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28 को भारत बंद की घोषणा किसी ने की ही नहीं थी..

By   /  November 28, 2016  /  2 Comments

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-जीतेन्द्र कुमार||
आपको यह पढ़कर ताज्जुब होगा। लेकिन आपके घर में अख़बार आता है, पिछले दस दिन का अख़बार देख लें। विपक्ष के किसी नेता का भारत बंद का आह्वान देखने को नहीं मिलेगा। भारत बंद कोई करेगा तो इस तरह चोरी-छिपे नहीं करेगा।
इस उदाहरण से यह पता चलता है कि देश को किस खतरनाक झूठ का शिकार बनाया जा रहा है।bharat-band

 
सच तो यह है कि 28 नवंबर को भारत बंद का आह्वान किसी भी विपक्षी दल ने नहीं किया है। कांग्रेस, जदयू, तृणमूल, आप, सपा, बसपा, राजद, वामदल इत्यादि द्वारा कभी 28 के भारत बंद की कोई खबर किसी अखबार में नहीं दिखी है। हाँ, 28 को *आक्रोश दिवस* मनाने और कुछ राज्यों में प्रदर्शन वगैरह की घोषणा देखने को मिली है। वाम दलों ने बिहार, बंगाल और केरल में राज्यस्तरीय बंद बुलाया है। लेकिन यह “भारत बंद” नहीं है।
जब आप आज ‘बिहार बंद’ या ‘बंगाल बंद’ की खबर देखें, तो खुद ही समझ लें कि अगर ‘भारत बंद’ होता, तो किसी राज्य का नाम क्यों आता?

28 के भारत बंद का सोशल मीडिया में कुप्रचार एक दिलचस्प शोध का विषय है। एक काल्पनिक दैत्य पैदा करके उससे छद्म युद्ध करना कितना रोमांचक है न!

विपक्ष के एक नेता से मैंने कहा कि 28 को भारत बंद के कुप्रचार का आप विरोध क्यों नहीं कर रहे। उन्होने हँस कर जवाब दिया – वे लोग अगर अपने भक्तों को मूर्ख बना रहे हैं, तो बनाएं। हमें क्या फर्क पड़ता है।
भारत बंद का आह्वान विपक्ष ने नहीं किया। लेकिन कुछ लोगों ने 28 के भारत बंद के खिलाफ लगातार सोशल मीडिया में फोरवार्डेड पोस्ट डालकर एक झूठ को सच बनाने में मदद की। इस तरह इस तथाकथित बंद के कथित तौर पर विफल हो जाने को देशभक्ति का सबूत बताकर नागरिकों को गुमराह किया जाएगा।
यह बहुत चिंता का समय है। अगर आपको सच की जरा भी समझ हो, तो अपने घर में मौजूद पिछले दस दिन के अख़बार निकाल कर देखें। पता चल जाएगा कि किसी विपक्षी नेता का भारत बंद का कोई आह्वान संबंधी समाचार नहीं मिलेगा। इसके बावजूद आखिर कौन लोग हैं जो 28 के बंद को विफल बनाने का आह्वान कर रहे हैं?

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  • Published: 2 years ago on November 28, 2016
  • By:
  • Last Modified: November 28, 2016 @ 2:45 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. Prabhat Kumar says:

    http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/bharat-bandh-opposition-protest-against-demonetisation-on-november-28/

    जनाब, जरा ऊपर दिए गए लिंक को खोलकर पढ़ लें। अधूरी जानकारी या यूँ कहें अधूरा ज्ञान हानिकारक होता है।

  2. Jha says:

    Kya aap ki Media Darwar “AAP Party” Prayojit hai…

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