/संघ क्यों रहे नरेंद्र मोदी का गिरवी..

संघ क्यों रहे नरेंद्र मोदी का गिरवी..

-हरि शंकर व्यास॥

आरएसएस उर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेंद्र मोदी को बनाया है न कि नरेंद्र मोदी ने संघ को! इसलिए यह चिंता फिजूल है कि नरेंद्र मोदी यदि फेल होते है तो संघ बदनाम होगा व आरएसएस की लुटिया डुबेगी। तब भला क्यों नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की मूर्खताओं पर संघ जयकारा लगाए? क्या संघ को इंतजार नहीं करना चाहिए कि नोटबंदी का पूरा असर वह पहले जांच ले। देख ले कि कितने लाख करोड़ रु का काला धन पकड़ा जाता है? भारत राष्ट्र-राज्य की आर्थिकी दौड़ती है या भठ्टा बैठता है? जनता की कमर टूटती है या प्लास्टिक मनी को अपना कर खुश होती है? संदेह नहीं कि संघ भी वहीं चाहता है जो देश चाहता है। सब चाहते हैं कि काला धन खत्म हो। मगर इस उद्देश्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो किया है उससे क्या सबकुछ गड़बड़ा नहीं गया है? अपना मानना है कि यह संभव नही जो इस गड़बड़ की मजूदर, किसान, आम जन से जुड़े संगठनों से संघ को फीडबैक नहीं मिली हो। संघ का हर संगठन बूझ रहा होगा कि जनजीवन अस्त-व्यस्त है। अफरा-तफरी फैल गई है। ऐसे में संघ सुप्रीमो मोहन भागवत, सुरेश भैय्याजी जोशी, दत्तात्रैय, सुरेश सोनी के सामूहिक नेतृत्व को जमीनी फीडबैक की चिंता करनी चाहिए या अपने प्रचारक प्रधानमंत्री के साथ अपने को डुबवाने वाला स्टेंड लेना चाहिए?Narendra modi and mohan bhagwat

 

संघ की सफलता के दो मूल मंत्र है। एक हिंदू हित की चिंता करना और दूसरे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को तैयार करते हुए जमीनी मनोदशा को लगातार बूझते जाना। इसी में संघ का सामूहिक नेतृत्व ढला हुआ है। इन तीनों याकि हिंदू हित, जमीनी फीडबैक और सामूहिक नेतृत्व की संघ तासीर पर, उसकी कसौटी में यदि आज नरेंद्र मोदी को कसा जाए तो वे ढाई साल में फेल है। अपना मानना है कि जम्मू-कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद के साथ सरकार बनाने, लाहौर जा कर नवाज शरीफ के घर पकौड़े खाने, फिर पीओके में सर्जिकल स्ट्राईक और अब नोटबंदी के जो चार अंहम प्रतिनिधीपूर्ण ढाई साला उनके फैसले है उनमें से एक में भी संघ की लीडरशीप से नरेंद्र मोदी ने फीडबैक, विचार, समझ प्राप्त नहीं की होगी।

 

संभव है नरेंद्र मोदी मानते हो कि मोहन भागवत, भैय्याजी जोशी, दतात्रैय आदि को विदेश नीति, मौद्रिक नीति की समझ नहीं है। इन्हंे राजकाज, प्रशासन का अनुभव नहीं है। ये लोग बातें गोपनीय नहीं रख सकते। जब नरेंद्र मोदी ने भारत संविधान, गोपनीयता की शपथ खाए अपने मंत्रियों पर भरोसा नहीं किया, उनसे नोटबंदी के पक्ष-विपक्ष, अमल की तैयारियों, संभावी सिनेरियो पर विचार नहीं किया तो मोहन भागवत एंड पार्टी पर भला वे कैसे विश्वास कर सकते थे?

 

तभी संघ विचित्र स्थिति में फंसा है। एक तरफ मोहन भागवत और संघ सुप्रीमों को नरेंद्र मोदी ने भरोसे में नहीं लिया। नोटबंदी को ले कर संघ से बात नहीं की और अब इन्हंे जमीनी तकलीफों से मजदूर, किसान सभी की दुर्दशा दिख रही है बावजूद इसके संघ नरेंद्र मोदी के कसीने काढ़ने को मजबूर है। यह कहने को मजबूर है कि सदइच्छा से हुआ यह फैसला राष्ट्रहित में है। इससे ऐसी पारदर्शी मौद्रिक व्यवस्था बनेगी जिससे आर्थिकी सुरक्षित और गतिशील होगी। जाहिर है संघ के संवाद प्रमुख मनमोहन वैद्य का समर्थन वाला यह बयान मजबूरी में हुआ है। सदइच्छा के तर्क पर प्रधानमंत्री मोदी का यह जयकारा है।

 

हिसाब से संघ को जानना चाहिए कि सदइच्छा तब तक सफलता में नहीं बदल सकती जब तक उस पर अमल के लिए आवश्यक तैयारियां न हो। जरूरी बौद्विक उर्वरता, सामूहिक विचार-विमर्श और टीम न हो। नरेंद्र मोदी का गुजरात में नाम इसलिए हुआ था और वह नाम आगे इसलिए बढा था क्योंकि माना गया कि वे संघ विचारधारा में निहितार्थ सदइच्छा को परिणामों में कनवर्ट कर देंगे।

 

पर संघ परिणाम से पहले ही अपने आपको नरेंद्र मोदी के फैसले में झौंक दे रहा है। ऐसा करना एक व्यक्ति के पीछे विचारधारा, संगठन की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाना है। इसलिए कि अंततः फिर संगठन और उसकी विचारधारा जवाबदेह बनेगी। आज संकट यह है कि व्यक्ति निपरेक्ष संघ ने पूरी विचारधारा, हिंदू हित, राष्ट्रभक्ति और हिंदू राष्ट्रवाद को एक व्यक्ति के पांवों में बैठा दिया है। सबकुछ एक व्यक्ति की सफलता- असफलता से नत्थी हो रहा है। संघ समझ नहीं रहा है कि अटलबिहारी वाजपेयी के वक्त में उनकी उदार इमेज, एलायंस मजबूरी के कारण शाईनिंग इंडिया की असफलता से बच निकलने के दस बहाने थे। पर नरेंद्र मोदी के वक्त ऐसा कोई बहाना तब नहीं होगा जब आर्थिकी डुबी हुई होगी। सीमा पर लगातार सैनिक मर रहे होंगे। 2019 में जम्मू-कश्मीर वैसा ही होगा जैसे 2016 में है। न मंदिर बनेगा, न साझा नागरिक संहिता होगी और न धारा 370 खत्म हुई होगी और न गौहत्या पाबंदी का उसका अखिल भारतीय कानून का सपना पूरा हुआ होगा। न व्यापारी साथ, न दलित साथ और न आदिवासी साथ। हां, अकेले नोटबंदी और आर्थिकी में ही हिंदु नाम पर हुआ एकजुट वोट आधार भी छिन्न-भिन्न हो सकता है। संघ को गुरूदक्षिणा से पाल पोस कर जिन व्यापारियों ने बढ़ाया वे ही बेगाने हुए होंगे।

 

आप कह सकते है कि मेरा संभावी सिनेरियों ख्याली है। संभव है मैं 2019 में गलत साबित होऊं। आखिर नरेंद्र मोदी में ब्रांडिग-मार्केटिंग, जयकारा लगवाने की जो क्षमताएं है उनके नीचे इस तरह की सत्यताएं छुपी रहें। लोग इतना सोचे ही नहीं। यों भी हिंदूओं में सोचा कम जाता है और अंध भक्ति उसकी परंपरा है, उसी में जीता है।

 

तब क्या संघ भी व्यक्ति भक्ति में आस्था रखता है? उसके लिए विचार, एजेंडा, संगठन ( जिनकी प्राणवायु भी जन-जन है) महत्वपूर्ण है या वह शख्श जिसने कम से कम दो मामलों, लाहौर जा कर नवाज शरीफ के घर पकौड़े खाने और नोटबंदी में अपने को निर्विवाद तुगलक प्रमाणित किया है। यह अपना भी मानना है कि मोहम्मद बिन तुगलक सदइच्छा वाला शंहशांह था। उसने भी चांदी के सिक्को को पीतल के सिक्कों में बदल या राजधानी को दिल्ली से देवगिरी शिफ्ट करने का फैसला सदइच्छा में किया था। फिर नतीजा भले आर्थिकी और देश के कबाड़े का निकला हो। ईश्वर करें अभी ऐसा न हो पर खतरें बूझे तो रहने चाहिए। जयकारों मे अंधा तो बना नहीं रहना चाहिए। क्योंकि अंधा बन कर यदि संघ ने नरेंद्र मोदी के यहां अपने का गिरवी रखे रखा तो हिंदू कौम के लिए वह इतिहास लज्जाजनक बनेगा कि जिस संगठन ने हिंदू गर्व, गौरव की अलख जगाई वह कुल मिला कर तुगलकशाही की पालकी ढोने वाला था। उसने ऐतेहासिक मौके को पालकी ढोहते हुए गंवा दिया।

 

पता नहीं संघ की मौजूदा आलाकमान में ऐसे सोचा जाता है या नहीं? और सवाल यह भी है कि इस तरह सोचा जाना चाहिए या नहीं?

सौजन्य: नया इण्डिया

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.