता है बेचारे गैंगमेन को. देश में आज पंचतत्वों – न्यायिक व पुलिस अधिकारियों, राजनेताओं, धनासेठों, प्रशासनिक अधिकारियों और अपराधियों का शासन है व उनकी समानांतर सरकारें और सत्ताएँ चल रही हैं. लोकतंत्र तो सर धुन रहा है. देश की पुलिस तो किसी आतंककारी से भी अधिक भयावह है जो अफजल या कसाब जैसे  खूंखार लोगों को तो ढूढकर फांसी तक पहुंचा सकती है किन्तु किसी पुलिस वाले को ढूंढकर उसे समन भी तामिल नहीं करवा सकती. देश में आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से ये 10% लोग ही सुरक्षित हैं और तुष्टिकरण की नीति के तहत हमारे राजनेता लैंगिक आधार पर महिलाओं, व जातिगत आधार पर दलितों व वंचितों के लिए आरक्षण की बात करके वोट बैंक की राजनीति करते हैं.

वास्तव में आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता तो देश के 90% लोगों को है जब देश में 65% लोग गरीब और अशिक्षित हों तथा मात्र 3% लोग आयकर देते हों व 121 करोड़ के देश में 20 लाख से अधिक आय वाले मात्र 4 लाख लोग हों. देश में कालेधन को लेकर बवाल मच रहा है किन्तु काले धन की सुरक्षा के लिए हमारे आयकर कानून में पर्याप्त स्थान है और हमारा आयकर कानून भी अपराधियों और कर चोरों के बड़ा अनुकूल है. आयकर अधिनियम की धारा 142 के अनुसार आयकर अधिकारी मात्र 3 पूर्व वर्षों तक की विवरणियाँ दाखिल करने की ही अपेक्षा कर सकता है अर्थात 3 वर्ष से पुराना कोई काला धन हो तो सरकार के पास उस पर कर वसूलने का कोई अधिकार नहीं है. इसी कानून का लाभ देश के उद्योगपति उठा रहे हैं. यद्यपि विश्व के चुनिन्दा पूंजीपतियों में भारत के कई उद्योगपतियों के नाम आते हैं किन्तु देश के शीर्ष 10 आयकर दाताओं में मात्र 3 ही उद्योगपति हैं और शेष अन्य क्षेत्रों से ही हैं. दूसरी ओर अमेरिका में 50% लोग आयकरदाता हैं और कुल आयकर में ऊपरी 1% लोगों का 95% योगदान है जबकि भारत में मात्र 0.3% लोग ही कुल आयकर में 90% योगदान देते हैं. यह स्वतन्त्रता के बाद की अनुसरण की गयी हमारी संविधान विरोधी नीतियों का ही परिणाम है कि आज आय के स्रोत, धन व आर्थिक सत्ता कुछ हाथों में ही केन्द्रित हो गयी है और संविधान में समाहित आर्थिक व सामाजिक न्याय के सपने आज 65 वर्ष बाद भी अधूरे हैं.

विश्वविद्यालयों द्वारा समान परीक्षाओं के लिए ही स्वयंपाठी छात्रों से नियमित छात्रों की तुलना में दुगुना परीक्षा शुल्क लिया जाता है. वे नब्ज टटोल लेते हैं कि स्वयंपाठी छात्र संगठित नहीं अत: उनका शोषण किया जा सकता है जबकि नियमित छात्र संगठित होकर विरोध करेंगे. हमारी सरकारें पशुओं की भांति हैं जो मात्र हांकने पर गतिमान होती हैं और जनता की सहिष्णुता और धैर्य की परीक्षा लती है -विरोध का इन्तजार करती रहती हैं. हमारी लोकप्रिय सरकारें सनकपूर्ण नीतियाँ का अनुसरण कर रही हैं और वे एक ओर बेरोजगारी भता देने की बातें करती हैं, दूसरी ओर बेरोजगारों से विभिन्न नौकरियों के लिये भारी फीस वसूलती और शोषण करती हैं. राजस्थान सरकार ने तो बेरोजगारों का शोषण करने में निर्लजतापूर्वक सारी सीमाएं ही पार कर दी हैं और हाल में पंचायत राज की भर्तियों में, जिनमें कोई परीक्षा नहीं होनी और मात्र उच्च माध्यमिक परीक्षा के प्राप्तांकों के आधार पर चयन करना है, 500 रूपये शुल्क निर्धारित किया है.

राज्य का शासन कहने को लोकतांत्रिक सरकार द्वारा चलाया जा रहा है न कि किसी व्यापारी द्वारा किन्तु मन गवाही नहीं देता है. शुल्क लेने का उद्देश्य मात्र उस गतिविधि पर होने वाले व्यय की प्रतिपूर्ति प्राप्त करना होता है न कि ऐसी गतिविधि से कोई लाभ कमाना. जब कोई परीक्षा नहीं आयोजित हो रही तो इतने शुल्क का क्या औचित्य है? ठीक इसी प्रकार स्वास्थ्य रक्षा के नाम पर सरकार मुफ्त दवाइयां उपलब्ध करवाने का स्वांग कर रही हैं और दूसरी ओर अपनी लागत से 20 गुणा विक्रय मूल्य लिखी दवाइयां बाजार में बिक रही हैं, क्योंकि इन दवा निर्माताओं ने सरकार को, भेंट पूजा के अतिरिक्त, इस बीस गुणा मूल्य पर कर देना स्वीकार कर लिया है. सरकार को इस बात की कोई फ़िक्र नहीं है कि जनता के साथ कितना बड़ा अन्याय हो रहा है, उसे तो अपना छोटा सा हित मात्र अपना राजस्व देखना है. मिलावटी व नकली दवाओं और खाद्य पदार्थों की धरपकड के लिए बाजारों में छापे मारे जाते हैं किन्तु शक्तिशाली उत्पादकों के यहाँ छापे मरकर इस मानव जाति के विरुद्ध व्यवसाय को जडमूल से नष्ट नहीं किया जाता है.

राजस्थान राज्य में वर्ष 1989 से पूर्व स्थानीय निकायों में पेंशन योजना लागू नहीं थी. वोट बैंक और सस्ती लोकप्रियता की नीतियों के चलते सामाजिक सुरक्षा की दुहाई देते हुए 1989 से स्थानीय निकायों में भी पेंशन लागू कर दी गयी. किन्तु केंद्र सरकार ने जल्दी ही 2001 में चालू पेंशन योजना को नयी भर्तियों के लिए बंद कर दिया और मात्र अंशदायी पेंशन योजना लागू कर दी. तत्पश्चात राज्य सरकारों ने भी इसी मार्ग का अनुसरण किया. वहीं समाज कल्याण विभाग ने विभिन्न प्रकार की पेंशने चालू की हैं. हमारी योजनाओं में चिंतन और दीर्घकालीन सोच का सदा ही अभाव रहा है फलत: देश का समुचित आर्थिक विकास नहीं हुआ है और जो थोड़ा बहुत विकास हुआ है वह भी असंतुलित है और उसका फल लक्षित समूह तक नहीं पहुंचा है. ठीक इसी प्रकार कुछ वर्ष पूर्व आठवीं कक्षा के लिए बोर्ड परीक्षा का प्रावधान किया गया और उसके बाद पांचवीं कक्षा के लिए भी बोर्ड परीक्षा का प्रावधान किया गया. किन्तु थोड़े ही समय पश्चात मात्र इन बोर्ड परीक्षाओं के प्रावधान को नहीं हटा दिया गया बल्कि दसवीं कक्षा के लिए भी बोर्ड परीक्षा वैकल्पिक कर दी गयी. मानव संसाधनों के विकास के नाम पर देश में बहुत से प्रशिक्षण संस्थान तो मात्र कागजों में चल रहे हैं. देश में वाहन तो 75 टन से भी अधिक क्षमता के बनाए जा रहे हैं किन्तु सड़कें 20 टन के भी योग्य नहीं हैं. लगभग यही हाल बिजली, पेयजल, दूरसंचार, नगर नियोजन आदि का है. हमारी योजनाओं में सुसंगतता और परिपक्वता का भी नितांत अभाव है .

हमारे नेताओं को अब स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र को प्रशासकों या प्रशासनिक अधिकारियों के स्थान पर ऐसे प्रबंधकों की आवश्यकता है जो जन भावनाओं के अनुरूप कार्य कर सकें व जनता के सीमित साधनों के आधार पर सर्वोतम परिणाम दें. जनतंत्र में सभी लोक पदधारी जनता के ट्रस्टी होते हैं. एक ट्रस्टी का कर्तव्य अपने नियोक्ता की भावना और निर्देशों के अनुरूप कार्य करना होता है और ऐसा करने में उसे न तो कोई विवेकाधिकार है और न ही वह अपने कोई व्यक्तिगत विचार रखने की कोई छूट का उपयोग कर सकता बल्कि वह तो अपने नियोक्ता का प्रवक्ता होता है. जनतंत्र एक सतत संवाद वाली प्रक्रिया है जिसमें जन प्रतिनिधियों का यह कर्तव्य है कि वे सरकार की नीतियों के सम्बन्ध में जनता के विचार जानें और उन्हें सदन तक पहुंचाएं व उनके अनुरूप ही मतदान करें, चाहे उनके व्यक्तिगत विचार अथवा हित कुछ भी क्यों न हों क्योंकि उन्हें प्रतिनिधि की हैसियत में ही सदन में जाने का अधिकार है.

हमारा लोकतंत्र आज सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बंधक है, मतदान के अतिरिक्त जनता का कोई महत्व नहीं है. जनता की चीख पुकार के बावजूद भी हमारी संवेदनहीन सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है. बीकानेर में विश्वविद्यालय खोलने के लिए वर्ष 1973-74 में संभाग स्तर पर हड़ताल हुई थी किन्तु सरकार ने जनता की यह वाजिब मांग आखिर 31 वर्ष बाद 2005 में पूरी की है. स्वतंत्रता से पूर्व बीकानेर राज्य में अपना उच्च न्यायालय था उसे बंद कर दिया गया और आज मुकदमेबाजी व जनसंख्या दोनों बढ़ जाने के बावजूद देश के सबसे बड़े राज्य में अतिरिक्त बेंचें खोलने के मुद्दे पर सरकार राजनीति कर रही है जबकि राजस्थान से लगभग समान आबादी और कम क्षेत्रफल वाले मध्यप्रदेश राज्य में तीन बेंचें कार्यरत हैं.

सरकार एक ओर जहां पेयजल की आपूर्ति करने में असमर्थ है और नागरिकों को बिना पम्पों की सहायता के जल नहीं मिल पाता वहीं पानी खींचने के लिए पम्पों का उपयोग अपराध घोषित कर रखा है. सरकार का निशुल्क दवा और चिकित्सा का दावा भी खोखला है. विधान सभा की भी जानकारी में है कि 6 लाख आबादी वाली तहसील में 20 से अधिक सरकारी डॉक्टर कार्यरत हैं. वहां पूरे वर्ष में एक भी ऑपरेशन नहीं होता. डाक्टरों द्वारा यह बहाना बनाया जाता है कि निश्चेतक विशेषज्ञ के अभाव में ओपरेशन नहीं किये जा रहे हैं, वहीँ परिवार कल्याण के लक्ष्य प्राप्ति के लिए ओपरेशन किये जाते रहते हैं. आखिर सरकारी सेवा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों और राजनेताओं को प्रसन्न रखना-खुशामद करना मात्र पर्याप्त है, जनता की सेवा कोई मायने नहीं रखती है और न ही जनता की अप्रसन्नता कोई मायने रखती है. उचित भी हो सकता है, किसी भी कार्य के लिए प्रेरक बिंदु- सकारात्मक (प्रोत्साहन) या नकारत्मक (दंड)- होना आवश्यक है और आज की हमारी इस व्यवस्था में दोनों का ही लगभग अभाव है. अत: कोई भी सरकारी कर्मचारी जनता की सेवा करना अपना धर्म नहीं समझता है. कमोबेश यही स्थिति अन्य राज्यों की है बल्कि संभव है कुछ इससे भी आगे हों .

आज लोकपद तो जनता का शोषण करने और लूटने के लाइसेंस की तरह प्रयोग हो रहे हैं और शासन एक व्यापार की भांति संचालित है. अधिकाँश महत्वपूर्ण पदों पर दागी लोगों को बैठा दिया जाता है ताकि सत्तासीन लोग उनके पूर्व के दुराचरण के लिए उन्हें ब्लैकमेल करते रहें और उनसे मनपसंद कार्य करवाते रहें. सरकारी नियुक्तियां नीलाम हो रही हैं और कर्मचारियों के ट्रांसफर ने एक फलते-फूलते उद्योग का रूप ले लिया है. अत: ट्रांसफर के लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं बनायी जाती है. लगभग सरकारी कार्यालयों ने सत्ता की दलाली के केन्द्रों का रूप धारण कर लिया है. राजनेताओं को को भी इस स्थिति का स्पष्ट ज्ञान है और वे इसमें कोई मौलिक सुधार नहीं लाना चाहते अपितु तुष्टिकरण के तौर पर चुनाव से पूर्व प्रशासन आपके द्वार, प्रशासन आपके संग जैसे अभियान चलाते हैं. रिश्वत के सम्बन्ध में सरकारी कार्यालयों में एक बड़ी लोकप्रिय कहावत प्रचलित है कि वेतन तो वे पद का लेते हैं और जनता को काम निकलवाना हो तो पैसे देने ही पड़ेंगे. कहने को तो देश में जन समस्याओं के निराकरण के लिए कई न्यायालय, आयोग, कमेटियां, बोर्ड, मंच, विधायिकाएं आदि हैं किन्तु इनमें से प्रभावी और अचूक कोई नहीं है. आज अधिकाँश जन प्रतिनिधियों का आचरण निरंकुश तानाशाह जैसा है, और जो शेष हैं वे कायर है व उनका कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है. अब जनता की फ़रियाद सुनने के लिए कोई मंच शेष नहीं रह गया है जब जनता के किसी आवेदन की निर्धारित रसीद पुलिस थानों में तो क्या लोकसभा सचिवालय द्वारा भी नहीं दी जाती है. नीतिगत मामलों को भी जनप्रतिनिधियों की अनुमति के बिना सचिवों द्वारा ही निरस्त कर दिया जाता है. बस यूँ समझिये कि देश चल रहा है तो “आईसीयू” – विटामिन, ग्लूकोज, ओक्सिजन की कृत्रिम मदद के सहारे से.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.