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कामचोरी, ऑफिस में देरी से पहुँचने और छूट्टी मारने के चार सौ बीस तरीके

By   /  September 19, 2011  /  5 Comments

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-जेपी यादव||

ऑफिस से छुट्टी लेने का हुनर सबको नहीं आता, इसीलिए शातिर कर्मचारी तो अपने बॉस को आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं और जिन्हें छुट्टी नहीं मिलती, वे होते हैं शराफत अली या फिर कोई सज्जन कुमार। इनके उलट दो होनहारों तेज प्रकाश और योग्य कुमार को ही ले लीजिए। ऑफिस में काम नहीं करने के मामले में तेज प्रकाश को तेजी हासिल है, तो योग्य कुमार को योग्यता। कभी-कभार ऑफिस में सख्ती हुई भी तो ये अपने हुनर का जलवा पेशकर अपने आपको आसानी से बचा ले जाते हैं। जब कभी इन दोनों को लगता है कि इन्हें काम करना ही पड़ेगा, तो नाना-नानी और दादा-दादी तक को श्रद्धा से याद करना शुरू कर देते। इसलिए नहीं कि श्राद्ध शुरू होने वाले हैं और वे अपने पूर्वजों तक को याद करेंगे, बल्कि काम नहीं करने के बहाने के तौर पर वे किसी की मौत से लेकर श्राद्ध तक का बहाना लिखित में शर्ट की ऊपर वाली जेब में रखते हैं। यही बहाने अगर बॉस को मूर्ख बनाने में खरे उतरे तो ठीक, वरना बहानों की कोई कमी नहीं है।
योग्य कुमार और तेज प्रकाश ने एक बार खुलेआम दावा किया था कि उनके पास ऑफिस में लेट पहुंचने के लिए 120 और झूठ बोलने के 300 तरीके हैं। यकीन मानिए, इन दोनों का आकड़ा जाकर 420 पहुंचता है। इन दोनों की एक खूबी यह भी है कि ये अपने चाहने वालों को भी छुट्टी लेने का फॉर्मूला बताते रहते हैं। ऐसे में पूरा ऑफिस ही इन दोनों की मुट्ठी में रहता है। कहने का मतलब काम को कुछ इस तरह करते हैं कि काम को भी इस बात का पछतावा होता है, ‘हाय किन हाथों में फंस गया।’ काम नहीं करने के मामले में इन दोनों ने जाने-अनजाने ही कितने रिकॉर्ड बनाए होंगे, मगर अफसोस इनकी उपलब्धि के प्रदर्शन के लिए इनकी कोई किताब पब्लिश नहीं हुई है। अभी कुछ ही दिन हुए हैं। बॉस ने तेज प्रकाश और योग्य कुमार को अपने केबिन में बुलाया। यह तो तेज प्रकाश की तेजी और योग्य कुमार की योग्यता का नमूना भर  है कि बॉस ने बुलाया सुबह, लेकिन दोनों पहुंचे शाम को वह भी हांफते हुए। इस समय बॉस घर जाने की तैयारी में थे। दोनों ने देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर केबिन में घुसते ही तकरीबन 60 डिग्री आगे की ओर झुकते हुए प्रणाम किया, ऐसा करता देख बॉस त्रिपाठी एक पल को घबरा गए। हालांकि, चापलूस पसंद बॉस की तरह त्रिपाठीजी को इन दोनों का यह अंदाज खुश कर गया। लेकिन मिजाज से खड़ूस होने के चलते चेहरे पर वही पुरानी तरह की मुर्दनी छाई रही, जैसे किसी ‘चौथा-उठाला’ में गए शख्स की भूखे  लौटने के बाद होती है। बॉस के चेहरे पर कुछ देर तक यूं ही मुर्दनी सी छाई रही। फिर संभलते हुए बोले, ‘सुना है तुम दोनों ऑफिस में ठीक से काम नहीं करते।’ तेज प्रकाश को इस सवाल के बारे में पूर्व से ही जानकारी थी, इसलिए तुरंत इसका जवाब भी दे दिया। ‘सर, सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा नहीं करते।’ बॉस यह सुनकर चुप हो गए, क्योंकि कितना भी शातिर से शातिर बॉस इसका जवाब देने से पहले सोचेगा। अब बारी योग्य कुमार की थी। योग्य कुमार कुछ इस तरह महसूस कर रहे थे, जैसे कटघरे में खड़े हत्या के आरोपी की फांसी की सजा माफ होने के साथ वह बाइज्जत बरी होने वाला हो। योग्य कुमार बोले, ‘लगता है किसी ने हमारे खिलाफ आपके कान भरे हैं।’ बॉस के चेहरे पर कोई प्रभाव पड़ता नहीं देख योग्य कुमार तुरंत बोले, ‘सर आपको उल्लू बनाया गया है। इतना सुनते ही बॉस की आंखों के आगे बहुत से उल्लू घूमने लगे और मन ही मन स्वर्गीय पूज्य पिताजी को याद कर सोचने लगे कि कहीं वे ‘उल्लू के पट्ठे’ तो नहीं हैं। तभी तेज प्रकाश ने बात संभालते हुए कहा, ‘कहने का मतलब। हम तो बस यही कहना चाहते हैं कि लोग हमारे खिलाफ आपके कान भरते हैं।’ इसके बाद दोनों बॉस के केबिन से बाहर आ गए।
ऑफिस में तेज प्रकाश और योग्य कुमार का वही जलवा है, जो कॉंन्ग्रेंस पार्टी में राहुल गांधी का। क्या कहा? आपको यकीन नहीं आता। … तो इसमें मैं क्या करूं। यह आपकी समस्या है, सुनते हैं इसका कोई इलाज भी नहीं है। खैर, आगे सुनिए। … इस ऑफिस में तैनात छेनू चपरासी बॉस को भले ही पानी पिलाना भूल जाए, लेकिन बड़े-बड़ों को पानी पिलाने का माद्दा रखने वाले तेज प्रकाश और योग्य कुमार को पानी पिलाना कभी नहीं भूलता। ये दोनों जैसे ही ऑफिस पहुंचते हैं, पानी का ताजा गिलास लिए छेनू हाजिर हो जाता है। आज बॉस से निपटकर या कहें निपटाकर दोनों जैसे ही अपनी सीट पर बैठे तभी मुंह लटकाए छेनू योग्य कुमार और तेज प्रकाश के पास पहुंच गया। लगभग रोते हुए छेनू बोला, ‘साहब दो दिन की छुट्टी चाहिए, लेकिन बास ने साफ इनकार कर दिया है।’ सामने कुर्सी पर दोनों लोगों की त्योरियां चढ़ गईं। योग्य कुमार बोले, ‘ऐसा कैसे हो सकता है। छुट्टी पर तुम्हारा पूरा अधिकार है। इस अधिकार से तुम्हें कोई वंचित नहीं कर सकता।’ इसके बाद योग्य कुमार ने पान मुंह

जेपी यादव

में कुचरकर कुछ इस तरह थूका, जैसे कोई गुस्सा थूकता है। लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में तेज प्रकाश ने ऐसा कुछ नहीं किया और अपना गुस्सा पान की पीक के साथ गटक गए। इसका मतलब तेज प्रकाश ने अपना गुस्सा पी लिया। दोनों कुछ देर तक गहन मुद्रा में कुछ सोचते रहे फिर योग्य कुमार ने मोर्चा संभालते हुए कहा, ‘पहले तो बॉस को जीभर के गालियां दो।’ फिर क्या था। हरि इच्छा मानकर छेनू ने बॉस को जीभर के गालियां दीं, बीच में उमस भरी गर्मी में थकान हुई तो एक गिलास पानी पी लिया। छेनू की गालियां खत्म हुईं तो उसका चेहरा विश्व विजेता की तरह चमक रहा था। इस दौरान कोई एड मेकर इस समय होता तो छेनू को एनर्जी ड्रिंक के एड के लिए बतौर मॉडल साइन कर लेता। मगर दुर्भाग्य… छेनू का नहीं… एड मेकर का दुर्भाग्य भाई…।

थोड़ी देर तक माहौल में शांति रही। अब बारी योग्य कुमार की थी। तुरंत छेनू को गुरुमंत्र दिया, लेकिन यह भी हिदायत दी कि इसकी चर्चा बॉस बिरादरी के लोगों से मत कर देना, नहीं तो हमारा कुछ नहीं तुम्हारी नौकरी पर जरूर बन आएगी। योग्य कुमार ने कहना शुरू किया, देखो छुट्टी दो की बजाय तीन दिन की ले लेना वो भी बिना बताए। चौथे दिन ऑफिस आने से पहले एक धार्मिक स्थल पर बिकने वाला मिठाई का खाली डिब्बा मुझसे ले लेना और उसमें छन्नू हलवाई की मिठाई खरीदकर पैक कर लेना और पूरे ऑफिस में यह कहकर बांट देना कि फलां धार्मिक स्थल पर गया था, प्रसाद लाया हूं। सबसे पहले बॉस को ही खिलाना और तुम्हारा काम हो जाएगा।
छेनू को यह मंत्र देने के बाद दोनों ने ऑफिस में दो घंटे काम किया और ओवरटाइम का फॉर्म भरकर निकलने ही वाले थे कि छेनू अदरक और इलायची के टेस्ट की चाय लिए सामने खड़ा था। इसके जो हुआ आप भी जानते हैं। फिर भी लिख देता हूं। चाय पीने के साथ तेज प्रकाश और योग्य कुमार ने एक-एक घूंट के साथ बॉस को 10-10 गालियां दीं और ऑफिस की ओर देखकर सोचने लगे कल फिर आना है इस ऑफिस पर एहसान करने….।

जे पी यादव के ब्लॉग क्रिएशन वर्क से साभार

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

5 Comments

  1. aanupama says:

    बहुत ही बढ़िया लिखा है ,ऑफिस मे एसे ही लोगो का बोलबाला है

  2. adv. suresh rao says:

    बहुत खूब सर………अच्छा है…..

  3. Poonam Yadav says:

    बहुत खूब कहा aapne………

  4. WEBCARE says:

    GOOD आईडिया,

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