/क्यों लापरवाह है NDTV के मामलों में पुलिस? मुन्ने भारती को जान से मारने की धमकी, मनोरंजन भारती का आई फोन चोरी

क्यों लापरवाह है NDTV के मामलों में पुलिस? मुन्ने भारती को जान से मारने की धमकी, मनोरंजन भारती का आई फोन चोरी

एनडीटीवी के प्रोग्राम कोआर्डिनेटर एम अतहरुद्दीन मुन्‍ने भारती को फोन पर धमकी दिए जाने के मामले में पुलिस अभी किसी को गिरफ्तार नहीं कर पाई है. मुन्ने भारती को बीते 10 सितम्‍बर को फोन पर धमकी दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि उन्‍हें तथा उनके परिवार को बम से उड़ा दिया जाएगा। इसके बाद उन्‍होंने बारह सितम्बर को जामिया थाने में धमकी का मामला दर्ज कराया था। पुलिस अब तक इस मामले का एक भी सिरा नहीं ढूंढ पाई है।

हालांकि शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद दिल्ली पुलिस ने सुरक्षाकर्मियों की ड्यूटी मुन्‍ने भारती के घर पर लगा दी थी, परन्‍तु बाद में उसे वापस ले लिया गया। इस धमकी के बाद से ही मुन्‍ने का परिवार पूरी तरह सहमा हुआ है। मुन्ने के करीबियों का कहना है कि पुलिस इस मामले में कोई गंभीरता नहीं दिखा रही है, जिससे पत्रकार का परिवार किसी अनहोनी की आशंका से डरा हुआ है। इसके पहले भी मुन्ने भारती पिछले साल लूट की घटना का शिकार हो चुके हैं।

पुलिस ने फोन नंबर के जरिए मालिक का पता लगाने में भी खासा वक्त बरबाद किया। जिस नंबर को कोई अनाड़ी भी किसी कंज्यूमर सेंटर से कुछ ही मिनटों में ट्रेस कर सकता है, उसी नंबर के मालिक को तलाशने में पुलिस को तीन दिन लग गए। बाद में पुलिस ने बताया कि फोन अपने मालिक के पास भी नहीं है और किसी ने चरा लिया है। पुलिस के मुताबिक धमकी देने वाले ने कुल तीन फोन किए थे।

उधर एनडीटीवी इंडिया के ही इनपुट हेड मनोरंजन भारती का आई-फोन चोरी हो जाने का मामला भी ठंढे बस्ते में पड़ा दिख रहा है। पिछले हफ्ते उनका फोन मयूर विहार के बाजार से चोरी हो गया था। जानकारी मांगने पर पुलिस ने बताया कि अभी तक चोर ने मोबाइल ऑन नहीं किया है।

दोनों ही मामलों में पुलिस की दलील गले से नीचे नहीं उतर रही है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.