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सीवान, शहाबुद्दीन और एक हताश पिता का संघर्ष..

By   /  September 11, 2016  /  No Comments

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90 के दशक की शुरुआत में सीवान की एक नई पहचान बनी.वजह बाहुबली नेता शहाबुद्दीन थे.. वे अपराध की दुनिया से राजनीति में आए थे. 1987 में पहली बार विधायक बने और लगभग उसी समय जमशेदपुर में हुए एक तिहरे हत्याकांड से उनका नाम अपराध की दुनिया में मजबूती से उछला.. जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कॉमरेड चंद्रशेखर की हत्या, एसपी सिंघल पर गोली चलाने से लेकर तेजाब कांड जैसे चर्चित कांडों के सूत्रधार वही माने गए.. उसी चर्चित तेजाब कांड पर फैसला आया तो सीवान और बिहार के दूसरे हिस्से में रहने वाले लोगों के जेहन में 12 साल पुराने इस खौफनाक घटना की याद जिंदा हो उठी..

फरवरी के पहले सप्ताह में एक खबर आई कि शहाबुद्दीन को बहुचर्चित तेजाब कांड में जमानत मिल गई है. शहाबुद्दीन, सीवान और तेजाब कांड, तीनों का नाम एक साथ सामने आते ही बिहारवासियों के जेहन में कई खौफनाक यादें ताजा हो उठती हैं. बिहार के सीमाई इलाके में बसे सीवान जिले को कई वजहों से जाना जा सकता था; भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जन्मस्थली होने की वजह से, रेमिटेंस मनी (विदेश में बसे भारतीय कामगारों की ओर से भेजी गई रकम) में बिहार का सबसे अव्वल जिला रहने की वजह से भी. कई और विभूतियों की वजह से भी सीवान की पहचान रही. हालांकि 90 के दशक की शुरुआत में सीवान की एक नई पहचान बनी. वजह बाहुबली नेता शहाबुद्दीन थे. जिस जीरादेई में राजेंद्र प्रसाद का जन्म हुआ था, उस इलाके से पहली बार विधायक बनकर शहाबुद्दीन ने राजनीति में कदम रखा था और कई बार सांसद-विधायक रहे. लेकिन शहाबुद्दीन इस वजह से नहीं जाने गए. वे अपराध की दुनिया से राजनीति में आए थे. 1987 में पहली बार विधायक बने और लगभग उसी समय जमशेदपुर में हुए एक तिहरे हत्याकांड से उनका नाम अपराध की दुनिया में मजबूती से उछला. उसके बाद तो एक-एक कर करीब तीन दर्जन मामलों में उनका नाम आता रहा. जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कॉमरेड चंद्रशेखर की हत्या, एसपी सिंघल पर गोली चलाने से लेकर तेजाब कांड जैसे चर्चित कांडों के सूत्रधार वही माने गए. उसी चर्चित तेजाब कांड पर फैसला आया तो सीवान और बिहार के दूसरे हिस्से में रहने वाले लोगों के जेहन में 12 साल पुराने इस खौफनाक घटना की याद जिंदा हो उठी.

2004 में 16 अगस्त को अंजाम दिए गए इस दोहरे हत्याकांड में सीवान के एक व्यवसायी चंद्रकेश्वर उर्फ चंदा बाबू के दो बेटों सतीश राज (23) और गिरीश राज (18) को अपहरण के बाद तेजाब से नहला दिया गया था, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी. इस हत्याकांड के चश्मदीद गवाह चंदा बाबू के सबसे बड़े बेटे राजीव रोशन (36) थे. मामले की सुनवाई के दौरान 16 जून, 2014 को राजीव की भी हत्या कर दी गई. इसके ठीक तीन दिन बाद राजीव को इस मामले में गवाही के लिए कोर्ट में हाजिर होना था. चंदा बाबू और उनकी पत्नी कलावती देवी अब अपने एकमात्र जीवित और विकलांग बेटे नीतीश (27) के सहारे अपनी बची हुई जिंदगी काट रहे हैं. पिछले साल दिसंबर में ही सीवान की एक स्थानीय अदालत ने इस हत्याकांड में राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन के अलावा तीन अन्य लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.chanda-babu

शहाबुद्दीन को इस मामले में जमानत मिलने के चार-पांच दिन बाद चंदा बाबू से इस सिलसिले में फोन पर बातचीत हुई. शाम के कोई सात बजे होंगे. उधर से एक उदास-सी आवाज थी. पूछा- चंदा बाबू बोल रहे हैं? जवाब मिला- हां..! ‘हां’ सुनकर मन में संकोच और हिचक का भाव भर गया. सोचता रहा कि पूरी तरह से बिखर चुके और लगभग खत्म हो चुके एक परिवार के टूटे हुए मुखिया से बात कहां से शुरू करूं. बात सूचना देने के अंदाज में शुरू हुई. मैंने बताया, ‘चंदा बाबू! सूचना मिली है कि आपके केस को सुप्रीम कोर्ट में देखने को प्रशांत भूषण तैयार हुए हैं.’ चंदा बाबू कहते हैं कि हम तो नहीं जानते! फिर पूछते हैं- प्रशांत भूषण जी कौन हैं? मैंने उन्हें बताया कि देश के बड़े वकील हैं.

यह बात जानकर चंदा बाबू की आवाज फिर उदासी से भर उठती है. वे कहते हैं, ‘देखीं! केहू केस लड़ सकत बा तऽ लड़े बाकि हमरा पास ना तो अब केस लड़े खातिर सामर्थ्य बा, न धैर्य, न धन, न हिम्मत.’ यह कहने के बाद एक खामोशी-सी छा जाती है. थोड़ी देर बाद बातचीत का सिलसिला शुरू होता है. बात अभी शुरू होती है कि चंदा बाबू अतीत के पन्ने पलटने लगते हैं. कहानी इतनी लंबी और इतनी दर्दनाक है कि बताते-बताते कई बार चंदा बाबू रुआंसे होते हैं. उनकी आवाज में उतार-चढ़ाव आसानी से महसूस किए जा सकते हैं. वे गुस्से में भी आते हैं और उनकी दर्दनाक दास्तान सुनते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं. जब चंदा बाबू अपनी व्यथा कहते हैं तो कई बार या कहें कि बार-बार ऐसा लगता है कि वे अपनी कहानी सबको बताना चाहते हैं. पूरे देश को कि कैसे वे व्यवस्था से, शासन से, खुद से हार चुके हैं. आगे चंदा बाबू के कानूनी संघर्ष और साहस की कहानी उन्हीं की जुबानी:

‘देखीं! केहू केस लड़ सकत बा तऽ लड़े, बाकि हमरा पास न तो अब केस लड़े खातिर सामर्थ्य बा, न धैर्य, न धन, न हिम्मत’
निराश चंदा बाबू और उनकी पत्नी कलावती देवी अब अपने विकलांग बेटे के सहारे बची हुई जिंदगी काट रहे हैं. 2004 में उनके दो बेटों को तेजाब से नहलाकर मार दिया गया. इस हत्याकांड के चश्मदीद गवाह रहे सबसे बड़े बेटे की हत्या भी 2014 में कर दी गई.shahabuddin-with-lalu-yadav
हमारी कहानी सुनना चाहते हैं तो हम सुना सकते हैं, आपमें संवेदना होगी तो आप शायद एक बार में पूरी कहानी नहीं सुन सकेंगे. आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. आप मुकदमे में शहाबुद्दीन को मिली जमानत के बारे में सवाल पूछ रहे हैं. इस बारे में जितना आपको मालूम है, उतना ही मुझे मालूम है कि शहाबुद्दीन को हाई कोर्ट से जमानत मिल गई. मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ. अब ऐसी बातों से दुख भी नहीं होता. जिंदगी में इतने बड़े-बड़े दुख देख लिए कि अब ऐसे दुख विचलित नहीं करते. अब मैं इसे जीत-हार के रूप में भी नहीं देखता, क्योंकि जिंदगी में सब जगह, सब कुछ तो हार चुका हूं. शहाबुद्दीन को जमानत मिलना तय था. यह 16 जून, 2014 को ही तय हो गया था कि अब आगे का रास्ता साफ हो गया. उस दिन मेरे बेटे राजीव की सरेआम हत्या हुई थी. राजीव को 19 जून को अदालत में गवाही देनी थी. वह इकलौता चश्मदीद गवाह था, गवाही के तीन दिन पहले घेरकर उसे मारा गया तभी यह बात साफ हो गई थी. और उसी दिन से मैंने इन बातों पर ध्यान देना बंद कर दिया कि अब मामले में क्या होगा. मैं अब क्यों जिज्ञासा रखता कि मेरे बेटों की हत्या के मामले में क्या हो रहा है? जब सब कुछ चला ही गया जिंदगी से और कुछ लौटकर नहीं आने वाला तो क्यों लड़ूं, किसके लिए लडू़ं. अब एक विकलांग बेटा है, बीमार पत्नी है और खुद 67 साल की उम्र में पहुंचकर जिंदगी की गाड़ी ढोता हुआ इंसान हूं तो कैसे लड़ूंगा, किसके सहारे लड़ूंगा. लड़ तो रहा ही था अपने दो बेटों की हत्या का बदला लेने के लिए. मेरा बेटा राजीव लड़ रहा था अपने भाइयों की हत्या का बदला लेने के लिए. राजीव मेरा सबसे बड़ा बेटा था, लेकिन 16 जून, 2014 को उसे भी मारकर मेरे लड़ने की सारी ताकत खत्म कर दी गई. राजीव को शादी के ठीक 18 दिन बाद मार डाला गया. शाम 7:30 बजे उसे गोली मारी गई थी. इसके पहले 2004 में मेरे दो बेटों को तेजाब से नहलाकर मारा जा चुका था. राजीव से पहले जब मेरे दो बेटों गिरीश और सतीश को मारा गया था, तब एक की उम्र 23 और दूसरे की 18 साल थी. जब राजीव भी मारा गया तो मैंने कुछ नहीं किया. राजीव के क्रिया-कर्म के समय ही गिरीश व सतीश का औपचारिक तौर पर क्रिया-कर्म किया. तय कर लिया कि अब जब तक प्रभु चाहें, जिंदगी चलेगी, जैसे चाहे चलेगी.

मैं क्या बताऊं. कहां से बताऊं. सीवान शहर में मेरी दो दुकानें थीं. एक किराने की और दूसरी परचून की. समृद्ध और संपन्न न भी कहें तो कम से कम खाने-पीने की कमाई तो होती ही थी. मैं छह संतानों का पिता था. चार बेटे, दो बेटियां. 16 अगस्त, 2004 से सारी बातें इतिहास में बदल गईं. उसके बाद मेरे नसीब में सिर्फ और सिर्फ भयावह भविष्य बाकी बचा. 16 अगस्त, 2004 की बात पूछ रहे हैं तो बताता हूं. साहस नहीं जुटा पा रहा लेकिन बताऊंगा. मैं उस दिन किसी काम से पटना गया हुआ था. अपने भाई के पास रुका हुआ था. मेरे भाई पटना में रिजर्व बैंक में अधिकारी थे. सीवान शहर में मेरी दोनों दुकानें खुली हुई थीं. एक पर सतीश बैठता था, दूसरे पर गिरीश. मेरे पटना जाने के पहले मुझसे दो लाख रुपये की रंगदारी मांगी जा चुकी थी. उस रोज किराने की दुकान पर डालडे से लदी हुई गाड़ी आई हुई थी. दुकान पर 2.5 लाख रुपये जुटाकर रखे थे. रंगदारी मांगने वाले फिर पहुंचे. दुकान पर सतीश था. सतीश ने कहा कि खर्चा-पानी के लिए 30-40 हजार देना हो तो दे देंगे, दो लाख रुपये कहां से देंगे. रंगदारी वसूलने आए लोग ज्यादा थे. उनके हाथों में हथियार थे. उन लोगों ने सतीश के साथ मारपीट शुरू की, गद्दी में रखे हुए 2.5 लाख रुपये ले लिए. राजीव यह सब देख रहा था. सतीश के पास कोई चारा नहीं था. वह घर में गया. बाथरूम साफ करने वाला तेजाब रखा हुआ था. मग में उड़ेलकर लाया, गुस्से में उसने तेजाब फेंक दिया जो रंगदारी वसूलने आए कुछ लोगों पर पड़ गया. तेजाब के छीटें मेरे बेटे राजीव पर भी आए. भगदड़ मच गई, अफरातफरी का माहौल बन गया.

‘लुंगी-गंजी में एसपी साहब आए. मैंने कहा कि सुरक्षा चाहिए. एसपी साहब ने कहा कि आप कहीं और चले जाइए, सीवान अब आपके लिए नहीं है. चाहे तो यूपी चले जाइए या कहीं और. हम एस्कॉर्ट कर सीवान के घर में जो सामान है, वह वहां भिजवा देंगे’
इसके बाद उन लोगों ने सतीश को पकड़ लिया. राजीव भागकर छुप गया. फिर मेरी दुकान को लूटा गया. जो बाकी बचा उसमें पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी गई. वे लोग सतीश को गाड़ी में ठूंसकर ले गए. गिरीश दूसरी दुकान पर था. उसे इन बातों की कोई जानकारी नहीं थी. कुछ देर बाद उसके पास भी कुछ लोग पहुंचे. गिरीश से ही लोगों ने पूछा कि चंदा बाबू की कौन-सी दुकान है. गिरीश को लगा कि कोई सामान लेना होगा. उसने उत्साह से आगे बढ़कर बताया कि यही दुकान है. क्या चाहिए, क्या बात है? उसे कहा गया कि चलो, जहां कह रहे हैं चलने को. गिरीश ने कहा कि बस शर्ट पहनकर चलते हैं लेकिन उसे शर्ट पहनने का मौका नहीं दिया गया. पिस्तौल के हत्थे से उसे मारा गया और मोटरसाइकिल पर बिठाकर ले जाया गया. तब तक राजीव को भी उन लोगों ने पकड़कर रखा था. मेरे तीनों बेटे उन लोगों के कब्जे में थे, जिन लोगों ने दो लाख रुपये रंगदारी न देने के कारण मेरी दुकान को आग लगाकर लूटा था. एक जगह ले जाकर राजीव को बांधकर छोड़ दिया गया और सतीश व गिरीश को सामने लाया गया. वहां कई लोग मौजूद थे. उन लोगों ने सतीश और गिरीश को तेजाब से नहलवाया. जब वे लोग मेरे बेटों को तेजाब से नहला रहे थे तो कह रहे थे कि तेजाब फेंका था हम लोगों पर, आज बताते हैं तेजाब कैसे जलाता है. बड़े बेटे राजीव की आंखों के सामने उसके छोटे भाइयों सतीश और गिरीश को तेजाब से जलाकर मार डाला गया. तेजाब से नहलाते वक्त वे लोग कहते रहे कि राजीव को अभी नहीं मारेंगे, इसे दूसरे तरीके से मारेंगे. सतीश और गिरीश को जलाने के बाद उन्हें काटा गया, फिर उनके शव पर नमक डालकर बोरे में भरकर फेंक दिया गया. मैं पटना में था तो मेरे पास खबर पहुंची कि आपको सीवान नहीं आना है, आपके दो बेटे मारे जा चुके हैं, एक बेटा कैद में है, आपको भी मार डाला जाएगा. मैं पटना में ही रह गया. राजीव वहीं कैद में फंसा रहा. दो दिनों बाद राजीव वहां से भागने में सफल रहा. गन्ने से लदे एक ट्रैक्टर से राजीव चैनपुर के पास उतर गया, फिर वहां से उत्तर प्रदेश के पड़रौना पहुंचा. पड़रौना में सांसद के घर पहुंचा. वहां के सांसद ने शरण दी और कहा कि किसी को कुछ बताने की जरूरत नहीं, चुपचाप यहीं रहो. राजीव वहीं रहने लगा. मेरे घर से मेरी पत्नी, मेरी दोनों बेटियां भी घर छोड़कर जा चुकी थीं और मैं पटना में था. सब इधर से उधर थे. किसी को नहीं पता कि कौन कहां है. हम लोगों ने तो सोच लिया था कि राजीव भी मार दिया गया होगा. मैंने सीवान में अपने घर के आसपास फोन किया तो वहां से भी मालूम चला कि तीनों बेटे मार दिए गए हैं. मेरे पास भी एक फोन आया कि आपका बेटा छत से गिर गया है. दरअसल उस समय मुझे भी पीएमसीएच बुलाकर मार दिए जाने की योजना बनाई गई थी.

‘नेता जी के यहां पटना फिर चला गया. वहां सोनपुर के लोग अपनी बात रख रहे थे. बीच में मैं बोल पड़ा कि हुजूर मैं सब कुछ गंवा चुका हूं, मुझे सुरक्षा चाहिए. नेता जी गुस्से में आ गए और कहा कि सीवान का लोग सोनपुर की मीटिंग में कैसे घुस गया’
बाद में मैं हिम्मत जुटाकर सीवान गया. वहां जाकर एसपी से मिलना चाहा. एसपी से नहीं मिलने दिया गया. थाने पर दारोगा से मिला. दारोगा ने कहा कि अंदर जाइए पहले. फिर कहा गया कि आप इधर का गाड़ी पकड़ लीजिए, चाहे उधर का पकड़ लीजिए, किधर भी जाइए लेकिन सीवान में मत रहिए. सीवान में रहिएगा तो आपसे ज्यादा खतरा हम लोगों पर है. मुझे सुझाव दिया गया कि पटना में एक बड़े नेता से मिलिए. छपरा के सांसद को लेकर पटना में नेता जी के पास गया. नेता जी से कहा कि जो खत्म हुए सो खत्म हो गए लेकिन जो बच गए हैं, उन्हें बचा लिया जाए. नेता जी ने कहा कि सीवान का मामला है, हम कुछ नहीं बोल सकते. नेता जी के पास मेरे साथ मेरे रिजर्व बैंक वाले भाई भी गए थे. अभी हम नेता जी के पास से निकल ही रहे थे कि मेरे भाई के पास सीवान से उन लोगों का फोन आ गया, जिन लोगों ने मेरे बेटों को मारा था. कहा गया कि नेता जी के पास गए थे शिकायत लेकर, मुक्ति के लिए. आप रिजर्व बैंक में नौकरी करते हैं न, आपका यही नंबर है न! मेरे भाई घबरा गए. उन्होंने कहा कि तुम कहीं और चले जाओ लेकिन यहां मत रहो, मैं भी नहीं रहूंगा. मेरे भाई ने तुरंत मुंबई ट्रांसफर करा लिया. वहां जाने के बाद भी उनको धमकी भरे फोन आते थे. उन्हें डर और दहशत से दिल का दौरा पड़ा, वे गुजर गए.

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दीवार पर चंदा बाबू के दिवंगत बेटों की तस्वीर
मैं बिल्कुल अकेला पड़ गया था. अब तक मेरे बेटे राजीव के बारे में कुछ भी नहीं पता चला था कि वह जिंदा भी है या नहीं. है भी तो कहां है. मेरी पत्नी-बेटी और मेरा एक विकलांग बेटा कहां रह रहा है, वह भी नहीं पता था. मैं डर से पटना ही रहने लगा. साधु की तरह दाढ़ी-बाल बढ़ गए. 15 दिनों तक इधर से उधर पैदल पागलों की तरह घूमता रहा. बाद में एक विधायक जी के यहां शरण मिली. उन्होंने समझाया कि दिन में चाहे जहां रहिए, रात को यहीं आ जाया करिए. ज्यादा पैदल मत घूमा कीजिए, आपको मार देगा लोग. मैं लगातार जुगत में था कि किसी तरह फिर नेता जी के पास पहुंचूं. इसी बीच मुझे मालूम चल गया था कि मेरा बेटा राजीव जिंदा है. एक दिन मैं पटना में सोनपुर की एक राजनीतिक टीम के साथ शामिल होकर रात में नेता जी के यहां फिर चला गया. सोनपुर के लोग अपनी बात रख रहे थे. उस बीच मैं भी उठा और बोला कि हुजूर मेरी समस्या पर भी ध्यान दीजिए, मैं सब कुछ गंवा चुका हूं, मुझे सुरक्षा चाहिए. नेता जी गुस्से में आ गए और कहा कि सीवान का लोग सोनपुर की मीटिंग में कैसे घुस गया. इसके बाद थोड़ा आश्वासन मिला. तब राज्य के डीजीपी नारायण मिश्र थे. उन्हें निर्देश मिला कि मेरे मामले को देखें. डीजीपी से मिला, उन्होंने आईजी के नाम पत्र दिया. आईजी से किसी तरह मिला तो डीआईजी के नाम पत्र मिला, डीआईजी ने एसपी के नाम पत्र दिया. मैं पत्रों के फेर में इधर से उधर फेरे लगाता रहा. हताशा-निराशा लगातार घर करते रही, थक-हारकर फिर दिल्ली चला गया. सोनिया जी के दरबार में पहुंचा. तब सोनिया जी नहीं थीं, राहुल जी से मिला. राहुल जी मिले, उन्होंने कहा कि आप जाइए, बिहार में राष्ट्रपति शासन लगने वाला है, आपकी मुश्किलों का हल निकलेगा. फिर हिम्मत जुटाकर सीवान आया. एसपी साहब के पास चिट्ठी देने की बात थी. अपने कई परिचितों को कहा कि आप लोग चलिए, सुबह-सुबह चलेंगे तो कोई देखेगा नहीं लेकिन सीवान में साथ देने को कोई तैयार नहीं हुआ. हमारे लोगों ने सलाह दी कि आप सुबह जाइए या आधी रात को, हम लोगों को अपनी जान प्यारी है, साथ नहीं दे सकते. लोगों ने सलाह दी कि एसपी साहब को रजिस्ट्री से चिट्ठी भेज दीजिए. मैंने अपने विवेक से काम लिया. सुबह पांच बजे एसपी आवास पहुंचा तो सुरक्षाकर्मी ने रोका. मैंने उससे आग्रह किया कि मेरे पास पांच मिनट का ही समय है, बस एक बार एसपी साहब से मिलवा दो, पांच मिनट से ज्यादा नहीं रुक सकता यहां. सुरक्षाकर्मी ने कहा, आप चिट्ठी दे दें, मैं दे दूंगा. मैं इसके लिए तैयार नहीं हुआ. फिर वह एसपी साहब को जगाने चला गया.

‘शहाबुद्दीन को जमानत मिलना तय था. यह 16 जून, 2014 को ही तय हो गया था कि अब आगे का रास्ता साफ हो गया. उस दिन मेरे बेटे राजीव की सरेआम हत्या हुई थी. राजीव को 19 जून को अदालत में गवाही देनी थी. वह इकलौता चश्मदीद गवाह था’
लुंगी-गंजी (बनियान) में एसपी साहब आए. मैंने कहा कि सुरक्षा चाहिए, यह चिट्ठी है. एसपी साहब ने कहा कि आप कहीं और चले जाइए, सीवान अब आपके लिए नहीं है. चाहे तो यूपी चले जाइए या कहीं और. हम एस्कॉर्ट कर सीवान के घर में जो सामान है, वह वहां भिजवा देंगे. मैंने एसपी साहब को कहा कि पटना के कंकड़बाग में आपका जो घर है, उसमें कई दुकानंे हैं, एक दे दीजिए हुजूर, वहीं दुकान कर लेंगे, पूरा परिवार वहीं रह लेगा. एसपी साहब नकार गए, बोले ऐसा कैसे होगा. मैंने भी एसपी साहब को कह दिया- साहब आप सुरक्षा दीजिए या मत दीजिए, रहूंगा तो सीवान में ही, सीवान नहीं छोड़ूंगा. एसपी साहब डेट पर डेट बदलते रहे कि कल आइए, परसों आइए. फिर से डीआईजी साहब के पास गया कि आपकी चिट्ठी बस अब तक चिट्ठी भर ही है. डीआईजी साहब ने कहा कि मैं रास्ता निकलता हूं. तब एके बेग साहब डीआईजी थे. डीआईजी साहब ने मदद की. उन्होंने एसपी साहब से कहा कि इन्हें सुरक्षा दीजिए, अगर आपके पास जिले में बीएमपी के जवान नहीं हैं तो मैं दूंगा लेकिन इन्हें सुरक्षा दीजिए. तब जाकर सुरक्षा मिली. मैं साहस कर रहने लगा कि अब मरना ही होगा तो मर जाएंगे. बाद में बेटा राजीव आया, अपनी मां, बहन और विकलांग भाई को भी लेते आया. घर-परिवार आया तो बेटे-बेटी की शादी के बारे में सोचा. बेटे राजीव की शादी की. शादी के 18वें दिन और मामले में गवाही के ठीक तीन दिन पहले उसे मार दिया गया. मेरा बेटा राजीव चश्मदीद गवाह था. मेरा बेटा राजीव इसके पहले भी कोर्ट में अपना बयान देने गया था. जिस दिन बयान देने गया था उस दिन भी उसे कहा गया था, ‘हमनी के बियाह भी कराईल सन आउरी श्राद्ध भी.’

बाहुबली: जिस जीरादेई में देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का जन्म हुआ था. उस इलाके से पहली बार विधयक बनकर शहाबुद्दीन राजनीति में आए थे.
सच में ऐसा ही हुआ. जब गवाह ही मार डाला गया तो जमानत मिलनी ही थी, सो हाई कोर्ट में केस कमजोर पड़ गया. मैं तो अपने जले हुए घर में वापस नहीं आना चाहता था, वे तो एक डीएसपी सुधीर बाबू आए, उन्होंने बहुत भरोसा दिलाया कि चलिए, आपको डर लगता है तो हम रहेंगे आपके साथ. उनकी ही प्रेरणा से अपने घर को लौट सका. अब घर में मैं, मेरी बीमार पत्नी और एक विकलांग बेटा रहता है. बेटियों की शादी कर दी. लोन में दबा हुआ हूं. छह हजार रुपये की मासिक आमदनी है. तीन-तीन हजार रुपये दोनों दुकानों से किराया आता है. इस छह हजार की कमाई से ही पत्नी की बीमारी का इलाज होता है, दवाई आती है, आटा-चावल आता है और बेटियों की शादी का लोन चुकाता हूं. मेरे तीन बेटों की हत्या हुई, बेटों की हत्या का मुआवजा भी नहीं मिला. यह शिकायत है मेरी नीतीश कुमार से. खैर, अब क्या किसी से शिकायत. खुद से ही शिकायत है कि मैं कैसी किस्मत का आदमी हूं, जो शासन, व्यवस्था, कानून, खुद से… सबसे हार गया. अब ऐसे में आप पूछ रहे हैं कि क्या आप आगे सुप्रीम कोर्ट में लड़ेंगे. मेरी स्थिति में, मेरे हालात में पहुंचा कोई आदमी आगे लड़ने लायक बचा होगा, क्या आप इसकी उम्मीद करते हैं?

(तहलका हिंदी)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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