/पटना के युवा कार्टूनिस्ट गौरव ने बनायी अपनी पहली फिल्म..

पटना के युवा कार्टूनिस्ट गौरव ने बनायी अपनी पहली फिल्म..

11 मिनट की शॉर्ट फिल्म है काश…थिंक बीफॉर एक्ट..  युवा मन को झकझोरती है फिल्म की कहानी..

-विवेकानंद सिंह||

आदमी जन्म लेता है. मां की गोद से लुढ़क कर चलना सीखता है, फिसलते-फिसलते जवान हो जाता है, संभलते-संभलते बूढ़ा और फिर लुढ़क कर इस दुनिया को अलविदा कह देता है. लेकिन हमारे बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इस नैसर्गिक जीवन-चक्र को बीच में ही तोड़ने का आत्मघाती निर्णय ले बैठते हैं. सही मायने में किसी भी रिश्ते से कहीं महत्वपूर्ण है, आपका होना. महानगरीय जीवन, तो ऐसे ही एक त्रासदी है. टॉल्सटॉय ने ठीक ही कहा है “शहर में कोई खुद को मृत समझ कर बहुत दिनों तक जीवित रह सकता है.” अचानक हमारे बीच से किसी जिंदादिल इनसान का यूं ही साथ छोड़ कर चले जाना हमें स्तब्ध तो करता ही है, साथ ही सोचने पर मजबूर भी कर देता है.think before you act

पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करते हुए पटना के युवा कार्टूनिस्ट गौरव ने अपनी पहली शॉर्ट फिल्म बनायी है, जिसका टाइटल है ‘काश’. लगभग 11 मिनट की इस फिल्म में एक ऐसे लड़के की कहानी है, जो गांव से शहर पढ़ने आता है. यहां की चकाचौंध और प्यार की जाल में फंस कर वह अपने जीवन की कहानी को पूर्णविराम देने का फैसला कर लेता है. अपने माता-पिता के नाम अपनी अंतिम चिट्ठी लिखते वक्त उसके जेहन में क्या-क्या ख्याल आते हैं और आखिरकार उसके साथ क्या होता है? यही फिल्म का मुख्य थीम है. फिल्म उन युवाओं को मोटिवेट करने का एक प्रयास है, जो अपने माता-पिता के त्याग और सपनों को भूल कर शहर के ग्लैमर में खो जाते हैं और आखिरकार एक याद बन कर रह जाते हैं. फिल्म 07 अगस्त, 2016 को यूट्यूब के जरीये रीलीज की गयी है.
गौरव अब तक पटना के प्रमुख अखबारों में कार्टूनिस्ट के रूप में काम कर चुके हैं, फिलहाल वे प्रभात खबर के साथ जुड़े हैं. समाचारपत्र में काम करने के साथ-साथ रंगमंच व नुक्कड़ नाटकों में गौरव की खासी दिलचस्पी है. फिल्म और फिल्मी दुनिया के सागर में डुबकी लगाते रहने में गौरव को बड़ा आनंद आता है, यही वजह रही कि गौरव ऑफिस के बाद बचे समय में अपनी फिल्म पर काम करते रहे. इस फिल्म में अभिनय करने के साथ-साथ, गौरव फिल्म के लेखक, निर्माता, निर्देशक भी हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.