कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे [email protected] पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

बलूचिस्तान नहीं, पाकिस्तान की मदद..

0
Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

– हामिद मीर॥

यह अप्रैल 2014 का किस्सा है. एक जानलेवा हमले के बाद मुझे कराची के आगा ख़ान अस्पताल में भर्ती कराया गया था. कराची हवाईअड्डे से जिओ टीवी के दफ्तर जाने के दौरान मुझ पर हमला हुआ और छह गोलियां मेरे शरीर के भीतर धंस गईं थीं. चार निकाल दी गईं, लेकिन दो अब भी शरीर के भीतर धसी हुई थीं. मेरे पत्रकार साथी और परिजन मुझ पर हुए हमले के लिए साफ तौर पर आईएसआई के तत्कालीन मुखिया को दोषी करार दे रहे थे. दरअसल यह सच्चाई थी कि सुरक्षा एजेंसियां बलूचिस्तान में अंजाम दी जा रही गुमशुदगी और मानवाधिकार उल्लंघन पर मेरे नज़रिए से बेहद बौखलाई हुई थीं.Why Modi's statements should be the least of our worries on .

एक दिन वरिष्ठ बलूची मानवाधिकार कार्यकर्ता मामा कादिर बलूच मुझे अस्पताल में देखने आये. उन्होंने कहा- “हम जानते हैं, हमारे साथ हुई नाइंसाफ़ी के खिलाफ़ बोलने की कीमत आपको चुकानी पड़ी है. कई तरह की धमकियों के बावज़ूद आप बलूचिस्तान की खामोश आवाम की आवाज़ बन चुके हैं. हमारे पास आभार व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं. हम आपके लिए दुआओं के सिवाय कुछ भी नहीं कर सकते.” मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं था. आभार जताने के लिये मेरी आंखें भर आईं.

मामा कादिर की नम आँखें भी बरस गईं. उन्होंने कहा- लोग कहते हैं कि आई. एस. आई. ने मेरे बेटे को मार डाला, इसलिये मैं सड़कों पर उतरा. लेकिन हामिद मीर को क्या परेशानी है? वे क्यों बलूचिस्तान के गुमशुदा लोगों के लिए लड़ रहे हैं? कमजोर आवाज़ में मैंने मामा कादिर से कहा कि गुमशुदा लोगों के मसले पर क्वेटा से इस्लामाबाद तक किए आपके ऐतिहासिक मार्च के तथ्य और पृष्ठभूमि का
ब्यौरा पेश करना मेरा कर्तव्य था.

दूसरी बात यह कि गुमशुदा लोगों का दर्द मुझे मेरी दिवंगत माँ से विरासत में मिला. 1947 में मेरी मां ने परिवार के कई सदस्यों को खो दिया. दंगाइयों ने मेरी नानी को अगवा कर लिया. वे दंगाई जम्मू से सियालकोट कूच कर रहे शरणार्थियों के काफिले पर हमला कर चुके थे. मेरी मां ने अपने रिश्तेदारों के शवों के बीच छुप कर किसी तरह अपनी जान बचाई थी. मेरे नाना ने अपनी पत्नी की तलाश की हरसंभव कोशिश की. लेकिन वे असफल रहे. मैंने अपनी माँ को अपनी मां की वापसी की प्रार्थना करते अनेक दरगाहों पर फूट फूटकर रोते देखा है. बस, यहीं से मेरे दिल में गुमशुदा लोगों के लिए एक दर्द घर कर गया. मामा कादिर बलूच ने दाहिने हाथ से आंसू पोछते हुए कहा- “ओह! यह तो कश्मीर और बलूचिस्तान के बीच दर्द का बेनज़ीर रिश्ता है.” मैंने कहा कि आपके नज़रिए में दर्द का रिश्ता हो सकता है लेकिन हम कश्मीर और बलूचिस्तान में तुलना नहीं कर सकते.

जब भी मैं बलूचिस्तान में नाइंसाफ़ी पर कुछ बोलता या लिखता, कुछ स्वयंभू देशभक्त और पाकिस्तानी मीडिया के सरकार समर्थक नुमाइंदे यह कहते हुये ज़हर उगलने लगते कि मैं बलूचिस्तान पर तो बोल रहा हूं लेकिन कश्मीर पर चुप हूं. हामिद मीर हिन्दुस्तानी एजेंट है- यह उनका अंतिम हथियार होता था. मैं हमेशा इस बात का पक्षधर रहा हूं कि कश्मीर और बलूचिस्तान में कोई तुलना नहीं हो सकती.

पाकिस्तानी हुकूमत बलूचिस्तान में बगावत की आवाज़ को दबाने के लिये अक्सर ‘इंडिया कार्ड’ का इस्तेमाल करती है. मैंने भी बलूचिस्तान में विदेशी दखलंदाज़ी पर सवाल उठाये थे लेकिन मेरे सवाल के केंद्र में केवल भारत नहीं था. कई बार मैंने बलुचिस्तान में अमरीका की दिलचस्पी को समझने की कोशिश की.

द हिन्दू में लिखे एक लेख में मैंने यह दावा किया था, भारत के बलूचिस्तान कार्ड को खुलकर खेलने की संभावना कम है, क्योंकि “मुद्दे की संवेदनशीलता की समस्या को ध्यान में रखते हुए भारत के लिए बलूची बगावत का खुलकर समर्थन करना मुश्किल होगा क्योंकि यह ईरान के साथ उसके संबंधों को नुकसान पहुँचा सकता है. अगर भारतीय बीएलए के समर्थन में खुलकर सामने आते हैं तो पाकिस्तान में मौजूद भारत विरोधी तत्व तत्काल ईरान के विरूद्ध अमरीका के तथाकथित बड़े खेल के
द्वारा नई दिल्ली की घेराबंदी करेंगे”.

मैं 2009 में सही था क्योंकि तब मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे. आज मैं गलत हूँ क्योंकि अब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं. शायद प्रधानमंत्री मोदी इस बात से अनभिज्ञ हैं कि अनेक बलूची लड़ाका संगठन पाकिस्तानी बलूचिस्तान को ईरान के सिस्तान-ओ-बलूचिस्तान प्रांत के कई ईलाकों के साथ एकजुट करना चाहते हैं. ये वही इलाका है जहां भारत चाबाहर पोर्ट बना रहा है.

प्रधानमंत्री मोदी को यह मालूम होना चाहिए कि पाकिस्तानी बलूचिस्तान में सक्रिय बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए), ईरानी बलूचिस्तान में जड़े जमाये जिंदुल्लाह और जैशुल अद्ल की सहयोगी हैं. अमरीकी लेखक मार्क पेरी ने जनवरी 2012 की फॉरेन पॉलिसी मैग्जीन में दावा किया है कि इज़रायली खुफिया एजेंसी मोसाद के एजेंट, सीआईए के नुमाइंदे बनकर पाकिस्तान में बलूची नौजवान तैनात कर ईरानी बलूचिस्तान को अस्थिर करने की
साजिश रच रहे हैं.

अमरीकी मीडिया जिंदुल्लाह से जैशुल का रिश्ता बहुत साल पहले ही उज़ागर कर चुकी है और उसके बाद ही ईरानी खुफ़िया एजेंसी ने बलूच क्षेत्रों में अफ़गान, तालिबान और अलकायदा से रिश्ते मजबूत किए जिससे कि उसके बलूच इलाकों में सीआईए समर्थित बगावत का मुकाबला किया जा सके.

मोदी को पता होना चाहिए कि “आजाद बलूचिस्तान” के हिमायती उस बलूच राज्य को पुनर्जीवित करना चाहते हैं जिसे एक समय अफ़गान के अहमद शाह अब्दाली और कलात के खान मीर नसीर खान बलूच के 1758 में हुए समझौते के तहत मान्यता दी गई थी. इस समझौते ने क्वेटा से लेकर वर्तमान ईरानी बलूचिस्तान के बंदर अब्बास समेत कई इलाकों को कलात के शासन के अंतर्गत मान्यता दी. मीर नसीर खान बलूच ने अहमद शाह अब्दाली को 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में हिंदू मराठाओं और 1769 में मशहद की लड़ाई में ईरानी साफविद साम्राज्य के विरुद्ध समर्थन दिया

प्रधानमंत्री मोदी को 1919 के जलियांवाला बाग के लिए कुख्यात जनरल डायर की पुस्तक- रेडर्स ऑफ द सरहद पढ़नी चाहिए. ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें 1916 में बलूची आदिवासियों की बगावत को कुचलने भेजा था जो उस समय जर्मनी की मदद से ब्रिटिश बलूचिस्तान और ईरानी बलूचिस्तान के साथ अलग स्टेट बनाने के इच्छुक थे.

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तानी बलूचिस्तान में सक्रिय अलगाववादियों की सीधी मदद करने की कोशिश की, साथ ही में उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर उन्होंने उन बलूच लड़ाकुओं को ताकत भी दी है जो ईरान से अलग होना चाहते हैं.
बलूचिस्तान कार्ड के जरिये मोदी ने दरअसल जम्मू कश्मीर से ध्यान भटकाना चाहा है. लेकिन मुझे लगता है ऐसा कर के उन्होने पाकिस्तानी हुकूमत की मदद की है. बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में 8 अगस्त को हुए बम विस्फोट जिसमें कुछ जाने-माने वकीलों समेत 60 लोगों की मौत हो गई थी, के बाद से पाकिस्तान के सत्तारूढ़ गठबंधन में बुरी तरह से फूट पड़ी हुई थी.

बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री ने इसके लिए रॉ को जिम्मेदार ठहराया था लेकिन आईएसआईएस और टीटीपी से टूटे हुए एक गुट ने इसकी जिम्मेवारी ली थी. पख्तूनख्वा मिली आवामी पार्टी के अध्यक्ष महमूद खान अचकज़ई ने पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों को संसद में इस बात के लिए लताड़ा था कि वे अपनी विफलता के लिए रॉ को जिम्मेवार नहीं ठहरा सकते.

अचकज़ई नवाज़ शरीफ के सहयोगी हैं. उनके बड़े भाई बलूचिस्तान के गवर्नर हैं. उनके भाषण ने सैन्य नेतृत्व को नाराज़ कर दिया और आंतरिक मंत्री चौधरी निसार अली खान ने अचकज़ई से नाराज़ जनरलों को शांत कराने के लिए अचकज़ई की निंदा की. अचकज़ई नवाज़ शरीफ के खिलाफ बगावत करने के लिए तैयार थे लेकिन 15 अगस्त को मोदी के भाषण ने पूरा परिदृश्य ही बदल दिया. अब अचकज़ई बचाव की मुद्रा में हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के भारत विरोधी तत्वों को एक बड़ा मौका दिया कि वह बलूचिस्तान में भारतीय हस्तक्षेप पर रोना-पीटना मचाये. पश्चिमी राजधानियों में बैठे कुछ बलूची अलगाववादियों ने प्रधानमंत्री मोदी का आभार जताया लेकिन बलूचिस्तान में मौजूद किसी भी अलगाववादी बलूच नेता ने मोदी को धन्यवाद नहीं कहा.

बलूचिस्तान, मुजफ्फराबाद और गिलगित में भारत के खिलाफ जुलूस प्रदर्शन हुए क्योंकि मोदी ने इन इलाकों के लोगों का आभार जताया था. पाकिस्तानी कश्मीर और गिलगित में कोई बगावत नहीं है, लिहाजा भारतीय मीडिया इन इलाकों में किसी भी बागी की सक्रियता का दावा नहीं कर सकता जो कि दिल्ली के साथ विलय करने का पक्षधर हो. क्या प्रधानमंत्री मोदी इस भयंकर भूल को समझेंगे. क्या वे कश्मीर और बलूचिस्तान में फर्क समझ पाएंगे.

सैय्यद अली शाह गिलानी और आसिया अंद्राबी जैसे हुर्रियत नेताओं और उनके समर्थकों ने खुलेआम श्रीनगर में पाकिस्तानी झंडा फहराया. हमने बलूचिस्तान के किसी भी शहर में भारतीय झंडे को फहराते हुए नहीं देखा है. कोई यह कह सकता है कि बलूच अलगाववादियों के पास अपना एक झंडा है, और उन्हें भारत के झंडे की जरूरत नहीं है. यह एक वाजिब तर्क है.

यहां एक दूसरा मुद्दा भी है, मीर वाइज़ उमर फारुख और यासिन मलिक जैसे हुर्रियत नेता श्रीनगर में मौजूद हैं. कुछ अपने घर में नजरबंद हैं तो कुछ जेलों में पड़े हुए हैं. वो जेल जाने में झिझकते नहीं है. उन में से कई देशद्रोह से लेकर आतंकवाद तक के आरोप झेल रहे हैं. कोई भी हुर्रियत नेता पश्चिमी राजधानियों से अपना कामकाज संचालित नहीं कर रहा है. इसके उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देने वाले अलगाववादी बलूच नेता पश्चिम राजधानियों में बैठे हुए हैं. वे जमीनी स्तर पर मौजूद नहीं हैं क्योंकि उनके पास अपना जनाधार नहीं है. इसका मतलब यह नहीं है कि बलूचिस्तान में कोई समस्या ही नहीं है.

बलूच नौजवानो का एक बड़ा तबका इस्लामाबाद से खुश नहीं है लेकिन वे अपना अधिकार पाकिस्तानी सरपरस्ती में ही चाहते हैं. वे इस बात को समझते हैं कि बलूच आबादी पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान, ओमान और यूएई में बंटी हुई है. ऐसे में यह मुश्किल है कि इन पाँचों देशों को तोड़ कर एक अलग नया देश बनाया जा सके. वे इस बात को समझते हैं कि कश्मीर को लेकर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा समिति का प्रस्ताव है जबकि बलूचिस्तान को लेकर ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है.

भारत ने कश्मीर को संविधान की धारा 370 के तहत विशेष दर्जा दिया है लेकिन पाकिस्तान के संविधान की धारा 2 के तहत बलूचिस्तान को जम्मू-कश्मीर की तरह का कोई दर्जा हासिल नहीं है. इसे पंजाब, सिंध और खैबर-पख्तूनख्वा की तरह ही अलग प्रांत का दर्जा प्राप्त है.

भारत में बहुत सारे लोग ये दावा करते हैं कि पाकिस्तान ने 1948 में बलपूर्वक बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया था लेकिन तथ्य इस तरह के किस्से कहानियों से अलग हैं. 1947 मे चार प्रिंसली स्टेट थे जहां बलूच शासकों का साम्राज्य था. बलूच आदिवासी इलाके और क्वेटा नगर निगम की अपनी अपनी स्वतंत्र पहचान थी. सबसे पहले आदिवासी जिरगा (54 सदस्यीय) और क्वेटा नगर निगम (हिंदू और सिखों समेत 10 सदस्य) ने 29 जून 1947 को मतदान के जरिए पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय लिया.

पाकिस्तान के लिए मतदान करने वाले आदिवासी नेताओं में नवाब अकबर बुगती भी शामिल थे जो प्रधानमँत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देने वाले ब्रह्मदाग बुगती के दादा थे. मकरान, खरान और लसबेला प्रिंसली स्टेट ने 1947 पाकिस्तान के साथ जुड़ने का फैसला किया.

कलात के खनाते ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र बने रहने की घोषणा की और पाकिस्तान के साथ एक नए रिश्ते को धरातल पर लाने के लिए समझौता वार्ता शुरु की. यह स्टेट 26 मार्च 1948 तक स्वतंत्र रहे, 27 मार्च 1948 को ऑल इंडिया रेडियो की एक छोटी सी खबर ने कलात के खान लोगों में अफरातफरी का माहौल पैदा कर दिया. ऑल इंडिया रेडियो ने प्रिंससी राज्यों के साथ सौदेबाजे करने के लिए अधिकृत वीपी मेनन की एक छोटी सी खबर प्रसारित की थी.

उन्होंने यह दावा किया था का कलात के खान भारत में जुड़ना चाहते हैं लेकिन भारत सरकार की दिलचस्पी इसमें नहीं है. शायद वह कश्मीर मामले में पाकिस्तान को ब्लैकमेल करना चाहते थे लेकिन उनका यह बयान उल्टा पड़ गया. कलात के खान ने उसी दिन तत्काल पाकिस्तान के साथ जाने की घोषणा की जिससे वह ये साबित कर सकें कि उनका भारत के साथ कोई रिश्तां नहीं है. उसी दिन पाकिस्तानी सेना कलात की सड़कों पर आ गई और इस तरह कलात अपने पूर्ववर्ती विधिक सलाहकार मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा शासित देश पाकिस्तान का हिस्सा बन गया.

यह दिलचस्प है कि गवादर 1958 तक पाकिस्तान का हिस्सा नहीं था. यह ओमान का भाग था. प्रधानमंत्री मलिक फिरोज़ खान नून के नेतृत्व वाली एक कमजोर असैन्य सरकार ने 1958 में ओमान के साथ एक समझौता किया और गवादर पाकिस्तान का हिस्सा बना. नवाब अकबर बुगती उस समय रक्षामंत्री थे. लेकिन इस समझौते के कुछ दिन के भीतर ही जनरल अय्यूब खान ने पाकिस्तान में मार्शल लॉ लागू कर दिया और बुगती को जेल में डाल दिया गया.

बलूचिस्तान में बगावत की शुरुआत अय्यूब के दौर में ही हुई. किसी ने भी 1960 और 1970 तक किसी ने भी बलूचिस्तान में गड़बड़ियों के लिए भारत पर उंगलवी नहीं उठाई. पाकिस्तानी हुकूमत ने बलूच में बगावत के लिए हमेशा अफगानिस्तान और पूर्व सोवियत गणराज्य को जिम्मेदार माना. यह समस्या तब थोड़ी कम हो गई जब जनरल जिया उल हक के सैन्य शासन काल में कई बलूच नेताओं को रिहा किया गया. लेकिन एक बार फिर 2006 में जनरल मुशर्रफ ने अकबर बुगती की हत्या कर के बलूची बगावत को एक शहीद दे दिया.

नवाब अकबर बुगती हमेशा से बलूचिस्तान को राजनीतिक और आर्थिक अधिकार दिलाने की पैरवी करते थे. वह खनिज संसाधनों एवं तटीय इलाकों पर प्रांतीय अधिकार चाहते थे. उन्होंने कभी स्वतंत्र बलूचिस्तान की मांग नहीं की.

लेकिन पाकिस्तानी हुक्मरानों की बड़ी गलतियों के कारण ब्रहमदाग बुगती, हरबयार मुर्री, डा. अल्लाह नज़र बलूच जैसे अनेक अलगाववादी नेता पैदा हो गए. सिर्फ डा. अल्लाह नज़र बलूच बलूचिस्तान के तटीय इलाकों में कहीं छिपे हैं क्योंकि वे किसी भी कबीलाई सरदार के बेटे नहीं हैं और वे एक चिकित्सक हैं और लेनिन और चे ग्वेरा के समर्थक हैं. बाकी अलगाववादी नेता पश्चिमी देशों में आरामदायक जीवन जी रहे हैं.

मेरी जानकारी के अनुसार कई अलगाववादी बलूच नेताओं को संपर्क कर प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का समर्थन करने के लिए कहा गया था. कुछ ने यह बात मान ली लेकिन कईयों ने यह कहते हुए इस सुझाव को ठुकरा दिया कि हम भारत के साथ अपने रिश्तों को पाकिस्तान के समक्ष खुले रूप से स्वीकार कर उसे प्रत्यक्ष प्रमाण क्यों दें?

कश्मीर और बलूचिस्तान में एक और बहुत बड़ा अंतर है. अधिकांश कश्मीरी लोग कश्मीर में ही रहते हैं जबकि बलूच आबादी पाकिस्तान के किसी एक प्रांत में नहीं बसती है. बलूच बहुसंख्य इलाका डेरा गाज़ी ख़ान पहले कलात का हिस्सा था लेकिन महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत पहले इस इलाके को जबरन सिख बहुल पंजाब में मिला लिया.

ज़ाकोबाबाद (खानगढ़) भी बलूच का हिस्सा था, जिसे मीर नसीर ख़ान द्वितीय ने कैंटोनमेंट एरिया बनाने के नाम पर इसे 1854 में ईस्ट इंडिया कंपनी के सुपुर्द कर दिया, अब ज़ाकोबाबाद सिंध प्रान्त का हिस्सा है. बलूच जनजातियां सभी चार पाकिस्तानी प्रांतों में फैली हुई हैं. पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति फारुख खान लेघारी बलूच आदिवासी सरदार थे लेकिन उनका ताल्लुक पंजाब से था.

पूर्व प्रधानमंत्री मीर बल्ख शेर मज़ारी भी एक बलूच आदिवासी सरदार थे लेकिन वह भी पंजाब से थे. पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और पूर्व प्रधानमंत्री गुलाम मुस्तफा जतोई भी मूलतः बलूच हैं लेकिन वे सिंध से जुड़े हुए हैं. अख्तर मेंगल जैसे बीएनपी के नेता और कुछ राष्ट्रवादी संगठन बलूच बहुल पंजाब के हिस्सों के बलूचिस्तान में विलय की मांग कर रहे हैं लेकिन वे पाकिस्तान के चारों बलूच बहुल प्रांतों को तोड़ कर एक अलग बलूच प्रांत बनाने के पक्षधर नहीं है.

बलूचिस्तान की सबसे बड़ी समस्या गरीबी और बेरोज़गारी है. वे समान हक़ चाहते हैं, यह जम्मू-कश्मीर जैसा मसला नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने ग़लत तरीके से कश्मीर और बलूचिस्तान की तुलना की. मैं सोचता हूं कि उन्होंने पाकिस्तान की कश्मीरियों के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक अभियान चलाने की मुहिम को न्यायसंगत ठहरा दिया है क्योंकि मोदी ने बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के लिये एक कूटनीतिक अभियान की शुरुआत की है.

दुर्भाग्य से भारतीय प्रधानमंत्री मोदी के विवादित बयान से अंततः बलूचिस्तान के लोगों का नुकसान ही हुआ है और इसका फायदा पाकिस्तानी हुक्मरानों को हुआ है. इसके साथ ही पाकिस्तानी हुक्मरानों को उन्होंने एक कारण उपलब्ध करा दिया है कि वे बलूचिस्तान में अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वालों की आवाज़ दबा दें. अब मामा कादीर बलूच जैसे लोगों के लिये, लापता कर दिये गये नौजवानों के पक्ष में सड़क पर उतर जाना मुश्किल होगा.

मैंने या आसमां जहांगीर जैसे लोगों ने कभी बलूचिस्तान की आज़ादी का समर्थन नहीं किया. लेकिन फिर भी हमें केवल इसलिये भारतीय एजेंट क़रार दे दिया गया क्योंकि हमने बलूचिस्तान को समान अधिकार देने की मांग की.

जरा अंदाजा लगाइये कि मेरे या बाकी लोगों के लिए, बलूचिस्तान की आवाम के अधिकारों के लिए बोलना कितना कठिन होगा? जो भी आवाज़ उठाएगा, उसे भारतीय एजेंट करार दिया जाएगा. मुझे यह कहने के लिये माफ करें कि प्रधानमंत्री मोदी ने दरअसल बलूचिस्तान में पाकिस्तानी हुकूमत को मज़बूती दी और इसलिए ही वहां के पाकिस्तानी हुकूमत समर्थक गृह मंत्री ने खुले आम मोदी का आभार जताया कि मोदी ने बलूच में भारतीय दखल के ‘सबूत’ उपलब्ध करा दिये. यह ‘सबूत’ मोदी का भाषण है.

यह तो वक्त ही साबित करेगा कि यह भाषण मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक गलतियों में से एक है. अब पाकिस्तान में होने वाली अगामी सार्क बैठक में प्रधानमंत्री मोदी का गर्मजोशी से स्वागत करना नवाज शरीफ के लिये मुश्किल भरा होगा. कई राजनीतिक और धार्मिक पार्टियां, मोदी के खिलाफ प्रदर्शन की तैयारी कर रही हैं. ऐसी हालत में अगर मोदी पाकिस्तान नहीं आते हैं तो इसका लाभ किसे मिलेगा? ज़ाहिर है, भारत के साथ शांति संबंध स्थापित करने का विरोध करने वालों को ही इसका लाभ मिलेगा और अंततः यह अवसर उपलब्ध कराने के लिये केवल और केवल मोदी जिम्मेवार होंगे.

Facebook Comments
Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
Share.

About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

%d bloggers like this: