Share this on WhatsApp
Subscribe to RSS
कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे mediadarbar@gmail.com पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

बंदा बनना है तो कंधा बन ..

-सुजाता॥

कई दिन हो गए टीवी पर शाहरुख लड़कों को सीख दे रहे हैं कि अगर फेयर और हैण्डसम नहीं होगा तो लड़कियाँ तुझे कंधा बना कर इस्तेमाल करेंगी और तेरे हाथ खुछ नहीं आएगा। रंगभेदी और लिंगभेदी यह विज्ञापन मुझे बार-बार खतरनाक लगता है। इस विज्ञापन से लड़कियाँ बार बार ऑफेण्डेड क्यों न महसूस करें ? लड़कियों की तरह रो मत! लड़कियों की तरह शरमा मत! लड़कियों की तरह डर मत! लड़कियों की तरह मुँह लटॅका कर मत बैठ! की ही तरह ‘कंधा मत बन’ की यह सीख आप उस देश के लड़कों को दे रहे हैं जहाँ परिवारों में लड़के एक गिलास पानी भी अपने हाथ से पीने का संस्कार नहीं लेते। जहाँ ‘मर्द’ होने का अहंकार इतना ज़्यादा है कि ‘ना’ सुनने पर लड़कियो के मुँह पर एसिड डाल जाते हैं या सबक सिखाने के लिए पुराने फॉर्मूले बलात्कार का इस्तेमाल करते हैं। यह विज्ञापन न सिर्फ साँवले रंग का अपमान है बल्कि औरत को भी स्त्रियोचित के लिए अपमानित कर उसके स्टीरियोटाइप में बंद करता है। यह विज्ञापन कई तरह के अर्थ दे रहा है। औरतों की क्रीम इस्तेमाल करना मर्दानगी के लिए शर्म की बात है यह साफ है। छिपा हुआ अर्थ है कि औरत का कंधा बनना भी ! वह तो आपकी मर्दानगी से प्रभावित होकर आपकी दोनो बाहों में झूले तभी बंदा होना सार्थक होगा ।

poster2

मै ‘बंदा’ शब्द के इस भयानक नए इस्तेमाल (शायद कूल ड्यूड जैसा साउण्ड करने वाला) से भी चकित हूँ। सब एक ही ईश्वर के बंदे हैं और बंदगी जैसे शब्द सुनते हम बड़े हुए और आज अचानक जब इस संदर्भ में बंदा- बंदी सुनते हैं तो सकपका जाते हैं। मानों पब्लिक स्पेस में लड़कियों के निकल आने से जो चारों तरफ बहार छाई है उसमें तेज़ बाँके बंदों को छोड़ बाकियों के लिए कोई उम्मीद है तो बाज़ार की ऐसी बेहूदी क्रीमों में ही है।

शाहरुख को मैं कहना चाह्ती हूँ कि वक़्त बदल रहा है.. एक पढी-लिखी करियर ओरियण्टेड लड़की दो दिन में ऐसे गोरे रंग के बंदे से ऊब जाएगी जो अकेली खटती हुई पत्नी का हाथ बँटाने की बजाए सिर्फ स्टाइल मारता हो और सण्डे को कुछ मज़ेदार नाश्ता मांगने से पहले देर तक बिस्तर तोड़ता हो। लड़कियों नें अपनी भूमिकाओं में कितनी नई ज़िम्मेदारियाँ अपने कंधे पर उठाई हैं। ऐसे में अगर साथी पुरुष उनका कंधा नहीं बनेगा तो उसका बंदा होना लड़कियाँ ज़्यादा दिन नहीं ढो सकेगीं। इसलिए डियर शाहरुख, लड़कों को अगर बंदा बनना ही है तो उन्हे पहले कंधा तो बनना ही होगा , बोझ ढोने वाला नहीं, दर्द-खुशी-संघर्ष में बराबरी निभाने वाला। थोड़ा कम मर्द ! यानी टिपिकल वाला मर्द नहीं।जैसे लड़कियाँ आज थोड़ी कम लड़की हैं। टिपिकल वाली नहीं। जिनका इलाका सिर्फ घर नही है और चूल्हा नहीं है।

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे mediadarbar@gmail.com पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

0 comments

Add your comment

Nickname:
E-mail:
Website:
Comment:

Other articlesgo to homepage

read more

मीडिया दरबार एंड्राइड एप्प

मीडिया दरबार की एंड्राइड एप्प अपने एंड्राइड फ़ोन पर इंस्टाल करें.. Click Here To Install On Your Phone

Contacts and information

मीडिया दरबार - जहाँ लगता है दरबार. आप ही राजा हैं इस दरबार के और कटघरे में है मीडिया. हम तो मात्र एक मंच हैं और मीडिया पर अपनी निगाह जमायें हैं, जहाँ भी मीडिया में कुछ गलत होता दिखाई देता है उसे हम आपके सामने रख देते हैं और चलाते हैं मुकद्दमा. जिसपर सुनवाई करते हैं आप, जहाँ न्याय करते हैं आप. जी हाँ, यह एक अलग किस्म का दरबार है. मीडिया दरबार...

Social networks

Most popular categories

© 2014 All rights reserved.
%d bloggers like this: