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देशभक्ति की ओवरडोज़..

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-आरिफा एविस॥

नए भारत में देशभक्ति के मायने औए पैमाने बदल गये हैं. इसीलिए भारतीय संस्कृति की महान परम्परा का जितना प्रचार प्रसार भारत में किया जाता है शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो यह सब करता हो. सालभर ईद, होली, दीवाली, न्यू ईयर पर सद्भावना सम्मेलन, मिलन समारोह इत्यादि राजनीतिक पार्टियाँ करती रहती हैं ताकि दिन-रात जनता की आँखों से देशभक्ति धूमिल न हो. ये सब दिखावा नहीं है भाई, न ही ये सब व्यापार से जुड़ा है. इसका असली मकसद तो भाईचारा और देशभक्ति की सच्ची चाशनी में शुद्ध कानूनन मुनाफा कमाना है. देशभक्ति को सर्वोच्च मान्यता देकर, देशभक्त बाजार को अंतर्राष्ट्रीय मानवतावादी बाजार से जोड़ना है.indian-flag-full-hd-high-resolution-wallpapers
आज देशभक्ति की चाशनी में सरकारों के तमाम मुद्दे इसी देशभक्त बाजार को जिन्दा रखने के लिए अपनाये जाते हैं. क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते हैं कि राष्ट्र या देशभक्ति बाजार की मंडी में पैदा होती है. इसीलिए भाई मुर्ख मत बनो, सवाल मत उठाओ सरकार की हां में हां मिलाओ. देशभक्ति के बिना बाजार को नहीं बचाया जा सकता और बाजार के बिना देशभक्त नहीं बच सकते.
देशभक्ति की चाशनी में डूबे तमाम गुरु घंटाल तो भक्ति और देशभक्ति को हर चैनल, अखबार पर राष्ट्रीय गीत बनाकर गा रहे हैं. ठीक उसी तरह हमारे राष्ट्रीय त्यौहार गणतन्त्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर भी तिरंगे झंडे या देशभक्ति के प्रतिबिम्ब आजादी और देशभक्ति के नाम पर खरीदे बेचे जाने लगे हैं ताकि गरीबों को विकास की बुलट ट्रेन पर बैठाकर गरीबी को मिटाया जा सके.
वैसे भी आजादी को सेलेब्रेट करने का खुमार हर किसी पर छाया हुआ है और होना भी चाहिए. आजादी का जश्न मनाने के लिए तमाम तरह के उत्पाद खरीदों और अपनी देशभक्ति का प्रमाण दो. सरकारी व प्राइवेट स्तर पर होने वाले आयोजनों के लिए बाजार में सजाने से लेकर पहनावे के लिए कई नये आइटम मिल रहे हैं. पतंग, चूड़ी, बैंड, झंडा, टोपी, बैज, स्टिकर, टैटू और तमाम तरह के उत्पाद देशभक्ति की शान बने हुए हैं. अब आजादी या देशभक्ति रोज-रोज तो बिकती नहीं उसे विशेष अवसर पर बेचा जाता है. बेचने और खरीदने के लिए साल दर साल तैयारी करनी पड़ती है.
वैसे भी जो बिक नहीं सकता देशभक्त नहीं कहलायेगा. भारतीय क्रिकेट टीम हर साल बिकती है तभी तो देशभक्ति और भारतीय टीम एक दूसरे के पर्यायवाची बन चुके हैं. बाकि खेल-खिलाडी इस मामले में कम देशभक्त हैं. भारत के जल, जंगल, जमीन को बेचना देशभक्ति है इंसानियत बचाना इसके दायरे में नहीं. अमेरिका के आगे भीख मांगना देशभक्ति है. किसी भी कीमत पर नई आर्थिक नीति को लागू करना देशभक्ति है. दलितों को औकात दिखाना देशभक्ति है. महिलाओं को अपमानित करना और फतवे जारी करना देशभक्ति है.
भारत को आजाद हुए बहुत दिन हो गये लेकिन देशभक्ति का बाजार अभी भी टिका हुआ है. यही भारत की शान है.जब तक देशभक्ति जिन्दा है.  बाजार भी जिन्दा है और देशभक्त बनने के लिए किसी को मरना या मारना तो पड़ता है बोस! देशभक्ति जिन्दाबाद तो बाजार जिन्दाबाद.
देशभक्ति का खुमार तो लोगों को दो तीन दिन ही चढ़ता है. तिरंगे की खरीदारी से, खादी की आमदनी से करोडो का वारा-नारा होता है सभी नागनाथ सापनाथ जनप्रतिनिधियों में स्वतंत्रता दिवस को लेकर विशेष उत्साह दिख रहा है.यह समय लोगो को देशभक्ति की ओवर डोज देने का समय होता है. ताकि अगले साल तक नशा न उतरे. यदि नशा उतर गया तो बाजार बंद हो जायेगा. देश भक्ति नहीं बिकेगी.
सही माईनों में आजादी के इन 7 दशकों के बाद ही तमाम तरह की परेशानियाँ हल हुईं हैं. और जो गरीबी, बेरोजगारी, महगाई है उस पर सोचने व अमल करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. देशभक्ति है ना सब समस्या का हल. देशभक्ति को बेचने और खरीदने के लिए आजादी का होना जरूरी है. एक कवि ने क्या खूब कहा है-
“खंजर आजाद है सीनों में उतरने के लिए,
मौत आजाद है लाशों पे गुजरने के लिए.”
अब देशभक्त गरीबी, बेरोजगारी, बिना इलाज मरते लोग, किसानों का आत्महत्या करना, जाति-धर्म के नाम पर होने वाले दंगे और महिलाओं के साथ सांस्कृतिक ऊँचे दर्जे का व्यवहार, बलात्कार, भूर्ण हत्या अच्छी तरह से कर रहे हैं. उनको इसी की आजादी दी गयी है. यही आजादी मनाने का सच्चा  खेल है. इसे सिर्फ लालकिले पर झंडा फहराने और अपनी उपब्धियों को गिनाने का नाम नहीं दिया जा सकता.

 

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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