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इतिहास की दो ‘केस स्टडी’..

“यह बात आज के मुसलिम युवाओं को जाननी चाहिए कि देश के साठ से ज़्यादा मुल्ला-मौलवियों ने क्यों सर सैयद अहमद ख़ान के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी किये थे? क्यों उन्हें ‘धर्म से बाहर’ घोषित कर दिया गया था? और जब इससे भी बात नहीं बनी तो मौलवी अली बक्श क्यों मक्का जा कर सर सैयद का ‘सिर क़लम कर दिये जाने’ का फ़तवा ले कर आये थे?”

 

-क़मर वहीद नक़वी||

अगर मुल्लाओं की चली होती तो पिछले डेढ़ सौ सालों में देश में न कोई मुसलमान बच्चा स्कूल गया होता, न कालेज और न यूनिवर्सिटी! आज न अलीगढ़ मुसलिम विश्विद्यालय होता और न ही हिन्दुस्तान के किसी मुसलमान ने ‘अँगरेज़ ईसाइयों वाली’ आधुनिक शिक्षा ली होती! ज़रा सोच कर देखिए कि तब कैसा होता आज का हिन्दुस्तानी मुसलमान!debate-on-muslim-personal-law

सर सैयद का ‘सिर क़लम करने’ का फ़तवा!

कुछ साल पहले आरिफ़ मुहम्मद ख़ान का एक लेख पढ़ा था. अगर आप शाहबानो मामले को जानते होंगे तो आरिफ़ मुहम्मद ख़ान को भी जानते ही होंगे! उनका लेख पढ़ कर अचम्भा हुआ कि ऐसा भी हुआ होगा क्या? हुआ तो था जनाब! लेकिन वह सब बातें अब इतिहास बन गयीं, जिनसे किसी ने कुछ नहीं सीखा. यह बात आज के मुसलिम युवाओं को जाननी चाहिए कि देश के साठ से ज़्यादा मुल्ला-मौलवियों ने क्यों सर सैयद अहमद ख़ान के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी किये थे? क्यों उन्हें ‘धर्म से बाहर’ घोषित कर दिया गया था? और जब इससे भी बात नहीं बनी तो मौलवी अली बक्श क्यों मक्का जा कर सर सैयद का ‘सिर क़लम कर दिये जाने’ का फ़तवा ले कर आये थे?

सर सैयद का ‘गुनाह’ क्या था?

ऐसा क्यों? बक़ौल आरिफ़ ऐसा इसलिए कि सर सैयद अहमद भारतीय मुसलमानों की हालत सुधारना चाहते थे, उन्हें तरक़्क़ी और ख़ुशहाली के रास्ते पर ले जाना चाहते थे, एक ऐसा कालेज खोलना चाहते थे, जिसमें मुसलमान बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिल सके, ताकि वह विज्ञान पढ़ सकें, दुनिया के बड़े-बड़े दार्शनिकों-चिन्तकों के विचार जान सकें और उनके लिए ज्ञान की नयी खिड़कियाँ खुल सकें!

आधुनिक शिक्षा का ‘कुफ़्र’!

लेकिन आपको जान कर हैरानी होगी कि तब के कठमुल्लों को यह काम ‘इसलाम-विरोधी’ लगा. उन्होंने उसका पूरी ताक़त से विरोध किया. क्योंकि उनकी नज़र में अँगरेज़ी और पश्चिमी शिक्षा ‘इसलामी मान्यताओं’ के ख़िलाफ़ थी, ऐसी पढ़ाई करना ‘कुफ़्र’ था, ईसाइयत पर चलने जैसा था और इसलिए हिन्दुस्तानी मुल्लाओं का बहुत बड़ा तबक़ा सर सैयद अहमद के ख़ून का प्यासा था, उन्हें मुसलमान मानने को ही तैयार नहीं था.

पढ़ें: आरिफ़ मुहम्मद ख़ान का लेख, ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में Click to Read.

सर सैयद ने ख़ुद लिखा है, ‘मुसलिम समाज की अधोगति पर मैंने ख़ूब सोचा और पाया कि उनकी सारी समस्याओं का एक ही इलाज है कि उन्हें आधुनिक शिक्षा मिले. मैंने तय किया कि उनके दिमाग़ से यह बात निकाली जाय कि विज्ञान और यूरोपीय साहित्य पढ़ना धर्म-विरुद्ध है.’ सर सैयद आगे लिखते हैं, ‘समस्या यह है कि हमारा (मुसलमानों का) सोचना-समझना, सामाजिक प्रथाएँ और धार्मिक आस्था सब आपस में इतना गड्डमड्ड है कि धार्मिक टंटा खड़ा किये बिना सामाजिक सुधारों पर कोई बातचीत ही सम्भव नहीं.’

मुसलमानों ने इतिहास से क्या सीखा?

देखा आपने! मुसलमानों ने इतिहास से क्या सीखा? किसी सामाजिक सुधार की बात तब जितनी ‘ग़ैर-इसलामी’ हुआ करती थी, आज भी ऐसी हर कोशिश वैसे ही ‘ग़ैर-इसलामी’ क़रार देकर ख़ारिज कर दी जाती है. कम से कम पढ़े-लिखे मुसलमानों को आज दिल पर हाथ रख कर सोचना चाहिए कि अगर सर सैयद तब मुल्लाओं के आगे झुक गये होते, थक-हार कर बैठ गये होते, तो मुसलमान आज कहाँ होते, किस हाल में होते? और क्या वाक़ई वह शिक्षा ‘इसलाम-विरुद्ध’ थी या है? उलेमा सही थे या ग़लत?

सुधार की हर कोशिश इसलाम-विरोधी क्यों?

सोचने की बात यह है कि मुसलिम समाज में रत्ती भर भी सुधार की कोशिश को ‘आनन-फ़ानन’ क्यों ‘इसलाम-विरोधी’ मान लिया जाता है? और सोचने की बात यह भी है कि मुसलिम समाज के सुधार के लिए मुल्ला-मौलवियों-उलेमाओं ने ख़ुद कितने क़दम उठाये हैं? सोचने की बात है कि इमराना बलात्कार कांड और आरिफ़-गुड़िया-तौफ़ीक़ जैसे मामलों में जिस तरह के फ़तवे आते हैं, वह लोगों के बीच किस तरह के इसलाम की छवि गढ़ते हैं? और सोचने की बात है कि मुसलिम समाज में इस तरह के मुद्दों पर गहराई से विचार-विमर्श क्यों नहीं होता है? और जब कोई विमर्श होता भी है, तो उसमें आम मुसलमानों की, पढ़े-लिखे मुसलमानों की, मुसलिम बुद्धिजीवियों की, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मुसलिम महिलाओं की भागीदारी क्यों नहीं होती? सारे फ़ैसले मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड या ऐसे ही दूसरे स्वयंभू मुसलिम संगठन क्यों ले लेते हैं? और मुसलिम समाज की हर समस्या को धर्म से क्यों जोड़ कर देखा जाता है?

Law Commission Questionnaire on Muslim Personal Law

पर्सनल लॉ पर विधि आयोग की प्रशनावली

अब तीन तलाक़ और यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड के मुद्दे को ही लीजिए. तीन तलाक़ का मामला तो ख़ैर सुप्रीम कोर्ट में है, लेकिन पर्सनल लॉ में सुधारों, बदलावों और यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड पर लोगों की राय जानने के लिए विधि आयोग ने एक प्रशनावली जारी की. समझ में नहीं आता कि इस पर मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड और तमाम दूसरे मुसलिम धार्मिक संगठनों में इतनी तिलमिलाहट और बिलबिलाहट क्यों है? भई, राय ही तो माँगी गयी है. कोई ऐसा तो नहीं कि यूनिफ़ार्म सिविल कोड बस उन पर थोप दिया जानेवाला है! अजीब बात है कि इस मुद्दे के गुण-दोष पर आप न कुछ सोचना चाहते हैं, न सुनना, न यह परखना चाहते हैं कि भविष्य में मुसलिम समाज को उसके क्या फ़ायदे मिल सकते हैं?

देखिए: विधि आयोग की प्रश्नावली Click to Read.

 

प्रश्नावली में क्या आपत्तिजनक है?

और मुझे तो लगता नहीं कि इस प्रशनावली के ‘बहिष्कार’ का एलान करनेवाले लोगों ने इसे पढ़ा भी है. सच यह है कि इसमें आपत्तिजनक कुछ है ही नहीं, न कोई बात, न कोई सवाल. उसके सोलह सवालों में एक सवाल यह है कि क्या यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड ‘वैकल्पिक’ होना चाहिए, यानी जिसे मंज़ूर हो, वह अपना ले और जो उसे न मानना चाहे, वह अपने पर्सनल लॉ पर चले? इसमें क्या आपत्ति की बात है भई? एक सवाल यह पूछा गया कि तमाम तरह के पर्सनल लॉ को क्या लिखित रूप में कर दिया जाये? इसमें क्या ‘इसलाम-विरोधी’ बात हुई? क़ानूनों को लिखित क्यों नहीं होना चाहिए? एक सवाल यह भी पूछा गया है कि तीन तलाक़ को पूरी तरह रद्द कर दिया जाये या फिर जस का तस रहने दिया जाये? इस पर भी कोई कोहराम खड़ा होने जैसी बात क्यों? आपको जो चुनना है, बता दीजिए. क्या दिक़्क़त है?

पहले बहस मुसलिम समाज के भीतर होती

दूसरी बात, यह मुद्दा उठा है तो इस पर बात करने, चर्चा करने और बहस करने की ज़रूरत क्यों नहीं है? और प्रशनावली का ‘बहिष्कार करने’ के एलान के पहले यह बहस मुसलिम समाज के भीतर क्यों नहीं होनी चाहिए थी? मुसलिम पर्सनल बोर्ड को तमाम मुसलमानों से राय क्यों नहीं माँगनी चाहिए थी, मुसलमानों के अलग-अलग तबक़ों से, महिलाओं से बात कर उनके हालात, उनके ख़याल, उनकी समस्याएँ और उनके सुझाव क्यों नहीं लेने चाहिए थे? मुसलमानों में बहुत-से समुदाय हैं, जो एक बार में तीन तलाक़ को बिलकुल ग़लत मानते हैं. तो ऐसे मुद्दों पर समाज के भीतर मंथन तेज़ होना चाहिए या नहीं?

शरीअत का मामला कहाँ उठे, कहाँ नहीं?

और मुसलमानों को समय के साथ क्यों नहीं चलना चाहिए? क्यों नहीं बदलना चाहिए? एक तरफ़ तो नौकरी में मुसलमानों को आरक्षण दिये जाने की माँग होती है और दूसरी तरफ़ ऐसे फ़तवे भी आते हैं कि शरीअत के मुताबिक़ मुसलिम महिला की कमाई स्वीकार करना किसी परिवार के लिए हराम है और महिलाएँ ऐसी जगह काम नहीं कर सकतीं, जहाँ स्त्री-पुरुष साथ काम करते हों और उन्हें परदे के बिना पुरुषों से बात करनी पड़े! लेकिन शरीअत में तो ब्याज लेना-देना भी हराम है. तो मुसलिम पुरुषों को भी नौकरी नहीं ही करनी चाहिए क्योंकि उनका प्राविडेंट फ़ंड कटता है, जिस पर उन्हें ब्याज मिलता है! बैंक खाता भी नहीं खोलना चाहिए, उस पर ब्याज मिलता है! फिर कार, मकान, कारोबार के लिए मुसलमानों को क़र्ज़ भी नहीं लेना चाहिए क्योंकि बैंक उन्हें ब्याजरहित क़र्ज़ तो देंगे नहीं! तो शरीअत का मामला कहाँ उठाया जायगा, कहाँ नहीं, यह अपनी सुविधा से तय होगा! है न!

उलेमाओं को नयी दृष्टि विकसित करनी होगी

तो ऐसे आग्रहों से मुसलिम समाज कैसे आगे बढ़ेगा? ख़ास कर तब, जबकि देश के बाक़ी सारे समाजों और तबक़ों में आगे बढ़ने और हर स्तर पर सामाजिक बराबरी हासिल करने की होड़ लगी हो. कुल मिला कर मूल बात यह है कि मुसलमानों में सामाजिक सुधारों के मुद्दे पर उलेमाओं को नयी दृष्टि विकसित करनी होगी, नये ज़माने की ज़रूरतों और सच्चाइयों के साथ अपना नज़रिया बदलना होगा.

‘हिन्दू राष्ट्र’ की आशंकाएँ

हाँ, ‘हिन्दू राष्ट्र’ की आशंकाओं को लेकर मुसलिम उलेमाओं की चिन्ता समझ में आती है. उसके ख़िलाफ़ संघर्ष करना एक बिलकुल अलग मुद्दा है. लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि अपने ऐसे आधारहीन दकियानूसी रवैयों और अड़ियल ज़िदों से वह मुसलमानों का तो कोई भला करते नहीं, उलटे हिन्दुत्ववादी तर्कों को ज़मीन ज़रूर दे देते हैं. शाहबानो मामले के पहले संघ परिवार क्या था और उसके बाद वह कहाँ तक और क्यों बढ़ा और बढ़ता गया, कैसे उसने शाहबानो मामले का हवाला दे-देकर उन हिन्दुओं के बीच अपनी जगह बनायी, जो कभी संघ के विचारों से सहमत नहीं थे, इतिहास की यह ‘केस स्टडी’ हमारे सामने है. और एक ‘केस स्टडी’ सर सैयद अहमद की है, जिससे यह लेख शुरू हुआ था. इन दोनों से कुछ सीखना हो, तो सीख लीजिए. वरना ज़माना तो आगे बढ़ जायेगा, आप पीछे रहना चाहें, चुनाव आपका है!

सौजन्य: राग़देश

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