/राजनीति से भी ऊपर होती है राष्ट्र-नीति, इसी माहौल की है देश को जरूरत : नरेन्द्र मोदी

राजनीति से भी ऊपर होती है राष्ट्र-नीति, इसी माहौल की है देश को जरूरत : नरेन्द्र मोदी

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का तीन दिवसीय अनशन कार्यक्रम सोमवार  को समाप्त हो गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस उपवास के जरिए मोदी ने न सिर्फ गुजरात में बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी अपना कद बड़ा किया है। अपने समापन भाषण में भी उन्होंने क्षेत्रीय मुद्दों की बजाय राष्ट्रीय मुद्दों पर ज्यादा चर्चा की:

भारत माता की जय,

मंच पर विराजमान आदरणीय सुषमा जी, आदरणीय वैंकेया जी, पूजनीय भैयू जी महाराज, सभी संप्रदाय के पूजनीय धर्मगुरु, मंच पर विराजमान सभी महानुभाव, भाइयो और बहनों।

मैंने एक पत्र लिखा था कुछ दिन पहले जो अखबारों में छपा था। उसमें मैंने कहा था कि मैं 17 तारीख को अनशन का प्रारंभ करूंगा 19 तारीख को अनशन समाप्त करूंगा। अनशन भले समाप्त होते हों लेकिन यह मिशन तेज गति से आगे बढ़ने का आज प्रारंभ है। पूर्णता की ओर जाने का ये उपक्रम है जिसे हम आगे बढ़ाना चाहते है। भाइयो और बहनों किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि सद्भावना मिशन का एक कार्य विचार न सिर्फ गुजरात को पूरे देश को आंदोलित कर देगा। किसी ने नहीं सोचा होगा।

क्या कारण है पूरे देश में सद्भभावना मिशन आखिर क्या करना चाहता है, गुजरात आखिर क्या करना चाहता है इस पर चारो तरफ एक जिज्ञासा एक अपनापन एक लगाव क्यों? मित्रों इन  सवालों के जवाब हम जानते हैं। कुछ दिन पहले अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को बल मिला। क्या कारण कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरा देश उमड़ पड़ा क्यों? जवाब हम सब जानते हैं। देश के आम आदमी के मन में जो कुछ भी हो रहा है उससे वो परेशान है। वो अपने आप को अलग थलग महसूस करता है। पीड़ा  सबके भीतर बडी़ है पर प्रकटीकरण का अवसर नहीं मिलता है। कोई आसरा नहीं मिलता है। और जब कहीं उसको कोई जगह दिखाई दे उसकी भीतरी आशा का जन्म होता है। वो शायद इस रास्ते से कुछ निकल आएगा इस उम्मीद से जुड़ जाता है।

ये पहली बार नहीं हुआ है। हर दस साल में हिंदुस्तान में कभी न कभी ऐसे अवसर आए हैं। जनता जनार्दन मौका देखते ही सत्य के साथ जुड़ने के लिए तैयार हो जाती है। मैं उन सारे अवसरों की गिनती कराने नहीं जा रहा हूं। हमने अपनी पूरी जिंदगी जनता की सेवा में खपाई है।
हमने घर इसलिए नहीं छोड़ा था कि सिंहासन पर बैठने के कोई सपने थे। लड़कपन में घर छोड़ा था। एक सपना लेकर छोडा़ था। किसी दुखियारे के काम आएंगे। ये जिंदगी देश के लिए काम आए। ये तन मन अपने लिए नहीं है। औरों के लिए है। ये राजनीति से नहीं होता है। माँ भारती  की भक्ति से होता है। दुखियारों के दर्द को जब देखते हैं तब पीड़ा होती है। इसलिए भाइयों और बहनों हर चीज को राजनीति से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। हर चीज को राजनीति के तराजू से तोलने की जरूरत  नहीं है।

राजनीति से भी ऊपर राष्ट्रनीति होती है। इस अनशन, सदभावना मिशन की प्रेरणा राष्ट्रनीति है राजनीति नहीं है। मित्रों, हमारा देश, हम लोग अगर गौर से सुने तो दुनिया क्या कहती है? सारे अध्यनशील लोगों का भारत पर एक आरोप है। और मैं चाहता हूं कि भारत के नागरिकों के नाते हम उस आरोप को गंभीरता से ले। विश्व में ऊंचाई पर पहुंचें। लोगों का कहना है कि पता नहीं क्या कारण है कि भारत आगे जाने के सपने नहीं देखता है।

चीन को लगता है कि हम ये करना चाहते हैं, यूरोप को लगता है कि हम ये करना चाहते हैं, अमेरिका को लगता है कि हम ये करना चाहते हैं। क्या कारण है कि हम सिकुड़ गए हैं। यदि हम ये नहीं सोच रहे हैं कि हमें क्या करना है। सपने ही नहीं है तो संकल्प की संभावना कहां से आएगी। और यदि संकल्प ही नहीं है तो जीवन को जोड़ने की इच्छा कहां से आएगी। मित्रों देश के लिए जरूरी है सपनों को संजोना। देश के लिए जरूरी है संकल्प के साथ अपने आप को खपाने की इच्छा।

ये माहौल बनाने की देश को आवश्यक्ता है। मैं गुजरात के अनुभव से कह रहा हूं। हम भी रूटीन में सरकार चला सकते थे। औरों ने भी सड़के बनाई हैं हम भी बना लेते। औरों ने भी अस्पताल बनाए हैं हम भी बना लेते। लेकिन हमने ऐसा नहीं सोचा। हमने कहा कि यह सार्वजनिक रूप से चलने वाला काम है। उसे ऐसे ही आगे बढ़ाने से कुछ नहीं होगा। हमें कुछ परिवर्तन करना है। उसके लिए हमें कुछ करना होगा। अलग। उसके लिए हमने रास्ता खोजा। 6 करोड़ गुजरातियों को जोड़ना। जब से मैंने कार्यभार संभाला है मेरे मुंह से एक मंत्र निकला है। मेरे लिए 6 करोड़ गुजराती बोलना शब्द नहीं है। यही मेरा भाव है। यही मेरी शक्ति है। इसी शक्ति से मैं गुजरात को आगे बढ़ाने के सपने देखता हूं।

हमने सपने अकेले नहीं देखे। हमने 6 करोड़ सपनों को जांचने, परखने की कोशिश की और उन 6 करोड़ सपनों से एक नई दुनिया बसाने का सोचा। हर नागरिक  की आंखों में एक सपना है। वहीं सपना आपका है वही मेरा है। इसलिए हमने विकास की जो धारणा बनाई इसी आधार पर बनाई।

मैं एक कटु घटना आपको सुनाना चाहता हूं। कुछ साल पहले भारत सरकार ने जस्टिस सच्चर कमेटी का गठन किया था अल्पसंख्यकों के विकास का अध्ययन  करने के लिए। जस्टिस सच्चर कमेटी की टीम ने गुजरात आकर भी अध्ययन किया। जस्टिस सच्चर की पूरी टीम की मेरे साथ एक मीटिंग हुई। उन्होंने मुझसे पूछा कि आप अपने राज्य में अल्पसंख्यकों के लिए क्या करते हैं। मैंने उनसे कहा मेरी सरकार अल्पसंख्यकों के लिए कुछ भी नहीं करती है। वो चौंक गए। ऐसा बेबाक उत्तर कोई दे सकता है। मैंने साफ साफ कहा मेरी  सरकार अल्पसंख्यकों के लिए  कुछ नहीं करती। मैंने कहा एक और वाक्य लिख लीजिए। मेरी सरकार बहुसंख्यकों के लिए भी कुछ नहीं करती। मेरी सरकार 6 करोड़ गुजरातियों के लिए काम करती है। यहां कोई भेदभाव नहीं है।

हर चीज को माइनारिटी-मैजोरिटी के तराजू पर तौलना। आए दिन  वोट बैंक की राजनीति करना। ये रास्ता मेरा नहीं है। मेरे राज्य के सभी नागरिक मेरे हैं। उनका दुख मेरा दुख है।

मित्रों देश का दुर्भाग्य रहा है। 60 साल का ये क्रम रहा है कि सरकारें बनती हैं और बनने के बाद अगला चुनाव जीतने के लिए पांच साल उसी में खोए रहते हैं। हर कार्यक्रम, बजट को कैसे खर्च करना, विकास करना तो कैसे करना, लेकिन इस सबके बीच एक ही सवाल नेताओं के मन में रहता है कि काम कैसे करे कि अगला चुनाव जीते। यही चलता आ रहा है।

वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित अर्थरचना चलने लगी है। वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित होकर विकास योजनाएं बन रही है। उसका असर ये हुआ कि देश में विकास नहीं हुआ। छुटपुट हो रहे हैं। देश का पूरा हेल्थ सेक्टर सुधारना है कोई नहीं सोच रहा है।

ये 6० साल हमारे बर्बाद हो गए हैं। गुजरात इस सोच से बाहर निकला है। हमने सोचा कि हम चुनाव जीतने के लिए सरकार नहीं चलाएंगे। मित्रों इसके लिए बहुत ताकत लगती है। मैं भाग्य वाला इंसान हूं मुझे कोई परवाह नहीं है।

तब हम फैसले ले पाए। यदि मुझे कृषि विकास करना है तो हर किसान की वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए  सोचना होगा कि हम क्या कर सकते हैं।  मई जून के 44 डिग्री तापमान में हमारी राज्य सरकार के कर्मचारी किसानों के पास जाते हैं। यह इसी का परीणाम है कि गुजरात जो कभी अकाल पीडि़त था वो अब कृषि विकास में अग्रणी है।

वर्ल्ड बैंक की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि विकास के लिए यदि मॉडल के रूप में देखना है तो गुजरात को देखिए। अगर हम सिर्फ राजनीतिक तौर तरीकों से सोचते रहते तो स्थितियां नहीं बदलती।

उद्योग गुजरात में अनिवार्य कर दिया गया है। कुछ लोगों को रोजी रोटी मिल रही है। औद्योगिक क्षेत्र में विकास कैसे होता था। कोई आ गया है तो ठीक है नहीं आया तो ठीक है। हमने एक अभियान चलाया कि जाओगे तो कहां जाओगे, गुजरात ही आना पड़ेगा। हमने ऐसा माहौल बनाया कि सभी उद्योगों को गुजरात आना पड़ा।

हमने एक मूलभूत बात जो की है वो हिंदुस्तान की किसी भी सरकार से अलग है उसमें कोई आसमान से तारे लाने वाला विज्ञान नहीं है। छोटी सी समझ की बात है। यदि विकास करना है तो सरकारों से नहीं होगा। जनता जनार्दन को जोड़ दो अपने आप सब बढ़ जाएगा। हमने कोई काम ऐसा नहीं किया कि जनता एक ओर चलती हो सरकार दूसरी ओर चलती है। हमने सिर्फ जनता को जोड़ा। गुजरात की तेज गति से प्रगति की मूल ताकत जनभागिदारिता है।

देश युवा है हम कहते हैं लेकिन वो देश  के काम आ रहा है क्या। युवा देश के काम आए ऐसा हम कुछ कर पाए क्या। यदि बीसवी शताब्दी के अंत से पहले ऐसा कुछ सोच लिया होता तो आज भारत कहां का कहां होता।

प्लानिंग कमीशन की हर मीटिंग में मुझसे एक सवाल जरूर पूछा जाता है। मोदी जी जनभागीदारी में कोई नया काम किया हो तो जरूर बताकर जाइये। मेरी प्लानिंग कमीशन में एक भी बैठक ऐसी नहीं हुई जब मुझसे यह प्रश्न नहीं पूछा जाता। जब मैं जनभागीदारिता की बात करता हं तो 6 करोड़ गुजराती मेरे लिए भगवान होते हैं। मैं पुजारी की तरह उनकी पूजा में लगा होता हूं।

एक सवाल किया जा रहा है कि सद्भावना मिशन में सभी संप्रदायों के लोग कैसे आए ये प्रश्न पूछा जा रहा है। ये प्रश्न इसलिए हैं क्योंकि पिछले दस साल में उ न्हेंने सत्य नहीं देखा। वो झूठ में जी रहे थे। ये सभी संप्रदाय के लोग यहां हैं। यह विश्वास रातों रात पैदा नहीं हुआ है। हमने दस साल तपस्या की है। 6 करोड़ गुजरातियों के मंत्र का हमने दिन रात जाप किया है तब यह संभव हो सका है। नरेंद्र मोदी वोट बैंक की राजनीति नहीं करते हैं लेकिन हमारी चिंता सबसे ज्यादा करते हैं यह भरोसा हमने दिया है।

आम आदमी को चाहिए शांति। यहां किसी मैजोरिटी की शांति का बात नहीं हो रही है। शांति सबको चाहिए। गरीब को और ज्यादा चाहिए। अशांति होती है तो गरीबों की रोजी रोटी मर जाती है। उनके बच्चे भूखे सोते हैं। सुख चैन की जिंदगी आज हर गुजराती जी रहा है। इससे भरोसा पैदा हुआ है। राज्य का मुख्यमंत्री घर घर जाकर कह रहा है कि अपनी बेटी को पढ़ाओ। वो नहीं देखता कि वो किस संप्रदाय के घर में है। शत प्रतिशत- जब शत प्रतिशत की बात होती है तो कोई विशेष नहीं होता है ।

सबका साथ सबका विकास नारा नहीं है।  हम एक दशक इस पर चले हैं। सद्भभावना मिशन की आत्मा यही है। कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि आज ही जरूरत क्यों पड़ी। हम तो इस पर चलते आए हैं। लेकिन सफलता मिलने के बाद लगा कि इस मॉडल को उजागर करने की जरूरत है। गुजरात के विकास के मॉडल की चर्चा सभी लोग करते हैं।

गुड गवर्नेंस के विषय में भी गुजरात पर  सवाल नहीं उठते हैं। सबको लगता है कि गुड गवर्नेंस है विकास है। अब सवाल नहीं उठते हैं। लेकिन इसके पीछे के राज पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। इस सद्भभावना मिशन से मैं उस ताकत के बारे में दुनिया को बताना चाहता हूं जिससे गुजरात का विकास हुआ है। इस सद्भभावना मिशन पर हम दस साल से चल रहे हैं। सबको साथ जोड़कर चलते चलते जो हासिल किया है मैं आज नम्रतापूर्वक तीन दिन के अनशन के बाद मन की पवित्रता के साथ देश के विकास में सोचने वाले लोगों को निमंत्रण देता हूं अपने साथ जुड़ने का। जैसे सुषमा जी कह रही थी कि हमारे विरोधी दल के लोग तारीफ कर रहे हैं। सबका भला सहज प्रक्रिया है। मैं आग्रह करता हूं कि देश और दुनिया गुजरात को देखे तो हमारे सद्भभावना मिशन को भी देखे। ये ऐसा मॉडल है जिसमें जनशक्ति और विकास की यात्रा को जोड़कर के चलना है। लेकिन कभी कभी क्या होता है। हम कितना भी काम क्यों न करे जब तक विराट के दर्शन न हो दुनिया के गले के नीचे चीजें उतरती नहीं है। ये तीन दिन का अनशन  दुनिया को उस विराट के दर्शन कराने का छोटा सा कदम था। अगर ये मैं न करता, अपनी सात्विक शक्ति को उसके साथ न जोड़ता। लाखों लोगों का मुझे आशीर्वाद न मिलता तो दुनिया का ध्यान  इस ओर जाने वाला नहीं था।

एक्‍शन बोलता है और मैं एक्‍शन में विश्वास करता हूं। लीडरशिप की कसौटी एक्‍शन पर निर्भर करती है। आज हमने दुनिया को दिखाया कि ये रास्ता है। सबको जोड़ने का सबको साथ लेकर चलने का। जब तक हम वोट बैंक की राजनीति से ऊपर नहीं उठते हम देश का विकास नहीं कर सकते।

मेरे दिल में बहुत पीड़ा है। जब तक मैं सरकार में नहीं था तब तक मैं भी ओरों की तरह सोचता था क्या करोगे अपना देश तो ऐसा ही है। लेकिन दस साल के अनुभव से कह सकता हूं कि यही सरकार, यही अफसर, यही फाइलें…यदि उसके बाद भी इस सब के साथ जनता को जोड़ दे तो विकास किया जा सकता है। गुजरात ने करके दिखाया। हमको इसी रास्ते पर आगे बढ़ना है।

इन दिनों गेमचेंजर शब्द का खूब प्रयोग हो रहा है। मैं अपने हर गांव के हर व्यक्ति को गेमचेंजर बनाना चाहता हूं। सद्भभावना मिशन से मैंने अपना प्रयास शुरु किया है। एक मॉडल दुनिया के सामने रखा है। ये सद्भभावना मिशन आगे बढ़ने वाला है।

मैं जिम्मेदारी के साथ ये घोषणा कर रहा हूं कि जैसे मैंने ये तीन दिन का अनशन किया मैं इसी तरह सभी जिलों में जाउंगा हर जिले में एक-एक दिन बैठूंगा। सुबह से शाम तक बैठूंगा। जनता के बीच में बैठूंगा। और जैसे ये तीन दिन मैंने देखा है हर जिले में इस भाव को और शक्तिशाली  करूंगा। और भूखे रह कर करूंगा। क्योंकि मैंने इसके फल देखे हैं। एकता, शांति, भाईचारा इसके फल को मैंने महसूस किया है। इस सद्भभावना को और अधिक ताकतवर बनाना मेरा सपना है। मैं आप सब को जोड़ कर, सभी जिलों में जाकर के इस भाव को और अधिक मजबूत करना चाहता हूं। जैसे जैस कार्यक्रम बनेगा आप सबको जानकारी दी जाती रहेगी।

मेरे सबसे बड़ी शक्ति ही मेरा कमिटमेंट हैं। कई लोगों को लगता है गुजरात में बहुत कुछ हो गया लेकिन मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं। मुझे गुजरात को और आगे ले जाना है। और नए सपने संजोंने हैं। और नई शक्ति जुटानी है। उसी को लेकर आगे बढ़ना है।

हिंदुस्तान में जो निराशा का माहौल है उसके गुजरात ने बदला है। जो हो नहीं सकता उसे गुजरात ने करके दिखाया है। ये लोकतंत्र है। हर एक की अपनी राय होती है अपनी अभिव्यक्ति होती है। लेकिन हमने हमारे लक्ष्य को कभी भी ओझिल नहीं होने देना है। हमे अपने लक्ष्य को हमेशा हमेशा अपनी आंखों में रखना है।

हम जो कुछ भी कर रहे हैं उसमें हमारा मंत्र रहा है भारत के विकास के लिए गुजरात का विकास। भले उद्योग गुजरात में मिले लेकिन रोजगार देशभर के लोगों को मिलता है। अगर गुजरात का किसान कपास पैदा करता है तो वो कोयमबटूर में प्रोसेस होकर वहां के लोगों को भी रोजगार देता है।

भारत मां की सेवा करने के लिए हम गुजरात का विकास करके मां भारती के चरणों में अर्पित करना चाहते हैं। मुझे जनता का आशीर्वाद चाहिए। मुझे संतों महात्माओं का आशीर्वाद चाहिए। इस सद्भभावना मिशन को आगे बढ़ाने के लिए मैं राज्य के हर जिले में जाने वाला है। मैं दुनिया को दिखाना चाहता हूं कि हमने जनशक्ति को कैसे जोड़ा है। मैं दुनियाभर को लोगों को गुजरात का अध्यन करने के लिए आमंत्रित करता हूं। नकारात्मकता पर हमारा ध्यान नहीं है। हम सपनों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं।

मैंने सोचा भी नहीं था कि देशभर से लोग आएंगे। अब पूरा देश जुड़ रहा हैं। मैं मानता हूं कि विकास जनआंदोलन बनना चाहिए। यदि विकास जनआंदोलन बनता है तो दुनिया की कोई ताकत हमें नहीं रोक सकती। हम इंतेजार नहीं कर सकते। हमे नई ऊंचाइयों को छूना है। आईये हम विकास की नई यात्रा की शुरुआत करे।

मैं व्यक्तिगत रूप से आपका आभारी हूं कि आपने मुझे प्रेम दिया, आशीर्वाद दिया, शक्ति दी। इसी शक्ति को नमन करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

जय-जय गुजरात।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.