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“मोदी ब्रांड” का मिसयूज कर रहे हैं एलजी, दिल्ली भाजपा नेता और राजनाथ सिंह..

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-देवेंद्र शास्त्री॥
दिल्ली में आप सरकार के काम और उसके परिणामों से भाजपा और कांग्रेस की दिल्ली लीडरशिप बोखला गई है। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि क्या किया जाए। दोनों पार्टियों की लीडरशिप एक बात पर सहमत हैं कि किसी तरह आप सरकार के कामकाज के सिलसिले को रोका जाए। वरना अगले चुनाव से गए और “ईमानदार सरकार” का रोग दूसरे राज्यों में फैल सकता है। कांग्रेस और भाजपा के इसी साझा दर्द की दवा बने हुए हैं नजीब जंग। पर इस चक्कर में जंग दिल्ली की जनता और प्रजातांत्रिक ढांचे को बड़ा भारी नुकसान पहुंचा रहे। यह सब दिल्ली ही नहीं दूसरे शहरों के लोग भी देख रहे हैं।Narendra Modi

नजीब ने दिल्ली सरकार के दो ऐसे अधिकारियों को हटाया है जो सरकार के मुताबिक बेहतर काम कर रहे थे। उनके स्थान पर जबरन ऐसे अधिकारी नियुक्त किए हैं जिनको दिल्ली सरकार नहीं चाहती। नजीब की ये वैसी ही हरकत है जिसमें गुंडा लड़की को छेड़े। विरोध करने पर उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दे। घर वाले विरोध करें तो गुंडा घर में घुस कर मारपीट और तोड़फोड़ मचा कर चला जाए। यह कौन सी व्यवस्था है कि जिन्हें अधिकारी से काम कराना है, उन्हें पूछा ही नहीं जा रहा कि भाई फलां अधिकारी आप रखना चाहते हैं या नहीं?

भाजपा और कांग्रेस एक बात नहीं समझ पा रही हैं। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और आप पार्टी इसलिए काबिज हुए क्योंकि उनकी दिल्ली लीडरशिप बेहद नाकारा है। न अक्ल है और ना ही परसनालिटी। उनमें एक भी नेता ऐसा नहीं है जिसे देख कर दिल्ली के लोग उम्मीद बांध सकें। पर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा सरकार है तो दिल्ली पुलिस, होम मिनिस्टरी के थ्रू एलजी का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्हें इस बात का होश ही नहीं है कि वो दिल्ली में अपनी बेवकूफियों से ” मोदी ब्रांड” को कितना भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

कांग्रेस के लिए तो यह एक तीर से दो शिकार जैसी स्थिति है। पर भाजपा की सबसे कीमती चीज “मोदी ब्रांड” दांव पर हैं। वो भी एक शहर दिल्ली के चक्कर में। मोदीजी को इस बात का अहसास उस दिन होगा जब वो ये पूछ रहे होंगे कि उन्होंने बड़ी ईमानदारी से काम किया लेकिन लोग अब सार्वजनिक मंचों पर उनके सवालों पर मौन क्यों रह जाते हैं…

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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